बायलाइन | इलाहाबाद में लू शुन की तलाश

  • 4:28 pm
  • 18 October 2026

प्रयाग के ज़िक्र से भले ही सिर्फ़ धर्मनगरी का बोध हो, मगर इलाहाबाद का नाम आता है, तो एक साथ इतिहास और राजनीति के साथ ही सामाजिक और साहित्यिक चेतना से संपन्न शहर की तस्वीर सामने आ जाती है. कुछ ग़ज़ब प्रभाव है इस नाम का—लूकरगंज और ख़ुसरोबाग़ रोड वाला इलाहाबाद, फ़िराक़ और नेहरू का इलाहाबाद. लगता है कि इस पूरे भूमंडल पर कर्म-विचारों से सुसंस्कृत लोग अगर कहीं मिलते हैं तो सिर्फ़ इलाहाबाद में.

किताबें देखनी हों तो कभी इलाहाबाद चलो, फ़ुटपाथ पर भी एक से एक किताब मिल जाएगी. साहित्य-वाहित्य तो बेहिसाब मिलेगा ही, आर्ट और कल्चर पर भी एक-एक दुकान पर इतनी किताबें मिल जाएँगी कि दंग रह जाओगे. अब वहाँ के लोगों का ‘टेस्ट’ ही फ़र्क है. वो ख़रीदते हैं, इसलिए दुकानदार रखते भी हैं.

समय-समय पर, अलग-अलग लोगों से इतनी ख़ूबियाँ सुनीं कि इलाहाबाद छोड़कर बरेली में पैदा होने पर कभी-कभी शर्म तक आने लगती. ख़ासतौर पर तब, जब किसी इलाहाबादी से सामना होता. उनमें से कुछ की कमज़ोरी है कि इलाहाबाद का अगर कुक्कुर भी मिल जाए कहीं तो उसकी इतनी ख़ूबियाँ गिनाएंगे, इतनी ख़ूबियाँ गिनाएंगे कि सामने वाला अहसास-ए-कमतरी में डूब जाए और तब तक गिनाते रहेंगे, जब तक वह पानी-पानी न हो जाए.

लुब्ब-ए-लुआब यह कि तमाम ख़ूबियों वाले इस शहर को लेकर ऐसी ख़ुशफ़हमियां पाल लीं कि पहली बार जब परखने का मौक़ा आया तो ख़ुद को ही लगा मानो इम्तिहान देने जा रहा हूँ. तलाश थी लू शुन की कहानियों के संकलन की और जो खोज शुरू की तो फिर तमाम मिथक एक-एक करके टूटते ही चले गए.

बरेली की गिनती तो यों भी ‘झुमका बाज़ार’ से आगे नहीं होती, मगर लखनऊ और कानपुर के कई ठिकानों की थाह लेने के बाद इलाहाबाद ही उम्मीद की आख़िरी किरण थी. मैंने प्रतापगढ़ी टर्न टु इलाहाबादी प्रवीण को पकड़ा. काहे से कि वह अख़बार के सांस्कृतिक संवाददाता हैं, इसलिए सही ठिकाने पर पहुँचने का भरोसा ज़्यादा मज़बूत था.

बहुचर्चित कॉफ़ी हाऊस के बाहर निकलकर तलाश शुरू की. सबसे ज़्यादा उम्मीद थी अश्क जी के नीलाभ प्रकाशन से. ख़ुद नीलाभ की चयनित किताबों में अपनी किताब पा जाने का पूरा भरोसा था, मगर वहाँ तो दुकान ही बंद निकली. पता चला कि नीलाभ अब इलाहाबाद के बजाय दिल्ली में रहकर टीवी के कोई सीरियल बना रहे थे. ऐन बगल में लोकभारती प्रकाशन में घुसते ही काउंटर पर खड़े सज्जन से पूछा तो एक क्षण रुककर उन्होंने अंदर किताबों के ढेर से घिरे हुए नौजवान की तरफ़ इशारा किया. थोड़ी पूछताछ के बाद उन्होंने अफ़सोस जताया कि वे ‘ऐसी किताबें’ नहीं रखते.

बाहर आए तो क़रीब ही व्हीलर्स का बड़ा-सा शोरूम दिखा. लपक कर अंदर पहुँचे तो वहां रखे बुक स्टैंड पर बनारस, दिल्ली, नेपाल और खजुराहो नामधारी रंगीन किताबों के बीच हेरल्ड रॉबिन्स से लेकर चार्ल्स डिकेन्स तक सब मौजूद थे. धर्म और दर्शन के तत्व विधान पर मोटे-मोटे ग्रन्थ थे. हिंदी के भी ढेर सारे उपन्यास क़रीने से लगे थे. काउंटर के पीछे खड़े युवक के ख़ुशनुमा चेहरे पर लू शुन का नाम सुनते ही परेशान झलकी. पूछा, ‘नहीं मैं समझा नहीं. यह किसी किताब का नाम है या लेखक का?’ इस सवाल का कोई जवाब देने से पहले ही उनके सहकर्मी ने बात समझते हुए एक और सवाल दागा, ‘ये लिखते क्या है? कविता, कहानी या और कुछ?’ अब कोई चारा नहीं रह गया था सो यह कहते हुए बाहर निकल आए, ‘लिखते हैं नहीं. लिखते थे कभी, बेचारे!’

इलाहाबादी प्रवीण ने इतने पर भी हिम्मत नहीं हारी. यूनिवर्सल बुक डिपो और दीगर नामों वाली आस-पास की तीन-चार और दुकानों पर ले गए. वहाँ कुत्तों पर बेशुमार किताबें थीं. ‘स्नेक’ और ‘वुल्फ़’ शीर्षक वाली आकर्षक और चिकने कवर वाली किताबें थीं, सब्ज़ी उगाने से लेकर घर सजाने तक के विषयों के अलावा जिम्नास्टिक, कराटे, पियानो, बेबी केयर, हेयर केयर और भी न जाने कितना अल्लम-गल्लम. उन ठिकानों पर हमारे पूछते ही बहुत सौम्य-सा जवाब मिलता, ‘नहीं जी, हम तो यह नाम ही पहली बार सुन रहे हैं.’ बाहर निकलते हुए देखा कि ख़ूबसूरत पोशाकों में ख़ूब गमकती युवतियों का झुंड शो-केस में सजी भेड़िये और साँपों वाली किताबों के सामने खड़े होकर चुहलबाज़ी में मसरूफ़ था.

एक और कोशिश की अगले रोज़. किसी को याद पड़ा कि यूनिवर्सिटी के पीछे किताबों की दुकानों से थोड़ा अलग कोने में एक दुकान है, जहाँ सिर्फ़ रूसी-चीनी साहित्य मिलता है. खोजते-खोजते पहुँचे तो लगभग ख़ाली पड़े शेल्फ़ वाली दुकान में बैठे एक बुज़ुर्ग कोई ख़त लिख रहे थे. उन्होंने बताया कि तीन-चार बरस पहले ही वह सब बंद हो गया. अब कहाँ किताबें! धूल से अटी शेल्फ़ पर रखी किताबें उलट-पलटकर देखीं तो रूसी भाषा की कुछ किताबों के बीच मार्क्सवादी पार्टी का मैनिफ़ेस्टो निकल आया. बुज़ुर्गवार का इसरार था कि कोई किताब हमारे काम की हो तो हम ले जा सकते हैं, मुफ़्त.

बाहर फ़ुटपाथ पर रखी किताबों में ‘न्यूज़वीक’ का एक अंक पड़ा था, जिस पर भड़कीले कपड़ों में गहनों से लकदक एक रूसी प्रौढ़ा की मुस्कराती हुई तस्वीर थी, जिसके हाथ की प्लेट में केकड़ा था और पीछे से झाँकती युवती के हाथों में शराब का गिलास. विखंडित सोवियत रूस के नवधनाढ्यों पर कवर स्टोरी की तस्वीर थी वह. यह मानकर संतोष किया कि लू शुन का देश अभी बाक़ी है. कुछ और आगे चलकर देखा. ‘हॉट स्टफ़’—इलाहाबाद का नामी रेस्तराँ, जो स्कूल-कॉलेज के लड़के-लड़कियों की आरामगाह तो था ही, मध्य वर्ग के शहरियों के लिए ‘स्टेटस सिंबल’ भी था. पास ही बिक रहा था रवीन्द्र कालिया का अख़बार, जिसमें ममता कालिया जिज्ञासु लड़कियों को उनके ‘बॉय फ़्रेंड्स’ की मनोभावनाओं का विस्तार से विश्लेषण करके उन्हें उपकृत करती हैं. सुना हुआ इलाहाबाद मिथक निकला, बस!

(अमर उजाला, 4 अप्रैल 1996)

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