गांधी मजबूरी का नहीं, बल्कि मजबूती का पर्याय
नई दिल्ली | गांधी मजबूरी का नहीं, बल्कि मजबूती का पर्याय हैं. वे मजबूरी केवल उन्हीं लोगों के लिए हो सकते हैं जिन्हें सत्य से भय है या जिनके पास उनकी नैतिक और वैचारिक मजबूती की कोई काट नहीं है. इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शुक्रवार को प्रख्यात विचारक और लेखक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी : अहिंसा, सत्य और धर्म’ के विमोचन के मौक़े पर वक्ताओं ने ये विचार व्यक्त किए.
राजकमल प्रकाशन से छपी इस किताब का लोकार्पण साहित्य, पत्रकारिता और बौद्धिक जगत की उपस्थिति में हुआ. कार्यक्रम की शुरुआत राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी के स्वागत-संबोधन से हुई. उन्होंने कहा कि राजकमल प्रकाशन समय-समय पर गांधी और उनके विचारों को नए सिरे से समझने और प्रस्तुत करने वाली महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन करता रहा है और यह पुस्तक उसी परम्परा की एक सशक्त कड़ी है.
इसके बाद विदुषी शिवांगिनी ने भजन-गायन किया. उद्घाटन-भाषण देते हुए महात्मा गांधी के पौत्र और राजनीतिक विश्लेषक राजमोहन गांधी ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि हमले, गालियाँ और गोलियां नेहरू को चोट नहीं पहुँचा सकतीं. ये हमारे देश और उसकी एकता को चोट ज़रूर पहुँचा सकती है.

इस मौक़े पर कवि और चिंतक अशोक वाजपेयी ने प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल से संवाद किया. उन्होंने कहा कि यह किताब हमारे समय को संबोधित करते हुए लिखी गई है. संवाद के दौरान गांधी-विचार, अहिंसा की वैचारिक मजबूती, धर्म और करुणा के आपसी संबंधों पर विस्तार से चर्चा हुई. प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि गांधी अपरिभाष्य नहीं, बल्कि तपस्वी हैं. उन्होंने यह भी जोड़ा कि हमारा समाज तपस्या का सम्मान करता है, मगर तपस्वी का मूल्यांकन उसके नैतिक आचरण और नैतिक आँकलन के आधार पर ही करता है.
यह किताब गांधी को ‘मजबूरी’ नहीं, बल्कि ‘मज़बूती’ के रूप में देखने का वैचारिक आग्रह करती है. समकालीन समय में, जब देश और धर्म दोनों को हिंसा के माध्यम से परिभाषित किया जा रहा है, ऐसे में गांधी की अहिंसा के अर्थ को खोलने वाली यह कृति एक आवश्यक बौद्धिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है और गांधी-विचार की आज की प्रासंगिकता को नए सिरे से रेखांकित करती है.
(विज्ञप्ति)
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