समंदर की उंगलियों के निशानः ज़िन्दगी के राज़ या शंख की ज़बान!
कुछ दिन पहले एक नेकदिल मौसी ने, अपनी पुरानी मुस्कुराहट के साथ, रजनी को एक अजीब-ओ-ग़रीब तोहफ़ा भेजा—वो थे शंख, शंकु या कोन या यूं कहिए तीन समुद्री सीपियाँ. ये कोई छोटी सीपियाँ नहीं थीं ख़ासे बड़े शंख थे. उनमें से एक ने तो आते ही दिल चुरा लिया—जैसे भीड़ भरे बाज़ार में कोई अजनबी चेहरा अचानक अपना-सा लगने लगे.
मैंने मालूमात की तो पता चला कि दरअसल ये कोन घोंघे (Cone snails) के घर होते हैं—समंदर के वो ख़ामोश बाशिंदे (या शिकारी), जो अपने इस ख़ूबसूरत खोल के अंदर पनाह लेते हैं. ये नर्म-बदन मोलस्क होते हैं, मगर ऐसे शातिर शिकारी कि हैरत हो. हरपून नाम के अपने एक छोटे-से काँटेदार दाँत से शिकार में इतने सलीक़े से ज़हर उतार देते हैं, जैसे कोई उस्ताद अपने हुनर को दिखा रहा हो. दिन के वक़्त ये अक्सर रेत या मूंगे के ढेरों में छुपे रहते हैं—ख़ामोश, मगर घात लगाए.
मगर जनाब इसकी जो चीज़ दिल बाँध लेती है वो है इसका नक़्श-ओ-निगार है, इसका हुस्न है. ऐसा लगा जैसे किसी ने प्यार से, इश्क़ में डूबकर, हर बिंदु और हर लकीर को जगह दी हो— अपने आप में मुकम्मल, मगर साथ मिलकर जैसे कोई ख़ामोश ग़ज़ल कह रहे हों. मैंने ज़रा और खोजा तो मालूम हुआ, इसे लेटर्ड कोन (Lettered cone) कहा जाता है. “लिखा हुआ शंख”; वाह नाम भी क्या ख़ूब है!
अब सोचिए, जब समंदर के इन ख़ामोश जीवों में भी “पढ़े-लिखे” और “बिन पढ़े-लिखे” का फ़र्क़ है तो यक़ीनन इन “पढ़े-लिखे” में कहीं न कहीं शायर भी होंगे, अफ़सानानिगार भी और अदब के उस्ताद भी. जी, यह जो मेरे हाथ में है ऐसा लगता है जैसे इसके नक़्श क़ुदरत के साथ क़ाफ़िया मिलाते हों, जैसे हर लाइन में कोई रदीफ़ छुपी हो.
ऊपर से देखें तो मानो वनीला आइसक्रीम में चॉकलेट के टुकड़े जड़े हों, मीठे और मासूम—किनारों पर नज़र डालें तो जैसे किसी नाज़ुक साँप की खाल हो—नक़्क़ाशीदार, चमकदार, और गहरा राज़ लिए. हाथ में उठाइए तो एक अजीब-सी ख़ुशी महसूस होती है, और इसकी अंदरूनी गोलाई में अब भी नमकीन समुंदरी हवा की हल्की-सी महक बसी है, शायद हिंद महासागर की कोई भूली-बिसरी याद.
हाँ, वो जो लाल सा धब्बा दिख रहा है—घबराइए मत, वो बस ज़माने की एक छोटी-सी शरारत है, थोड़ा-सा प्लास्टिक चिपका हुआ है, जिसे मैं फ़ुर्सत में निकाल दूँगा.

कहा जाता है कि इस लेटर्ड कोन को ‘लेपर्ड कोन’ भी कहते हैं. जैसे इसके नाम से ज़ाहिर है, इसके ऊपर बने गहरे भूरे निशान किसी पुरानी तहज़ीब की लिखावट हों, जैसे कोई भूली-बिसरी लिपि— कोई ऐसी ज़बान, जो अब खो चुकी है, मगर उसके अल्फ़ाज़ अब भी इस खोल पर ज़िंदा हैं. या फिर जैसे कोई राज़, जो अभी तक पढ़ा नहीं गया.
कुछ लोग कहते हैं कि ये निशान, ये पैटर्न इंसानी क्रोमोसोम जैसे लगते हैं—जैसे ज़िन्दगी की बुनियादी लिखावट- जैसे ख़ुद क़ुदरत ने अपने राज़ यहाँ दर्ज़ कर दिए हों. शायद ये शंख अपनी सतह पर वही कहानी लिख रहा है—ज़िन्दगी की या जेनेटिक्स की, जो अब तक हमारी समझ से बाहर है.
फिलहाल, ये ख़ूबसूरत मगर ख़तरनाक राज़दार—अपने राज़ अपने ही “हर्फ़ों” में अपनी दास्तान छुपाए बैठा है.
समंदर के जानकार बताते हैं कि ऐसे शंख कई तरह के होते हैं—जैसे Geography Cone, Textile Cone, Marbled Cone, Magic Cone, Crown Cone, Ivory Cone वगैरह, मगर हर एक का अंदाज़ अलग, हर एक की कहानी जुदा.
इन सीपियों से इंसान का रिश्ता भी नया नहीं है—पाषाण युग से लोग इन्हें इकट्ठा करते आए हैं. कभी सिक्कों की तरह, कभी ज़ेवर बनाकर, कभी सौदेबाज़ी के लिए. कहते हैं, सदियों पहले जापान में लोग अपनी जान जोखिम में डालकर इन्हें ढूँढने समंदर में उतरते थे. फिर इनके कंगन बना कर अमीर घरानों की औरतों के हाथों में सजाते थे. एक ऐसा ज़ेवर, जिसकी चमक में ख़तरे की हल्की-सी परछाईं भी शामिल होती थी.
अगर आप कभी ट्रॉपिकल, यानि गर्म इलाक़े वाले, समंदर के किनारे टहल रहे हों तो एक बात याद रखिएगा – इस ख़ूबसूरत शंख को छूना मत – इस से बस दूर से ही मोहब्बत करना क्योंकि इसके अंदर जो बाशिंदा रहता है वो समुंदर की “नागिन सुंदरी” जैसा है. उसका ज़हरीला कांटेदार दाँत पल भर में जिस्म को सुन्न कर ख़त्म कर सकता है. इंसानों के लिए ये बेहद ख़तरनाक है. इसकी नस्ल के कुछ भाइयों को मज़ाक में सिगरेट स्नैल भी कहा जाता हैं क्यूंकि इसके डंक के बाद आपके पास बस एक आख़िरी सिगरेट पीने का वक़्त ही बचता है.
मगर यहाँ इसके क़िस्से का मोड़ दिलचस्प हो जाता है और इसकी असली नफ़ासत यहाँ खुलती है—यही ज़हर, जो मौत का पैग़ाम लाता है अब इंसानी ज़िन्दगी को बचाने का वाइज़ बन रहा है.
तंत्रिका विज्ञान (न्यूरोसाइन्स) इस ज़हर पर रिसर्च कर ऐसी दवाइयाँ बना रहा हैं जो एल्जाइमर रोग, पार्किंसंस रोग, अवसाद और मिर्गी जैसी बीमारियों को ठीक करने में मददगार हो सकती हैं. यहाँ तक कि इससे एक ऐसी दर्दनिवारक दवा भी बनी चुकी है जो मॉर्फ़ीन से हज़ार गुना ज़्यादा ताक़तवर है मगर उस दावा की लत नहीं लगाती.
तो हज़ूर, अगली बार अगर रेत में ऐसा कोई ख़ूबसूरत शंख नज़र आए तो उसे बस दूर से सराहिए और सलाम कीजिए, क्योंकि वो एक नन्हा-सा शाहकार जिसके हर्फ़ों में ज़िन्दगी के राज़ छुपे हैं और जिसकी ख़ामोशी में समंदर अब भी बोलता है – महज़ एक सीपी नहीं है ये या तो दुनिया बदल सकता है या आपका दिन बहुत जल्दी ख़त्म कर सकता है.
ये कैसा ख़त लहरों ने लिख छोड़ा है किनारों पर,
हर इक हर्फ़ में है राज़ जो कोई पढ़ नहीं पाता.

सम्बंधित
तमाशा मेरे आगे | सराय रोहिल्ला, बचपन और गाड़िया लोहार
तमाशा मेरे आगे | एक क़ब्रिस्तान जहाँ ख़ुशी बसती है
तमाशा मेरे आगे | कुछ इश्क़ किया कुछ काम
अपनी राय हमें इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.
अपना मुल्क
-
हालात की कोख से जन्मी समझ से ही मज़बूत होगा अवामः कैफ़ी आज़मी
-
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता
-
सहारनपुर शराब कांडः कुछ गिनतियां, कुछ चेहरे
-
अलीगढ़ः जाने किसकी लगी नज़र
-
वास्तु जौनपुरी के बहाने शर्की इमारतों की याद
-
हुक़्क़ाः शाही ईजाद मगर मिज़ाज फ़क़ीराना
-
बारह बरस बाद बेगुनाह मगर जो खोया उसकी भरपाई कहां
-
जो ‘उठो लाल अब आंखें खोलो’... तक पढ़े हैं, जो क़यामत का भी संपूर्णता में स्वागत करते हैं