बैडमिंटन | असाधारण विरासत और विदाई

हर उड़ान की एक मंज़िल होती है. कि एक चमकीला दिन शाम में घुल जाता है. कि पूनम का चाँद सूरज की अगवानी में स्वाहा होता जाता है. कि रात के जगमग सितारे सुबह के आगे नतमस्तक हो जाते हैं. कि जैसे अभी जो बसंत है उसे ग्रीष्म में पिघल जाना है. कि प्रसिद्धि के आकाश में अनंत ऊंचाइयों वाली एक उड़ान अंततः पूर्ण विराम की अवस्था में आ जाती है. कि एक समय आता है जब खिलाड़ी को अंततः खेलों को अलविदा कहना ही होता है. कि उसके खेल जीवन की यवनिका का पटाक्षेप होना होता है और उसका खेल जीवन दैनंदिन जीवन में समाहित हो जाता है. जैसे कि साइना नेहवाल स्वीकारती हैं कि हां, उनके असाधारण उपलब्धियों वाले लंबे कॅरिअर का समापन हो चुका है. अभी नहीं, दो साल पहले ही.

वो साल 1990 का बसंत था. तारीख़ 17 मार्च. हिसार में एक लड़की जन्मती है. बसंत में जन्मी लड़की ख़ुद बसंत हो जाना चाहती है. लेकिन दिक्कत ये है कि पितृसत्ता अपने हिस्से से अधिक पर क़ाबिज हुआ चाहती है. उसे लड़कियों के एक हिस्से को भी अपनी शक्ति के साए में रखना है. कि उन लड़कियों की चाहतों के पंख को उनकी परवाज़ से पहले ही काट दिया जाता है. कि उनको जन्मने से बहुत बहुत पहले ही होम कर दिया जाता हैं.

पर हर क्रिया की समान प्रतिक्रिया होती है. दबाव जितना ज्यादा होता है उतना ही ज्यादा प्रतिरोध होता है. दुनिया की ख़ूबसूरती ही इस बात में है कि हर एक समान नहीं है. बहुत से माता-पिता पितृसत्ता के साए में मुक्त हैं. उन्हें अपनी छोरियों और उनकी क़ाबिलियत में तनिक संदेह नहीं होता. वे मानते हैं ‘कि म्हारी छोरियां छोरों सुं कम हं के.’ फिर उन्हें योग्य गुरुओं का वरदहस्त प्राप्त होता है जो उनकी योग्यता को पहचानकर उसे तराशते है. तब कई दैदीप्यमान नक्षत्रों का उदय होता है. उनमें से एक का नाम साइना नेहवाल है.

साइना अपने माता-पिता की दूसरी संतान थी. उनकी एक बड़ी बहन थी. अपनी आत्मकथा में साइना लिखती हैं कि ‘उनकी दादी लड़का चाहती थीं. इसीलिए जब साइना पैदा हुई, तो वे एक माह तक उन को देखने नहीं आईं.’ उनके पिता हिसार में कृषि वैज्ञानिक थे. अपने पिता की पदोन्नति पर जब साइना परिवार के साथ हैदराबाद आईं, तो पितृसत्ता के प्रतिकार के लिए और ख़ुद को साबित करने के लिए खेल चुना, जैसा कि हरियाणा की तमाम लड़कियां चुनती हैं. खेलों में उनके सामने दो विकल्प थे. या तो वे बॉक्सिंग, कुश्ती या निशानेबाजी जैसे उन खेलों में महारत हासिल करें जो सामान्यतः पुरुषों के ‘हलके’ माने जाते हैं या फिर पावर के इस खेल से इतर अपनी ख़ुद की इच्छा के दूसरे खेलों के आकाश में अपने पंखों को हौसलों की उड़ान दें.

पहले उन्होंने मार्शल आर्ट कराटे को चुना और ब्राउन बेल्ट हासिल की. लेकिन जल्द ही उस खेल को चुन लिया जिसमें उनके माता-पिता ने महारत हासिल की हुई थी. वो खेल जो उनकी नियति था. वो खेल जो बल्ले और चिड़िया का खेल था. वो खेल जिसमें चिड़िया को मन मुताबिक उड़ान दी जा सकती थी. वो खेल जो उसके सपनों की उड़ान का रूपक था. ये खेल बैडमिंटन था.

जिस समय उन्होंने बैडमिटन खेल को चुना या नियति ने इस खेल के लिए उनको चुना, उस समय उनकी उम्र आठ साल थी. और जब एक बार उन्होंने हाथ में रैकेट पकड़ा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा जब तक कि उसने प्रतिस्पर्धात्मक खेल से विदा लेकर रैकेट रख नहीं दिया.

वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस समय जानी गईं, जब साल 2008 में वे विश्व जूनियर चैंपियन बनीं. उसी साल बीजिंग ओलंपिक में बैडमिंटन के महिला एकल के क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंची. ऐसा करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं. अगले ही वर्ष उन्होंने इंडोनेशिया ओपन जीतकर बीडब्ल्यूएफ सुपर सीरीज़ का ख़िताब जीतकर पहली भारतीय बनने का गौरव हासिल किया और एक साल बाद साल 2010 में वे राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन बनीं. लंदन ओलंपिक 2012 में कांस्य पदक जीतकर वे बैडमिंटन में भारत की पहली ओलंपिक पदक विजेता बनीं. साल 2015 में उन्होंने एकल बैडमिंटन रैंकिंग में विश्व नंबर 1 बनकर एक और इतिहास रचा. ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला और प्रकाश पादुकोण के बाद शिखर पर पहुंचने वाली देश की दूसरी शटलर के रूप में अपनी पहचान बनाई. उसी वर्ष बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली देश की पहली शटलर भी बनीं. हालांकि कैरोलिना मारिन से हार कर रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा. साल 2014 उबेर कप में उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की और अपराजित रहीं जिससे भारत को उबेर कप में पहला कांस्य पदक जीतने में मदद मिली. उन्होंने कुल मिलाकर 24 अंतर्राष्ट्रीय ख़िताब जीते जिसमें 10 सुपर सीरीज़ ख़िताब हैं.

साइना का कोर्ट कवरेज कमाल का था. वे जिस सहजता और सरलता से और ज्यामितीय गुणा भाग से शटल का अनुसरण करतीं और कोर्ट को नापतीं, वो किसी लयकारी को देखने या फिर किसी धुन को सुनने से कम ना था. वे बैक कोर्ट की उस्ताद खिलाड़ी थीं और रक्षण उनका फोर्टे. पावर और स्टेमिना उनमें अपार था और किलिंग इंस्टिक्ट कूट कूटकर भरी. जोखिम उठाना उन्होंने सीखा था. वे खेल के शुरुआती क्षणों से ही आक्रमण कर विपक्षी को हतप्रभ कर देतीं और उन पर बढ़त बना लेतीं. उनमें विपक्षी के खेल को समझकर रणनीति बनाने की कमाल की चतुराई थी. हां, नेट पर खेल में पकड़ ना होना उनके खेल को वल्नरेबल बनाता और उनकी चोटें उनकी सफलता की सबसे बड़ी बाधा बनतीं.

लेकिन उनकी असाधारण उपलब्धियां उन्हें भारत की महानतम बैडमिंटन खिलाड़ी बनाती हैं. आप कह सकते हैं कि पीवी सिंधु उनसे बड़ी खिलाड़ी हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धियां साइना से कहीं ज्यादा हैं. उन्होंने दो ओलंपिक पदक जीते और विश्व चैंपियनशिप भी. लेकिन किसी खिलाड़ी का इतिहास में स्थान निर्धारण केवल उसकी उपलब्धियों भर से नहीं होता,बल्कि इस बात से भी होता है कि किसने खेल को और आने वाली पीढ़ी को किस तरह और कितना प्रभावित किया. उनका खेल पर इंपैक्ट कैसा और कितना था. साइना का प्रभाव उनके आंकड़ों और पदकों से कहीं अधिक व्यापक है. वह लाखों लोगों के लिए आदर्श और प्रेरणास्रोत बन गईं.

जिस समय साइना खेल परिदृश्य पर उभरीं,उस समय पुरुषों में तो प्रकाश पादुकोण,सैयद मोदी और पुलेला गोपीचंद जैसे बड़े नाम थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां हासिल की थीं.लेकिन महिलाओं में ऐसा कोई नाम ना था. अमी घिया या अमिता कुलकर्णी जैसे दो एक नाम थे जो लोकल सर्किट में तो बड़ा नाम थे,लेकिन उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी पहचान न थीं. ये वो समय था जब विश्व बैडमिंटन पर चीन का दबदबा था. चीन की दीवार खिलाड़ियों के लिए अभेद्य थी. साइना ने अपने असाधारण खेल से चीन इस अभेद्य दीवार को लांघा ही नहीं उसे ध्वस्त किया. साइना ने चीनी खिलाड़ियों की जमात के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वे बड़ी सफलताएं प्राप्त की, जो किसी भी खिलाड़ी का सपना हो सकती थीं, और उस समय तक भारतीय महिला खिलाड़ियों से लगभग असंभव दूरी पर अवस्थित थी. साइना का महत्व इस दूरी को मिटाकर असंभव को संभव बनाने में है.

दरअसल उन्होंने अपने खेल और उपलब्धियों से एक ऐसा रास्ता बनाया जिस पर चलकर आगे के खिलाड़ियों ने सफलता प्राप्त की. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने की उम्मीद की लौ भी जगाई और ये हिम्मत,हौसला और विश्वास भी भरा कि चीन की दीवार या कोई भी बाधा पार की जा सकती है,अगर आपने हौसला,जज्बा,लगन और कठिन परिश्रम करने का माद्दा है तो.

उनकी क़रीब-क़रीब हर उपलब्धि से पहले लगा ‘पहली’ विशेषण या फिर ‘पहली भारतीय खिलाड़ी’ और ‘पहली भारतीय महिला खिलाड़ी’ संज्ञा बैडमिंटन खेल और भारतीय खेल परिदृश्य पर उनके इंपैक्ट की कुंजी है. वे एकमात्र भारतीय हैं जिन्होंने बीडब्ल्यूएफ के प्रत्येक प्रमुख व्यक्तिगत स्पर्धा में कम से कम एक पदक जीता है, यानी बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप, बीडब्ल्यूएफ़ विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक पदक. वह ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, बीडब्ल्यूएफ़ विश्व चैंपियनशिप के फ़ाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय हैं और बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय हैं. 2006 में नेहवाल फोर स्टार टूर्नामेंट जीतने वाली पहली भारतीय महिला और सबसे कम उम्र की एशियाई खिलाड़ी बनीं. वह सुपर सीरीज़ ख़िताब जीतने वाली पहली भारतीय भी हैं. वे राष्ट्रमंडल खेलों में दो एकल स्वर्ण पदक (2010 और 2018) जीतने वाली पहली भारतीय भी बनीं.

भारतीय क्रिकेट टीम ने कई विश्व प्रतियोगिताएं और वर्ल्ड कप जीते हैं, लेकिन जो प्रभाव और महत्व 1983 के विश्व कप जीतने का है, वैसा किसी और का नहीं. यही बात साइना के साथ है. साइना जैसा महत्व और इंपैक्ट किसी और का कहाँ.

2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर और खेल जगत से परे जाकर सुपर स्टारडम हासिल करके भारत में बैडमिंटन को हमेशा के लिए बदल दिया. उन्होंने साबित किया कि भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय खेलों के उच्चतम स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं और जीत हासिल कर सकती हैं. उनकी सफलता ने पीवी सिंधु सहित भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों की एक पूरी पीढ़ी को पेशेवर रूप से इस खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.

दरअसल वे पी टी उषा के बाद भारतीय खेल जगत की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली आईकन हैं. जिस तरह से 1984 के बाद पीटी उषा हर घर का जाना पहचाना नाम बन गई थी,ठीक उसी तरह से 2012 के बाद साइना नेहवाल भी. उन्होंने साबित किया कि ‘छोरी छोरी स कम ना सै’.

साइना के खेल खेल मैदान से सक्रिय अनुपस्थिति भारतीय बैडमिंटन में एक ऐसा निर्वात बनाती है जिसकी भरपाई अगर असंभव नहीं तो बहुत बहुत कठिन ज़रूर है.

खेल मैदान से विदा साइना.

कवर | इंस्टाग्राम से साभार


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