फीफा डायरी | ट्रॉफ़ी के साथ ही दुनिया का दिल जीता स्पेन ने
फ़ाइनल मैच की पूर्व संध्या पर आयोजित एक विशेष प्रेस कार्यक्रम में स्पेन और अर्जेंटीना के कोच और कप्तानों के अलावा खेल शख्सियतें भी मंच पर थीं. उनमें से एनएफएल के दिग्गज टॉम ब्रैडी और एनबीए के दिग्गज खिलाड़ी केविन ड्यूरेंट के अलावा महानतम टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच भी थे. वे मेस्सी से सवाल पूछ रहे थे, ‘इतने बड़े फ़ाइनल से पहले के प्रेशर को वे कैसे संभालते हैं.’
दरअसल ये समस्या मंच साझा कर रहे अपने अपने खेल के दो महानतम खिलाड़ियों की साझा समस्या थी. वे दोनों हो गोट को दर्जा पा चुके हैं और अमरत्व को पा लेने की चाह में डूबे हैं. वे दोनों 39 बसंत पार 40वें साल में हैं. पर हार नहीं मान रहे हैं. वे खेल नहीं छोड़ रहे हैं और खेल उन्हें. उम्र के इस पड़ाव पर भी वे शानदार खेल दिखा रहे हैं.
अगर मेस्सी लगातार दो विश्व कप जीतकर अमर हो जाना चाहते थे, तो नोवाक अपना 25 वा ग्रैंड स्लैम जीतकर. नोवाक ने जनवरी 23 में अपना 24 वां ग्रैंड स्लैम जीता था. उसके बाद से वे ग्रैंड स्लैम के दो फ़ाइनल और छह सेमीफ़ाइनल हार चुके हैं. वे खिताब के करीब आते हैं और चूक जाते हैं. उधर मेस्सी भी अपने दूसरे खिताब से एक कदम की दूरी से चूक जाते हैं. दोनों खेलों के इतिहास में अमर होते-होते रह जाते हैं. ये विधि का विधान जो ठहरा. अमरत्व देवताओं का विशेषाधिकार है. माणुस की देवता बनने की चाह कहाँ पूरी होती है. मेस्सी और नोवाक अपनी समस्त मानवीय कमजोरियों के साथ सामान्य मानुस ही ठहरे.
रविवार की शाम को अमेरिका के न्यूजर्सी में खेले गए फीफा विश्व कप फ़ुटबॉल के फ़ाइनल को जीतकर अर्जेंटीना की टीम मेस्सी की विश्व कप से विदाई को अविस्मरणीय बना देना चाहते थे. पर ऐसा हो न सका. ये एक बेहद कठिन मुक़ाबला था. मैच 120 मिनट तक गया और एक गोल हुआ. तीसरा स्थान निर्धारित वाला फ्रांस और इंग्लैंड का मैच मनोरंजन से भरपूर था जिसमे 10 गोल हुए. ये फ़ुटबॉल का टी ट्वेंटी मैच था, जबकि फ़ाइनल तनाव से भरा लेकिन कुछ हद तक नीरस मैच था. फ़ुटबॉल का टेस्ट मैच.
ये फ़ाइनल मैच दो महाद्वीप की फ़ुटबॉल और उसकी श्रेष्ठता का द्वंद्व भर नहीं था, बल्कि रक्षण और आक्रमण के बीच का द्वंद्व भी था. एक तरफ कोपा कप विजेता अर्जेंटीना का आक्रमण था जिसने फ़ाइनल से पूर्व 19 गोल किए थे,तो दूसरी तरफ यूरो चैंपियन का रक्षण था जिसने अब तक केवल एक गोल खाया था. एक तरफ संयमित और अनुशासित टीम वर्क था, तो दूसरी तरफ कुछ उच्छृंखल और वैयक्तिक प्रतिभा और पराक्रम का उपक्रम था. ये एक बीती जाती पीढ़ी और नवागत पीढ़ी के बीच का द्वंद्व था. ये विदाई लेते मेस्सी और उदित होते नए सितारे यमल के बीच मुक़ाबला था. ये बार्सिलोना बनाम बार्सिलोना था.
स्पेन की टीम निर्विवाद रूप से तकनीकी रूप से श्रेष्ठ थी. ये उन्होंने पिछले सात मैचों में दिखाया था. अर्जेंटीना उनसे पार पा सकने में असमर्थ थी. ये अर्जेंटीना की टीम जानती थी. उन्होंने पराग्वे वाली शैली को अपनाया. फ्रांस शानदार खेलकर और पूरे मैच पर अपना नियंत्रण रखते हुए भी बमुश्किल 1-0 से जीत पाई थी. पैराग्वे ने फ़िजिकल होना चुना, रफ़-टफ़ खेलना चुना. अर्जेंटीना के सामने और कोई रास्ता नहीं था. फ़ाइनल पहुंचकर कोई हारना नहीं चाहता. उन्होंने भी पैराग्वे का रास्ता चुना. पूरे मैच पर स्पेन ने खेल पर पूरा नियंत्रण रखा. बस वे गोल करने में असमर्थ रहे. इसका कारण अर्जेंटीना की आक्रामक व फ़िजिकल टैक्लिंग के अलावा गोलकीपर मार्टिनेज भी कारण रहे. मार्टिनेज़ ने इस मैच में कुल 11 सेव किए. ये मैच उन्होंने अपने लिए अविस्मरणीय बना दिया. वे अर्जेंटीना के एकमात्र खिलाड़ी थे जिन्होंने अंतिम समय तक संघर्ष किया.
स्पेन के दबदबे को इस बात से समझ जा सकता है कि स्पेन के गोल पर 20 अटेम्प्ट के मुकाबले अर्जेंटीना के कुल जमा दो अटेम्प्ट थे. उसकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई थी कि वे रेगुलर समय में तो गोल पर एक अटेम्प्ट भी नहीं ले पाए.
स्पेन ने फ़ाइनल जीता. फीफा ट्रॉफ़ी जीती. खेल जीता. श्रेष्ठता की लड़ाई जीती. उसने अपने सुंदर खेल से लोगों का दिल भी जीता. दरअसल स्पेन की ये जीत टीम की जीत है. टीम में न कोई मेस्सी था, न एम्बाप्पे था, न अर्लिंग हॉलैंड था, न केन था. ये एक टीम थी और उसके 11 सदस्य थे. जीत में सबका बराबरी का योगदान था. यमल का भी. जितना योगदान बेहतरीन गोलकीपर का था, उतना फ़ुल बैक का, उतना ही मिडफ़ील्ड का और उसी अनुपात में फ़ॉरवर्ड का. यहां टीम पहले और खिलाड़ी की इमेज बाद में थी. स्पेन के लिए सबसे ज्यादा गोल करने वाले ओयरजाबल को 60 मिनट बाद ही रिप्लेस कर दिया गया.
यह अनुशासन की जीत थी, धैर्य की जीत थी, आपसी तालमेल और समन्वय की जीत थी, एकता की जीत थी. ये एक टीम की जीत थी. ये फ़ुटबॉल की जीत थी.
जिस तरह के दृश्य मैच की समाप्ति के बाद आंखों के सामने आए, वे शर्मनाक थे. खेल हमें हार में भी विनत होना सिखाता है. शालीन होना सिखाता है. ग्रेसफुल होना सिखाता है. हार को भी गरिमामय तरीके से स्वीकार करने का साहस होना चाहिए. यहां खेल शर्मसार हुआ.
एक ऐसा फ़ाइनल जिसे अर्जेंटीना से कहीं ज्यादा उसके समर्थक भूलना चाहेंगे. हार के कारण नहीं. खेल भावना से च्युत होने के कारण भी.
और हां मेस्सी के आंसुओं के कारण भी.
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