इक्कीस एक सौ बाईस | अस्तित्व के अंधेरों में सफ़र

  • 7:20 pm
  • 20 June 2026

ख़ालिद जावेद का नया उपन्यास ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ उर्दू फ़िक्शन में एक ऐसे तजुर्बे की हैसियत रखता है, जिसे सिर्फ़ एक कहानी या पारंपरिक उपन्यास के पैमानों से समझना मुमकिन नहीं. यह उपन्यास अपने बयानिया, भाषा, माहौल, मनोवैज्ञानिक गहराई, प्रतीक व्यवस्था और अस्तित्व के डर के कारण उर्दू साहित्य में एक अनोखा और असाधारण इज़ाफ़ा लगता है. इसकी सबसे पहली और सबसे गहरी असर इसकी भाषा से पैदा होती है. यह भाषा सिर्फ़ बयान का ज़रिया नहीं बल्कि खुद एक ज़िंदा, हरकत करती हुई और हमलावर हस्ती है. उपन्यास का बयानिया जामिद नहीं रहता बल्कि लगातार हरकत करता है, फैलता है, पाठक को अपनी लपेट में ले लेता है, उसके नसों पर असर डालता है. ऐसा महसूस होता है कि जुमले सिर्फ़ लिखे नहीं गए बल्कि जल रहे हैं, सड़ रहे हैं, बह रहे हैं, साँस ले रहे हैं. ख़ालिद जावेद के यहाँ भाषा में एक अजीब क़िस्म की जिस्मानियत है. शब्द गोश्त, ख़ून, ज़ख़्म, बुख़ार, धुएँ और अँधेरे की शक्ल इख़्तियार कर लेते हैं. यही वजह है कि ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ को पढ़ना सिर्फ़ एक ज़ेहनी तजुर्बा ही नहीं बल्कि एक जिस्मानी तजुर्बा भी बन जाता है.

यह उपन्यास उर्दू फ़िक्शन के जाने-पहचाने रास्तों से हटकर अपनी एक नई ज़मीन बनाता है. इसमें न तो क्लासिकी हकीकत-निगारी का सीधापन है और न ही उत्तर-आधुनिक खेल-तमाशे की दिखावटी पेचीदगी. ख़ालिद जावेद एक ऐसी काल्पनिक दुनिया बनाते हैं जिसमें लोक कथाएँ, आसेब, धार्मिक कल्पना, सामूहिक अचेतन, बीमारी, जिस्म, डर, ख़्वाब, मौत और मिथक एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं. इस लिहाज़ से उनका बयानिया हमें जुआन रुल्फो, मार्केज़ और कुछ लातिनी अमरीकी और यूरोपीय फ़िक्शन लेखकों की याद ज़रूर दिलाता है, मगर इसके बावजूद यह पूरी तरह अपनी ज़मीन, अपनी तहज़ीब और अपने डर का उपन्यास है. इसका अँधेरा हिंदुस्तानी क़स्बाई ज़िंदगी, वीरान मैदानों, क़ब्रिस्तानों, बूचड़ख़ानों, काले नालों और भूतिया यूकेलिप्टस के पेड़ों से जन्म लेता है. ख़ालिद जावेद के यहाँ माहौल सिर्फ़ पृष्ठभूमि नहीं बल्कि किरदार की अंदरूनी मनोदशा का फैलाव बन जाता है. गुर्गन-ए-तिलमास का वीरान इलाक़ा, जहाँ क़ब्रिस्तान, बूचड़ख़ाना और काले पानी का नाला मौजूद है, पूरे उपन्यास में एक ऐसे ज़ेहनी और रूहानी जहन्नुम की अलामत बनकर उभरता है, जिससे फ़रारी मुमकिन नहीं.

उपन्यास का मुख्य किरदार बुनियादी तौर पर एक ऐसा शख़्स है जो धीरे-धीरे ‘सिस्टम’ से बाहर हो चुका है. यह सिस्टम सिर्फ़ रियासती या सामाजिक निज़ाम नहीं बल्कि इंसानी वजूद का बनावटी ढाँचा है. वह मौसम विभाग में काम करता है मगर मौसम नापते-नापते अपने ही वजूद के बुख़ार में मुब्तला हो जाता है. उसे यक़ीन होने लगता है कि दुनिया का असल तापमान वह नहीं जो थर्मामीटर दिखा रहा है बल्कि उससे कहीं ज़्यादा है, मानो पूरी दुनिया एक छुपी हुई आग में जल रही है. यहाँ ख़ालिद जावेद आग को सिर्फ़ एक भौतिक हकीकत के तौर पर इस्तेमाल नहीं करते बल्कि यह आग इंसानी वजूद, ख़्वाहिश, बीमारी, तन्हाई और जहन्नुम की अलामत बन जाती है. मुख्य किरदार का जुनून दरअसल उस आग का एहसास है जिसे बाक़ी दुनिया महसूस नहीं कर रही. वह अपने जिस्म को एक ऐसे थर्मामीटर में बदलता हुआ महसूस करता है जो पूरी दुनिया की छुपी तबाही को नाप रहा है. यही वजह है कि वह मौसम की रीडिंग्स को बढ़ा-चढ़ाकर भेजने लगता है. उसके लिए गर्मी सिर्फ़ मौसम नहीं बल्कि एक ब्रह्मांडीय अज़ाब है. वह समझता है कि सूरज ज़मीन के बहुत क़रीब आ चुका है, इंसानों के जिस्म जल रहे हैं, खालें सड़ रही हैं, दुनिया एक सामूहिक बुख़ार में मुब्तला है. इस पूरे बयानिए में जिस्म और दुनिया एक-दूसरे की तमसील (मिसाल) बन जाते हैं. इंसान का बदन एक छोटा ब्रह्मांड है और ब्रह्मांड एक बीमार जिस्म.

यहाँ उपन्यास का एक बहुत अहम और ख़ौफ़नाक तसव्वुर सामने आता है, यानी ‘याददाश्त का क़ब्ज़ा’. हमारी लोक परंपरा में हमेशा यह ख़्याल रहा है कि किसी इंसान पर आसेब या साया हो सकता है, मगर ख़ालिद जावेद इस ख़्याल को एक नई मनोवैज्ञानिक दिशा देते हैं. उनके यहाँ सवाल यह है कि क्या किसी इंसान के दिमाग़ पर किसी दूसरे इंसान की याददाश्त क़ब्ज़ा कर सकती है? क्या मुमकिन है कि एक आदमी किसी और के तजुर्बात, डर, तकलीफ़ों और अतीत को अपने अंदर महसूस करने लगे? उपन्यास का पूरा वहमी बयानिया इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है. प्रोफ़ेसर हफीजुद्दीन आसी जब मुख्य किरदार को हिप्नोटाइज़ करते हैं तो वह इस नतीजे तक पहुँचते हैं कि ये बीमारियाँ दरअसल उसकी अपनी नहीं बल्कि किसी दूसरे की यादें हैं जो उसके ज़ेहन पर क़ाबिज़ हो गई हैं. यूँ उपन्यास बीमारी को सिर्फ़ जिस्मानी मसला नहीं रहने देता बल्कि उसे याददाश्त, अचेतन और रूहानी आलूदगी से जोड़ देता है. यह तसव्वुर उर्दू फ़िक्शन में अपनी किस्म का बिल्कुल नया तजुर्बा महसूस होता है.

प्रोफ़ेसर हफीजुद्दीन आसी का किरदार इस उपन्यास की वैचारिक संरचना में केंद्रीय अहमियत रखता है. वह एक ऐसा ‘लूप’ या चक्र बनाना चाहते हैं जिससे कोई बाहर न निकल सके. ज़ाहिर तौर पर यह एक जेल या डिटेंशन कैंप का नक्शा है, मगर असल में यह इंसानी दिमाग और याददाश्त का रूपक है. याददाश्त ख़ुद एक चक्रव्यूह है, एक ऐसा ज़ेहनी दायरा जिसमें इंसान क़ैद हो जाता है. यही वह मुक़ाम है जहाँ उपन्यास अस्तित्व के स्तर पर जहन्नुम के तसव्वुर से जुड़ता है. उपन्यास का शीर्षक ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ भी सिर्फ़ एक मकान का नंबर नहीं बल्कि एक सांकेतिक कोड बन जाता है. शायरी में 21 मौत का वज़न है और 122 जहन्नुम का. यूँ उपन्यास मानो दो छोरों के बीच लटका हुआ है — एक तरफ मौत और दूसरी तरफ जहन्नुम, और दोनों के बीच इंसानी वजूद की अज़ीयत. इसीलिए जब मुख्य किरदार जहन्नुम के दरवाज़े तक पहुँचता है तो उसे कहा जाता है कि जहन्नुम तो वह पीछे छोड़ आया है. असल जहन्नुम यही दुनिया है. बाक़ी सब उसकी सिर्फ़ मश्क़ या रिहर्सल है.

ख़ालिद जावेद के यहाँ आग और बर्फ़ दो बुनियादी रूपक हैं. आग इस दुनिया की अलामत है, यानी जिस्म, ख्वाहिश, बुखार, अज़ाब और जहन्नुम. इसके बरक्स बर्फ़ मौत की दुनिया है, ख़ामोशी की, सुकून की, जम जाने की दुनिया. उपन्यास में बार-बार यह एहसास पैदा होता है कि इंसान या तो आग में जल रहा है या बर्फ़ में दफ़न हो रहा है. बीच की कोई कैफ़ियत मौजूद नहीं. मुख्य किरदार जब जून के महीने में बर्फ़ महसूस करता है तो यह सिर्फ़ एक वहमी कैफ़ियत नहीं रहती बल्कि ज़िंदगी और मौत के बीच लटके होने का रूपक बन जाती है. ख़ालिद जावेद के यहाँ मौत अंत नहीं बल्कि एक और सुरंग, एक और लूप, एक और दायरा है.

उपन्यास में ज़ख़्मों की अलामत भी बहुत अहम है. जिस्म पर पड़ने वाले ज़ख़्म सिर्फ़ बीमारी की अलामत नहीं बल्कि दूसरी दुनिया से राब्ते का दरवाज़ा बन जाते हैं. जब खाल फटती है, जब गोश्त गलता है, जब ज़ख्म आर-पार हो जाते हैं, तब इंसान सिर्फ़ दुनिया में मौजूद नहीं रहता बल्कि उसका ताल्लुक़ मुर्दों, रूहों और सामूहिक अचेतन से क़ायम हो जाता है. यही वजह है कि मुख्य किरदार पागल होकर नहीं मरता बल्कि उसके ज़ख़्म उसे एक और सतह-ए-इदराक तक ले जाते हैं. ख़ालिद जावेद बीमारी, कोढ़, कैंसर और जलने के रूपकों को इस तरह बरतते हैं कि वे इंसानी वजूद की शिकस्त, तहज़ीबी ज़वाल और रूहानी तन्हाई की अलामत बन जाते हैं. उनके किरदारों के जिस्म लगातार गल रहे हैं, सड़ रहे हैं, झुलस रहे हैं, मगर यही तबाही उन्हें किसी छुपी हुई हक़ीक़त के क़रीब भी ले जाती है.

उपन्यास में तुगरल का किरदार एक शैतानी ताक़त की सूरत में सामने आता है. वह सिर्फ़ एक किरदार नहीं बल्कि बहकाने, वसवसा डालने और इंसान को उसके अपने अँधेरों में धकेलने वाली ताक़त की अलामत है. ख़ालिद जावेद के फ़िक्शन में यह किरदार बार-बार सामने आता है, मानो शैतान उनके यहाँ मज़हबी तसव्वुर से ज़्यादा एक मनोवैज्ञानिक हक़ीक़त है. इंसान के अंदर मौजूद तारीक़ी, डर, ख़्वाहिश और ख़ुद-तबाही की जिबिल्लत तुगरल की सूरत इख़्तियार कर लेती है.

‘इक्कीस एक सौ बाईस’ बुनियादी तौर पर इंसानी वजूद के डर का उपन्यास है, मगर यह डर सतही या वक़्ती नहीं बल्कि तहज़ीबी, माबअद-उत-तबियाती और लाशऊरी है. ख़ालिद जावेद अपने किरदारों को सिर्फ़ दुनिया में नहीं रखते बल्कि उनके पीछे नस्लों की यादें, पुरखों के साए, मुर्दों की सरगोशियाँ और नामालूम ताकतें खड़ी कर देते हैं. यही वजह है कि उनके यहाँ क़ब्रिस्तान, बूचड़ख़ाना, ख़ून, नाले, ज़ख़्म, जानवर, आग, बर्फ़ और अँधेरा सब सांकेतिक हैसियत इख़्तियार कर लेते हैं. उपन्यास का हर मंज़र महसूस होता है जैसे किसी डरावने ख़्वाब और धार्मिक मुकाशिफ़े के बीच लटका हुआ हो.

‘इक्कीस एक सौ बाईस’ उर्दू उपन्यास को एक नई दिशा देता है. यह उपन्यास साबित करता है कि उर्दू फ़िक्शन अब भी नई ज़मीनें खोज सकता है, नई ज़बानें पैदा कर सकता है और इंसानी वजूद के उन अँधेरों में उतर सकता है जहाँ जाने की हिम्मत कम ही लेखक करते हैं. ख़ालिद जावेद का यह उपन्यास सिर्फ़ एक साहित्यिक तजुर्बा नहीं बल्कि एक खौफनाक रूहानी और मनोवैज्ञानिक सफ़र है, ऐसा सफ़र जिसके अंत में पाठक यह महसूस करता है कि शायद जहन्नुम वाकई कोई दूसरी दुनिया नहीं बल्कि यही दुनिया है, यही जिस्म है, यही याददाश्त है, और यही ज़िंदगी.

(उर्दू से हिंदी अनुवाद | इक़बाल हुसैन)

सम्बंधित

मैं तफ़रीह के लिए नहीं लिखता, न चाहता हूं कि लोग इसे तफ़रीहन पढ़ेंः ख़ालिद जावेद

एक ख़ंजर पानी में | फंतासी में हक़ीक़त का अक्स

सवाल करता है, सुकून छीन लेता है साहित्यः डॉ. ख़ालिद


अपनी राय हमें  इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.