मैंने शेरपाओं में हिमालय देखा
- 9:42 am
- 7 June 2026
-माधवी शर्मा गुलेरी-
हाल ही में माउंट एवरेस्ट से एक ऐसी ख़बर आई जिसने पूरे पर्वतारोहण जगत में हलचल पैदा कर दी. नेपाल के वरिष्ठ शेरपा दावा शेरपा, जो लगभग एक सप्ताह से लापता थे, जीवित मिल गए. बर्फ़ीले तूफ़ानों, हाड़ कंपा देने वाली ठंड और दुनिया की सबसे कठिन ऊँचाइयों के बीच उनका जीवित बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा रहा है.
लेकिन सच तो यह है कि हिमालय में चमत्कार कोई नई बात नहीं है. वहाँ चमत्कार अक्सर शेरपाओं के रूप में दिखाई देते हैं.
दावा शेरपा के जीवित मिलने की ख़बर सुनते ही मेरी स्मृतियाँ नेपाल की उन पगडंडियों पर लौट गईं, जहाँ मैंने पहली बार शेरपा समुदाय को क़रीब से जाना था. दुनिया उन्हें पर्वतारोहियों के गाइड के रूप में जानती है, लेकिन मेरे लिए वे हिमालय की धड़कन हैं. ऐसे लोग, जो पर्वतों को जीतने नहीं, उनके साथ जीने निकले हैं.
नेपाल की धरती पर कदम रखते ही हिमालय आपको अपनी विराटता का अहसास करा देता है. दूर से दिखने वाली बर्फ़ीली चोटियाँ किसी चित्र की तरह सुंदर लगती हैं, लेकिन जब आप कई दिनों तक उनके बीच चलते हैं, तब समझ आता है कि हिमालय केवल बर्फ़ और ऊँचाई का नाम नहीं है. वह धैर्य है, अनुशासन है और सबसे बढ़कर विनम्रता है.
मेरा पीक (Mera Peak) को दुनिया की सबसे ऊँची ट्रेकिंग योग्य चोटी माना जाता है. इसकी ऊँचाई लगभग 6,476 मीटर (21,247 फ़ीट) है. मैं अप्रैल में मेरा पीक अभियान के लिए गई थी. लक्ष्य स्पष्ट था, तैयारी पूरी थी और मन हिमालय में रमा हुआ था. लेकिन यात्रा के ठीक बाद मुझे महसूस होने लगा कि असली कहानी उस शिखर की नहीं है, जिसे हम छूना चाहते हैं. असली कहानी उन लोगों की है, जो हर साल हज़ारों पर्वतारोहियों को उन शिखरों तक पहुँचाते हैं.
शेरपाः जो हिमालय की रीढ़ हैं
हम अक्सर इस शब्द का इस्तेमाल किसी भी पर्वतीय गाइड के लिए कर देते हैं, जबकि वास्तव में शेरपा नेपाल के सोलुखुम्बु क्षेत्र का एक विशिष्ट जातीय समुदाय है. सदियों से उनका जीवन हिमालय के साथ जुड़ा हुआ है. कम ऑक्सीज़न, कठिन मौसम और खड़ी चढ़ाइयाँ उनके लिए रोमांच नहीं, जीवन का हिस्सा हैं.
मेरे लिए इस समुदाय का सबसे जीवंत चेहरा एक शेरपा थे—39 वर्षीय गेलू शेरपा.
मेरा पीक अभियान के दौरान समिट से एक रात पहले हम लगभग 5,800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हाई कैंप में थे. बाहर मौसम बेहद कठोर था. तेज़ बर्फ़ीली हवाएँ टेंट को लगातार झकझोर रही थीं और तापमान शून्य से इतना नीचे था कि दस्ताने उतारकर कुछ सेकंड के लिए भी हाथ बाहर निकालना मुश्किल हो रहा था. मैं और ब्रिटेन की एक पर्वतारोही अपने टेंट में दुबके बैठे थे. हमारे अंदर अगले दिन होने वाले समिट पुश को लेकर उत्साह भी था और एक स्वाभाविक-सी घबराहट भी.
हमारे टेंट के बाहर एक छोटा-सा मेक-शिफ़्ट किचन था. उसमें एक व्यक्ति पूरी तन्मयता से काम में लगा हुआ था. जहाँ हम भरे-पूरे कपड़ों और डाउन जैकेट्स से लदे हुए थे—वहीं वो एक साधारण-सी जैकेट पहने ठंडे पानी से दाल और चावल धो रहा था—वो गेलू शेरपा थे.
जहाँ हमारा पूरा फ़ोकस ठंड से बचने में था, वहीं गेलू चेहरे पर प्यारी-सी मुस्कान लिए, नेपाली गाना गुनगुनाते हुए बड़े प्रेम से हमारे लिए भोजन तैयार कर रहे थे. कुछ ही देर में दाल-भात की ख़ुशबू हवा में घुलने लगी. साथ में लहसुन का गर्म सूप भी बन रहा था, जिसे ऊँचाई पर पर्वतारोहियों का सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता है.

लेकिन मेरी उस शाम की सबसे गहन स्मृति न दाल-भात की है, न लहसुन के सूप की—मुझे आज भी जो सबसे ज़्यादा याद है वो है गेलू का चेहरा. उस भीषण ठंड, कम ऑक्सीज़न और कठिन परिस्थितियों के बीच भी उनके चेहरे पर एक सहज, शांत और आत्मीय मुस्कान थी. न कोई शिकायत, न कोई थकान, न कोई दिखावटी बहादुरी. बस अपने काम के प्रति एक स्वाभाविक समर्पण और दूसरों की चिंता.
मैं उन्हें देखती रही और मन ही मन सोचती रही कि आख़िर यह कैसी शक्ति है? हममें से अधिकांश लोग उस मौसम में अपने हाथ तक बाहर निकालने से बच रहे थे, और गेलू उसी मौसम में खड़े होकर सबके लिए सूप और भोजन तैयार कर रहे थे. उनके चेहरे की वह मुस्कान जैसे ठंड को भी चुनौती दे रही थी. यह शायद पहली बार था जब मुझे शेरपाओं की असली ताक़त समझ में आई. उनकी शक्ति केवल मज़बूत शरीर, ऊँचाई पर काम करने की क्षमता या पर्वतारोहण कौशल में नहीं है. उनकी असली ताक़त है—सबसे कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते रहने का साहस, दूसरों की ज़रूरतों को अपनी असुविधा से ऊपर रखने का स्वभाव और बिना किसी शोर-शराबे के अपना कर्तव्य निभाते रहने की अद्भुत क्षमता. अभियान के दौरान मैंने एक और बात देखी. जब हम सुबह नींद से जागते थे, तब तक शेरपा कई घंटे काम कर चुके होते थे. कोई रस्सियाँ तैयार कर रहा होता, कोई उपकरण जाँच रहा होता, तो कोई अगले दिन का मार्ग देख रहा होता. जहाँ हमें अपने बैग का वज़न ज़्यादा लगता, वहीं वे 20-25 किलो या उससे अधिक भार लेकर उसी सहजता से चलते थे, जैसे किसी मैदान में टहल रहे हों. एक दिन मैंने अपने गाइड से पूछा, “क्या आप कभी थकते नहीं?” वह मुस्कुराए और बोले, “पहाड़ हमारा थकना पसंद नहीं करते.” उस उत्तर में हिमालय की पूरी शिक्षा छिपी हुई थी.शेरपाओं की एक और बात मुझे हमेशा प्रभावित करती रही. वे पर्वतों को जीतने की भाषा में बात नहीं करते. हर अभियान से पहले वे प्रार्थना करते हैं. रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज बाँधते हैं. पर्वत से सुरक्षित मार्ग की अनुमति माँगते हैं. मेरे एक गाइड ने कहा था, “हम पहाड़ पर चढ़ते नहीं, उसके साथ चलते हैं.”
शायद यही कारण है कि वे हिमालय को हमसे बेहतर समझते हैं. दुनिया एवरेस्ट के शिखर पर खिंची तस्वीरें देखती है. इतिहास उन लोगों के नाम याद रखता है जो सबसे ऊपर खड़े दिखाई देते हैं. लेकिन हर शिखर के पीछे कुछ ऐसे हाथ भी होते हैं जो तस्वीरों में नहीं दिखते. वही रास्ता बनाते हैं, रस्सियाँ लगाते हैं, ऑक्सीजन पहुँचाते हैं और संकट के समय सबसे पहले आगे आते हैं. दुनिया गवाह है कि 2014 के एवरेस्ट हिमस्खलन और 2015 के विनाशकारी भूकंप ने इस समुदाय को कितने गहरे घाव दिए. अनेक परिवारों ने न केवल अपने प्रियजनों को खोया, बल्कि अपना सब-कुछ खो दिया. इसके बावजूद वे हर मौसम में लौटते हैं. क्योंकि यही उनका जीवन है, यही उनकी पहचान है. पिछले साल, एवरेस्ट बेस कैम्प पहुँचने से पहले गोरकशेप की उस ठंडी, वीरान शाम में मैंने अपने गाइड से पूछा, “तुमको डर नहीं लगता?” वो कुछ पल मौन रहा, फिर बोला- “डर तो हर बार लगता है. पहाड़ पर जो कहे कि उसे डर नहीं लगता, या तो वह झूठ बोल रहा है, या फिर उसने पहाड़ को अभी तक समझा नहीं है.” उसकी आवाज़ में अनुभव का भार था. उन शब्दों ने मुझे एहसास कराया कि हिमालय में बहादुरी का मतलब डर को हराना नहीं, बल्कि उसके साथ चलना है. क्योंकि इन ऊँचाइयों पर जीत शिखर की नहीं, बल्कि अपने अहंकार पर होती है. और पहाड़ हमेशा उसी को स्वीकार करता है, जो उसके सामने सिर झुकाकर खड़ा हो. यात्रा के दौरान एक क्षण ऐसा भी आया जिसने मुझे भीतर तक बदल दिया. बर्फ़ से ढकी एक ढलान पर मेरा संतुलन बिगड़ गया. इससे पहले कि मैं गिरती, पीछे चल रहे शेरपा ने मुझे मज़बूती से थाम लिया. उस पल कोई कैमरा नहीं था, कोई दर्शक नहीं था, कोई शोर नहीं था. सिर्फ़ एक इंसान था, जिसने दूसरे इंसान को गिरने से बचा लिया. तब मुझे एहसास हुआ कि किसी भी शिखर तक पहुँचने की कहानी केवल उस व्यक्ति की नहीं होती, जो सबसे ऊपर दिखाई देता है. उसके पीछे कई ऐसे हाथ होते हैं, जो तस्वीरों में नहीं दिखते, लेकिन सफलता की पूरी कहानी उन्हीं पर टिकी होती है. 1953 में तेनजिंग नोर्गे और एडमंड हिलेरी ने पहली बार एवरेस्ट शिखर पर पहुँचकर इतिहास रचा था. लेकिन उनकी उपलब्धि केवल दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर विजय की कहानी नहीं है. यह विश्वास, साझेदारी और टीमवर्क की भी कहानी है. कठिनतम परिस्थितियों में उन्होंने साबित किया कि महान सफलताएँ अकेले हासिल नहीं होतीं. हर शिखर के पीछे कई हाथ, कई त्याग और कई लोगों का साथ होता है. शायद यही एवरेस्ट की सबसे बड़ी सीख है- ऊँचाइयाँ व्यक्ति छूता है, लेकिन वहाँ तक पहुँचने में पूरी टीम का योगदान होता है. नेपाल से लौटते समय इस बार भी मेरे पास केवल तस्वीरें और स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि हिमालय को समझने का एक नया दृष्टिकोण भी था. मैंने जाना कि असली शक्ति अक्सर मौन में होती है—वह अपने बारे में नहीं बोलती, वह बस अपना काम करती है, वह आपके लिए रस्सियाँ लगाती है, आपका सामान उठाती है, मुश्किल समय में आपका हाथ थामती है और जब आप शिखर पर पहुँचते हैं, तब भी स्वयं पीछे खड़ी रहकर मुस्कुरा देती है. आज भी मैं जब किसी पर्वतारोही को किसी ऊँची चोटी पर खड़े हुए देखती हूँ, तो मुझे गेलू शेरपा की वही मुस्कान याद आती है—हाई कैंप की उस बर्फ़ीली शाम में, हाथ में गर्म सूप का बर्तन लिए खड़ा एक शेरपा, जो शिखर पर पहुँचने की नहीं, दूसरों को वहाँ तक पहुँचाने की तैयारी कर रहा था. दावा शेरपा की चमत्कारिक वापसी ने मुझे एक बार फिर यही याद दिलाया है कि हिमालय की ऊँचाई केवल उसकी चोटियों से नहीं मापी जाती. उसकी असली ऊँचाई उन शेरपाओं की चुपचाप की जा रही हिम्मत में बसती है, जो दूसरों को शिखर तक पहुँचाकर स्वयं इतिहास के हाशिए पर खड़े रह जाते हैं. शायद इसलिए, जब भी हम किसी पर्वत की चोटी पर खड़े होकर विजय का उत्सव मनाएँ, हमें उन लोगों को भी याद करना चाहिए जो शिखर से पहले खड़े होते हैं—शांत, विनम्र और असाधारण—शेरपा.अपनी राय हमें इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
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