संवाद बुकशेल्फ़ | आत्मकथा, अफ़साने और घुमक्कड़ी

संवाद बुकशेल्फ़ | ऐसे में जब शहरी लैंडस्केप से किताबों की दुकानें ग़ायब होती जा रही हैं और ऑनलाइन ठिकाने या प्रकाशक ही किताबें ख़रीदने का अकेला ज़रिया बनते जा रहे हैं, यह स्तंभ हिंदी और अंग्रेज़ी की नई-पुरानी किताबों से आपका परिचय कराने और उनके बारे में मुख़्तसर जानकारी देने की कोशिश है. इनमें संपादक की पसंद की किताबें भी शामिल होंगी. पढ़ने वालों की सहूलियत के लिए किताबों की ऑनलाइन उपलब्धता के लिंक उनके शीर्षक में ही निहित हैं. -सं

मैं बरबाद होना चाहती हूँ | मलिका अमर शेख

    मलिका अमर शेख उस समय मात्र उन्‍नीस बरस की थीं जब वे मराठी के युग-प्रवर्तक कवि नामदेव ढसाल के साथ विवाह-बन्धन में बँध गईं. लेकिन जल्द ही यह शादी टूट गई. दलित पैंथर्स के सह-संस्थापक नामदेव न तो एक पति के रूप में, नपिता के रूप में, और न ही एक पुरुष के रूप में वैसे निकले जैसी उम्मीद मलिका ने की थी
    यह मुख्यतः: उस विवाह की कहानी है, जिसमें हम उस स्त्री से मिलते हैं जो एक पुरुष-संसार में अपनी जगह ढूँढ़ने की कोशिश में है. लेकिन यह कहानी मराठी दलित आन्दोलन के अन्तर्विरोधों, मुम्बई शहर, उसके कवियों और एक्टिविस्टों की कहानी भी है. मूल रूप से मराठी में छपी यह आत्मकथा छपते ही एक सनसनी बन गई थी. व्यक्तिगत बनाम राजनीतिक, वाम विचारधारा बनाम दलित आन्दोलन और अपने पति के प्रति प्रेम और घृणा के बीच फँसी एक स्त्री की यह आत्मकथा कई मायनों में एक दस्तावेज़ की हैसियत रखती है. इसका हिंदी अनुवाद सुनीता डागा ने किया है.

औरत का घर | जसिंता केरकट्टा

    शहर के सम्पर्क और नए समय के प्रभाव में आदिवासी समाज भी अब ठीक वैसा नहीं रहा, जैसा जंगल और प्रकृति ने ठसे बनाया था. यह बदल रहा है और अफ़सोस कि अधिकतर विकृति की ओर श्यादा बदल रहा है. नागर सभ्यता अपनी तमाम नकारात्मक ऊर्जा के साथ उसे अपनी चपेट में ले रही है. जसिंता केरकेट्टा की ये कहानियाँ जैसे बदलाव की इस प्रक्रिया का जीवन्त दस्तावेज़ हैं. बिना किसी कलागत आग्रह के सरल-सीधी कहन के साथ वे इन कहानियों में आदिवासी स्त्रियों की असहायता को भी उजागर करती हैं और पुरुषों में बढ़ते ताक़त के नशे की ओर भी संकेत करती हैं. कुछ कहानियों में उन्होंने ऐसे वयस्क मूल्यबोध की ओर भी इशारा किया है जिसको स्वीकार करने में नागर जन की तथाकथित आधुनिकता भी बग़लें झाँकने लगेगी. संवाद-प्रधान कुछ कहानियों में धर्म-आधारित राजनीति और आदिवासी जीवन पर उसके प्रभाव को लेकर भी अच्छी रौशनी पड़ती है.
    व्यवस्था और अवधारणा के स्तर पर बहुत सूक्ष्म और रेडिकल बदलावों के संकेत इन कहानियों में कई जगह मिलते हैं. ये कहानियाँ बताती हैं कि आदिवासी समाज में भी भले ही पुरुषों ने स्त्री के लिए कोई सम्मानजनक जगह नहीं रखी, बाहरी दुष्प्रभाव में भले ही बेटे अपनी माँओं-बहनों के साथ हिंसा करने लगे हैं, लेकिन स्त्री अब भी अपनी संस्कृति, अपनी प्राकृतिक सहजता को लेकर सचेत है, ‘उसे खोने को तैयार नहीं. हिंसा का शिकार होकर भी वह हिंसा को नहीं चुनती. आदिवासी दुनिया के संघर्षों, मूल्यों, पीड़ाओं, उसके सामने मौजूद ख़तरों और बदलावों को रेखांकित करती कहानियों का रोचक संग्रह.

नैनीताला नैनीताला | पुष्पेश पन्त

    आदमी ही शहर में नहीं बसता, शहर भी आदमियों में बसते हैं. दरअसल, हरेक आदमी की अपनी ज़मीन और जड़ें होती हैं, जिनसे वह ताउम्र आज़ाद नहीं होना चाहता; भले ही ज़िन्दगी की भागमभाग-उसकी मर्ज़ी से या उसके चाहे बिना-उसे उनसे कितना भी दूर कर दे. बेदख़ली के बावजूद वह अपनी ज़मीन को दिल में आबाद कर लेता है और इस तरह अपनी जड़ों को ज़िन्दा रखता है.
    नैनीताला नैनीताला इसी सचाई का शिद्दत से अहसास कराती है, जिसमें पुष्पेश पन्‍त ने नैनीताल का ऐसा रससिक्त बखान किया है जो इस पहाड़ी शहर से उनके अपने रिश्ते का बयान तो है ही; अनगिनत लोगों, इमारतों, दुकानों, सड़कों, ढलानों, चढ़ाइयों, गाड़ियों, सूर्योदय, सूर्यास्त समेत तमाम तरह के नज़ारों के हवाले से उतना ही पुख़्ता शहरनामा भी है. उनका निजी भी इस किताब में जाने-देखे-सुने लोगों के क्रिस्सों के साथ मिलकर एकमेक हो गया है. नैनीताल का भूगोल, इतिहास, संस्कृति, समाज, आर्थिकी सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए; यह किताब जितनी संस्मरण है, उतनी ही शहरगाथा भी. गौर से देखें तो इसमें एक झलक उस हिन्दुस्तान की भी दिख जाएगी जिसकी बुनियाद बेशक सुदूर अतीत में पड़ गई थी लेकिन जो आज़ादी के आसपास शक्ल ले रहा था और उसके बाद के एक-दो दशक में मुकम्मल हुआ.

गांधी का सैंतालीस | पुष्यमित्र

    गांधी का सैंतालीस यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा. वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहां से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्‍ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है. मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है.
    भारत में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, जो बंटवारे के फ़ैसले पर मुहर लगने के बाद और बढ़ गए. इन दंगों ने लाखों की जान ली और करोड़ों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया. उस समय एक गांधी ही थे, जो नफ़रत की इस आग को बुझाने में लगे थे. उन्हें बस एक ही चिन्ता थी कि इस देश की आत्मा कैसे बचे; वह देश जो पिछले तीस साल से अहिंसक तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, आज़ादी के ठीक पहले हिंसा से भर उठा था. लोग अपने पड़ोसियों के ख़ून के प्यासे हो गए थे. इस लड़ाई में 77 साल के गांधी ने अपना सब कुछ झोंक दिया-नंगे पाँव यात्रा करते, पीड़ितों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते, उनके हृदय में साहस भरते और दंगाइयों को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करते हुए. उन्होंने संवाद, साहस और प्रेम के औज़ारों से यह लड़ाई लड़ी और अपने आख़िरी हथियार शहादत के ज़रिए इस महान लक्ष्य को हासिल किया.
    यह भी कहना ज़रूरी है कि यह कहानी गांधी के जीवन के इस सर्वश्रेष्ठ दौर की गौरवगाथा भर नहीं है. कोशिश की गई है कि यह कहानी हमारे सामने एक बोधपाठ की तरह खुले ताकि हम देख सकें कि क्या गांधी की इस आख़िरी लड़ाई के तौर-तरीक़ों में कुछ ऐसा भी है जिसे हम आज के भारत में प्रयोग कर सकें!

अदब से मुठभेड़ | ओमा शर्मा

    बक़ौल योगेन्द्र आहूजा,अदब से मुठभेड़ में हमारे वक्‍त के पाँच महत्त्वपूर्ण रचनाकारों-राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, प्रियंवद, शिवमूर्ति और मक़बूल फ़िदा हुसेन-से ओमा शर्मा के अलग-अलग लिए गए साक्षात्कार संकलित हैं. यह किताब सिर्फ़ इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि ये व्यक्तित्व महत्त्वपूर्ण हैं, दरअसल यह किताब, साक्षात्कारकर्ता के अनचाहे, अनजाने ही साक्षात्कारों की एक सैद्धान्तिकी जैसी बन गई है. जैसे राजेन्द्र यादव से बातचीत में एक बिन्दु वह भी आता है जब यह राजेन्द्र यादव का राजेन्द्र यादव से साक्षात्कार बन जाता है. इसी तरह हुसेन से बातचीत के दौरान उनकी जानी-पहचानी छवि के बरक्स, हमारी मुलाकात एक कमजोर, वेध्य, गुस्सैल हुसेन से होती है-उस जलावतनी के एहसास के चलते भी, जो पार्श्व में एक उदास धुन सरीखा बजता रहता है.
    मन्नू भंडारी से साक्षात्कार जैसे मन्‍नू जी की ही कोई लम्बी कहानी हो-एक घरेलू दिखने वाली, बौद्धिक तड़क-भड़क से दूर, सीधी-सादी संकोचशील लेखिका, उस वक्‍त के नामचीन लेखकों के बहुत क़रीब रहते हुए भी उनसे बेपरवाह, सिर्फ़ अन्त:प्रेरणा से मार्गदर्शन लेती, एक तनाव भरे दाम्पत्य के बीच ख़ामोशी से अपना काम करते हुए, किस प्रकार ‘महाभोज’ और ‘ आपका बंटी ‘ जैसे उपन्यासों और बेशुमार कहानियों में अपने समय का एक विश्वसनीय साक्ष्य रच पाती है, यह जानना एक मार्मिक अनुभव है.जिस प्रकार कलाकार या लेखक की दुनिया अलग होती है, उसी तरह यहाँ तक जाने के रास्ते भी समान नहीं होते. अगर प्रियंवद की दुनिया तक जाने का रास्ता सुरंग सरीखी व्यूहात्मक और उलझी हुई गलियों से गुजरता है तो शिवमूर्ति के सन्दर्भ में यह एक तपती हुई पगडंडी है, बीच-बीच में गुम हो जाती हुई. शिवमूर्ति इस बातचीत में अपने अन्तर्मन को जिस तरह अनावृत्त करते हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ भी बीच-बीच में विस्फोट की तरह आनेवाले ऐसे लम्हे बेशुमार हैं जब इस महादेश का विकराल और लोमहर्षक यथार्थ, सर्वदा घात लगाए-जैसे अचानक सामने आता और आपके कन्धे बेरहमी से झिंझोड़ देता है.

वर्तमान जैसा अतीत | रोमला थापर

    अतीत के बारे में प्रचलित धारणाओं को तब तक ऐतिहासिक नहीं माना जा सकता जब तक उनकी आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल न कर ली जाए. ‘वर्तमान जैसा अतीत’ मुख्यतः: यही करती है. उदाहरण के लिए ये कुछ सवाल सोमनाथ मन्दिर पर हमले के बाद वास्तव में क्या हुआ? हम में से आर्य या द्रविड़ कौन हैं? भारतीय समाज का धर्मनिरपेक्ष होना क्यों ज़रूरी है? साम्प्रदायिकता ने एक विचारधारा के रूप में देश में कब अपने पैर जमाए? हमारी पितृसत्तात्मक मानसिकता ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की संस्कृति को कैसे और कब बढ़ावा देना शुरू किया? इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखने के लिए कट्टरपन्थी इतने उत्सुक क्यों हैं? इन और इस तरह के अन्य प्रश्नों को लेकर उसी समय से विवाद और बहसें होती आई हैं जब इन्हें पहली बार पूछा गया था.
    प्रतिष्ठित इतिहासकार रोमिला थापर अकसर ही ऐसे प्रश्नों के मूल में स्थित ऐतिहासिक तथ्यों की जाँच, विश्लेषण और व्याख्या करती रही हैं. वे कहती हैं कि इतिहास में सिर्फ सूचनाएँ ही नहीं, उन सूचनाओं का विश्लेषण और व्याख्या भी शामिल होती है. चार उपखंडों के तहत विभिन्‍न प्रश्नों पर तथ्यात्मक और दृष्टिसम्पन्न ढंग से विचार करने वाली यह पुस्तक ऐसे समय में निहायत ज़रूरी पाठ बन जाती है जब साम्प्रदायिकता, बनावटी ‘राष्ट्रवाद’ और ऐतिहासिक तथ्यों को धूमिल करना हमारे सार्वजनिक, निजी और बौद्धिक जीवन का अभिन्‍न अंग बनता जा रहा है. अंग्रेज़ी से अनुवाद मोहन गुप्त ने किया है.

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