धुनों पर गीत लिखना एक रचनात्मक सुविधा : गुलज़ार
मुम्बई | किताब उत्सव के चौथे दिन पंडित अमरनाथ के काव्य-संग्रह ‘हंसा के बैन’ और गंगाशरण सिंह की संपादित किताब ‘युगसारथी धर्मवीर भारती’ का लोकार्पण हुआ. गुलज़ार और निदा फ़ाज़ली के संग्रह पर बातचीत हुई और राग-रंग की महफ़िल सजी. राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से पाँच दिन का यह उत्सव पु. ल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी में चल रहा है.
गुलज़ार के गीत-संग्रह ‘गुनगुनाइए’ की बाबत यूनुस ख़ान ने उनसे बातचीत की. इस संग्रह में गुलज़ार के लिखे पाँच सौ गीत संकलित कर पहली बार एक साथ प्रकाशित किए गए हैं. बातचीत में गुलज़ार ने अपने कई चर्चित गीतों के बनने से जुड़े रोचक क़िस्से साझा किए. उन्होंने कहा कि धुनों पर गीत लिखने की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि उसमें नए-नए मीटर मिलते हैं और वे इसे एक रचनात्मक सुविधा के रूप में देखते हैं.
शायर निदा फ़ाज़ली के कविता-संग्रह ‘मोरनाच’ के पुनर्नवा संस्करण के लोकार्पण के बाद लेखिका मालती जोशी से हरि मृदुल ने संवाद किया, अभिषेक शुक्ला ने संग्रह से चयनित कविताओं का पाठ किया.
‘हंसा के बैन’ के विमोचन के मौक़े पर रेखा भारद्वाज और गजरा कोट्टारी से संजीव चिम्मलगी ने संवाद किया. गजरा कोट्टारी ने अपने पिता पंडित अमरनाथ को याद करते हुए कहा कि ‘हंसा के बैन’ का अर्थ ‘आत्मा के बोल’ है और ये स्वयं पंडित अमरनाथ की आत्मा के ही स्वर हैं. रेखा भारद्वाज ने कहा कि गुरु जी को हिन्दी, उर्दू और कई अन्य भाषाओं की गहरी जानकारी थी; जब वे बोलते थे तो ऐसा लगता था मानो गा रहे हों. उन्होंने यह भी कहा कि गुरु जी की बंदिशों को इकट्ठा करके एक और किताब छापी जानी चाहिए.

संजीव चिम्मलगी ने पंडित अमरनाथ से जुड़े किस्से साझा करते हुए उनकी बंदिश ‘दुखवा होए गए साथी’ की कुछ पंक्तियाँ सुनाईं, जबकि गजरा कोट्टारी ने कविता ‘जब मुझसे तान खो गई’ का पाठ किया. रेखा भारद्वाज ने ‘गीत कैसे बनता है’ कविता के अंश और अपने गुरु की बंदिश के कुछ बोल गुनगुनाए.
हरि मृदुल ने कहा कि निदा फ़ाज़ली हिन्दी साहित्य के सबसे बड़े पुल थे, जिनकी शायरी में जन-साधारण और उनके आसपास की दुनिया बोलती है. यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी व्यापक पाठक वर्ग से जुड़ी हैं. उन्होंने मालती जोशी से निदा फ़ाज़ली से पहली मुलाक़ात, उनके घरेलू स्वभाव और निजी जीवन से जुड़े कई रोचक प्रश्न किए.
मालती जोशी ने भावुक स्मृतियाँ साझा करते हुए कहा कि निदा साहब को बिछड़े हुए आज दस साल और एक दिन हो गए हैं. उन्होंने कहा कि उनके जीवन में जो भी घटता था, वह शायरी में ढल जाता था. वे बहुत कुछ कहते थे पर बोलकर नहीं, अपनी रचनाओं के ज़रिए कहते थे.
उन्होंने निदा फ़ाज़ली से पहली मुलाक़ात का दिलचस्प क़िस्सा भी सुनाया और बताया कि उन्होंने ग़ज़ल लिखकर ही अपने प्रेम का इज़हार किया था. मालती जोशी ने उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ ‘कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता’ भी गुनगुनाईं और एक शे’र भी सुनाया—
मुमकिन है सफ़र हो आसान, अब साथ भी चलकर देखें,
कुछ तुम भी बदलकर देखो, कुछ हम भी बदलकर देखें.
‘युगसारथी धर्मवीर भारती’ के लोकार्पण के मौक़े पर सूर्यबाला, चित्रा देसाई और लेखक-संपादक गंगाशरण सिंह उपस्थित रहे. सूर्यबाला ने कहा कि इस पुस्तक को देखकर उन्हें बहुत ख़ुशी हुई, क्योंकि इसमें उन्हें एक ही जगह पर बहुत सारे भारती मिल गए. उन्होंने कहा कि इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भारती जी के व्यक्तित्व और रचनात्मक संसार को उनके वरिष्ठों, समकालीनों और उन अनेक लोगों के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें उनका स्नेह प्राप्त हुआ या जिनकी रचना-प्रक्रिया में एक संपादक के रूप में भारती जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है.
अगला सत्र युवा कवियों के कविता-पाठ का रहा, जिसमें पुनीत शर्मा, पराग पावन, अभिषेक शुक्ला और प्रदीप अवस्थी ने अपनी रचनाएँ सुनाईं. इसी दौरान पराग पावन के संग्रह ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ और प्रदीप अवस्थी के संग्रह ‘एक भरम अच्छा जिया’ का लोकार्पण भी किया गया.
बद्रीनारायण की पुस्तक ‘हिंदुत्व का गणराज्य’ के संदर्भ में डॉ. बालाजी चिरडे ने लेखक से संवाद किया. बद्रीनारायण ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब भी एक पुराने स्टीरियोटाइप की छवि बनी हुई है, जबकि संघ ने समय के साथ स्वयं को कई रूपों में बदला है. उन्होंने कहा कि दलित और अन्य पिछड़ी जातियों के बीच संघ का जनसमर्थन बढ़ा है, जो उनसे जुड़ने के लगातार प्रयासों का परिणाम है. उनके अनुसार, संघ समाज के विभिन्न स्तरों पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है और उनकी किताब इसी समझ को विकसित करने का प्रयास करती है.
इसके बाद ‘काव्य-संध्या’ का आयोजन हुआ, जिसमें आभा बोधिसत्व, कमलेश पाठक, चित्रा देसाई, मालवी मल्होत्रा, मोनिका सिंह, शैलजा पाठक और संवेदना रावत ने काव्यपाठ किया. इसी अवसर पर शैलजा पाठक की नई किताब ‘मन कागज़ तन बुलबुला’ का लोकार्पण हुआ. दिन का समापन शैलेश श्रीवास्तव और डॉ. अलका अग्रवाल सिगतिया की भावपूर्ण संगीत-प्रस्तुति के साथ हुआ.
(विज्ञप्ति)
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