फ़ोटोग्राफ़ी | ‘ब्लूज़’ उदासी नहीं, कला के नाम लिखे सिजदे हैं
आपने कभी नीला कुंजारी (नीलकुरंजी) के फूल देखे हैं, जो 12 साल में सिर्फ़ एक बार खिलते हैं? नहीं? तो आप नीले रंग के सम्मोहक जादू से नावाक़िफ़ हैं, आप नहीँ जानते कि नीले रंग के उस शेड को देखने, निहारने और अपनी आँखों में बसाने के लिए इंसान क्या कुछ कर सकता है. नीलकुरंजी का नीला क़ुदरत के रंग सँजोने की कला के नाम इक सिजदा है.
इस बेचैन और मुश्किलों भरे वक़्त में फ़िक्र, तनाव और चिंता हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. हमारे चारों ओर का माहौल भी हमें डराने पर आमादा है. ये बेचैनी, ये डर, अब अचानक नहीं आते, ये हमारे साथ उठते-बैठते हैं, हिस्सा बन गए हैं—जैसे कोई ज़िद्दी मेहमान हो, जो जाने का नाम नहीं लेता.
हफ्तों तक खिड़की से साफ़ आसमान भी नहीं दिखता. सड़क पर देखें तो हर मोड़ पर पुलिस का पहरा है, चेकिंग हैं, हाइवे पर तो फ़ौज भी दिख जाती है. घर से बाहर निकलो तो धूल, मिट्टी के संग हवा में पेट्रोल मिली दुर्गंध, प्रदूषण और आलूदगी का हाल यह है कि सब कुछ सलेटी, काला या भूरा-सा दिखता है. सूरज के दर्शन भी ऐसे होते हैं, जैसे वो किसी परदे में हो.
इन सब में क्या कुछ ऐसा बचा है जो हमें हमारी आँखों को थोड़ी देर तो सुकून दे सके, हमारे दिल को तसल्ली दे सके कि अभी कुछ अच्छा बचा है. क़ुदरत की कोई ऐसी नेमतें जो हमें हौसला दे सकें ! कभी-कभार आई हल्की बारिश से जब मौसम खुलता है तो चमकता आसमान जिस्म-ओ-जान पर जादुई असर करता है.
ऐसे वक़्त में क़ुदरत का एक रंग है जो रहमत की तरह सामने आता है, बेचैन मन को ठहराव देता है. वो रंग मन, देह और रूह—तीनों पर सुकून की चादर डाल देता है. ये रंग है क़ुदरत के बड़े हिस्से में फैला नीला रंग. जैसे शांत नीला आसमान और नीला समंदर. डर और ज़िंदगी के बीच नीला रंग एक दोस्त या बिचौलिये का काम करता है—शांति और सुकून रखने का, जो बेबुनियाद ख़ौफ़ से कोई वास्ता नहीं रखता. नीला रंग टकराव नहीं चाहता; वह डर से बहस नहीं करता, बस उसे धीरे-धीरे बेतुका, बेमतलब और बेमानी बना देता है. शायद इसी वजह से मुश्किल दिनों में आसमान की ओर देखने से मन अपने आप हल्का महसूस करने लगता है. वह हमें आज और अभी में जीना सिखाता है, तनाव को अलविदा कहने की हिम्मत देता है. शांति का ऐसा माहौल रचता है कि बेचैनी अपने-आप पिघलने लगती है. किसी मुश्किल दिन जब दिल भारी हो तो बस खुले साफ़ आसमान की ओर देख लीजिए—और महसूस कीजिए, तनाव कैसे धीरे-धीरे पिघल जाता है.

नीले रंग के इसी विस्तार पर फैली हैं डॉ. कौशिक घोष की तस्वीरें—जो हमें नीले के ऐसे शेड्स में लपेट लेती हैं कि अँग्रेज़ी के ‘ब्लूज़’ यानि उदासी भी उतरने लगती है. कौशिक घोष की तस्वीरों का नीला हमें लुभाता भी है, सहलाता भी है, और आँखों पर मरहम-सा असर करता है. इन लुभावनी रंगतों में एक ऐसी तसल्ली है जो मन का बोझ हल्का कर देती है और फिर धीरे से मन की बेचैनी सोख लेता है. उनकी तस्वीरें हमें सिर्फ़ आसमान की ओर देखने को नहीं उकसातीं, बल्कि हमारे आसपास की दुनिया में छिपे नीले रंग के महीन और अनदेखे पहलुओं को भी पहचानना सिखाती हैं. उनकी फ़ोटोग्राफ़ी में मौजूद नीले रंग की शांति उदासी को किनारे कर देती है—बिलकुल वैसे ही जैसे संगीत करता है. सच कहूँ तो कौशिक की हर तस्वीर में, हर फ़्रेम में संगीत बसता है—कहीं वीणा की फ़रिश्ताना धुन, कहीं वायलिन की गूँज, और कहीं बाँसुरी की वह साँस जो कानों से गुज़रती हुई दिल तक झनझना जाती है.
उनकी तस्वीरों को ग़ौर से देखिए. मुझे तो लगा जैसे—सुनहरा कैटरपिलर नीले रंगे के मोती पर फिसलते हुए आगे बढ़ रहा था; एक तस्वीर में फिरोज़ी आसमान के सामने बर्फ़ के पोले पेड़ों की शाखाओं से फिसल रहे थे. कहीं किसी घर के बाहर नाम पट्टी में सजा नीला है, तो कहीं किर्गिज़स्तान के बिश्केक की बड़ी मस्जिद के खंभों से गुम्बदों तक बहता हुआ अंतहीन नीला. नीले का हर शेड हमें किसी दैवीय स्पर्श के और क़रीब ले जाता है—मानो वह हमारा हाथ थामकर हमें भरोसा दे रहा हो, वही भरोसा जिसकी आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.
इन तस्वीरों में बादलों की ओर ताकती हुई शांति का मैदान मिलता है. सायं से भरे अपने स्वभाव के लिए जाना जाने वाला नीला रंग हमारे इर्द-गिर्द बिना दख़ल दिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है. न वह शोर करता है, न ज़िद. मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो नीला रंग मन पर सकारात्मक असर डालता है. यह धैर्य और समझ का प्रतीक है—इसीलिए इसके आसपास हमें अच्छा महसूस होता है. जब हमारी भावनाएँ बेक़ाबू होने लगती हैं, तब यही नीला रंग हमें साँस लेने की मोहलत देता है. समंदर और आसमान से उसका रिश्ता इस सुकून को और गहराई देता है.
आँखों और मन को सुकून देने वाली तस्वीरें खींचना और फिर उनकी नुमाइश लगाना, और ख़ूबसूरत-सी किताब बनाना डॉ. घोष के लिए एक सालाना रिवायत है—और यह उनकी पंद्रहवीं प्रदर्शनी है. डॉ. घोष सिर्फ़ ऑर्थोपेडिक्स में अपनी महारत से ही नहीं, बल्कि अपनी संवेदनशील दृष्टि से भी लोगों का इलाज करते हैं. पंद्रह साल—इंसानियत के नाम समर्पित. वही हाथ जो किसी की टूटी हड्डी जोड़ते हैं तो कैमरा थामते ही किसी और के लिए मन की अवस्था जोड़ देते हैं.
तस्वीरें बनाते हुए डॉ. घोष अपनी आँख, सोच या उनके विषय प्रसंग के बारे में नहीं सोचते. उनकी तस्वीरें सिर्फ़ इंसानों, पहाड़ों, शहरों, मशीनों, या इमारतों तक सीमित नहीं हैं, इन तस्वीरों की विचित्रिता और विविधता इतनी ज़्यादा है कि उनका जख़ीरा अपने आप में बड़ा समंदर है. अपने शहर कलकता से कनेक्टिकट और कम्पाला तक और रेगिस्तान से पहाड़ी चोटियों तक—जहां उनके कैमरे ने बहुत कुछ क़ैद किया है तो उस से ज़्यादा हम सब के लिए कला को देखने की एक बड़ी सोच को रिहा भी किया है. 15 साल 15 नुमाइशें, 15 किताबें कितना कुछ सँजोया है डॉ. कौशिक घोष ने. इनकी प्यारी और लाजवाब तस्वीरों में से एक बड़ी, ब्लैक एण्ड व्हाइट तस्वीर मेरे घर की दीवार पर भी सजी है.

नीलाकुरंजी फूल पर वापस आते हैं, जो 12 साल में एक बार, सिर्फ़ एक बार, अपनी नस्ल बचा कर रखने के लिए खिलता है, क़ुदरत की इस तकनीक को मास्टिंग कहते हैं. इसमें पौधा लंबे समय तक ज़िंदा रहने के सहारे जमा करता है, और फिर बड़ी तादाद में फूल खिलाता है ताकि उस पौधे को काट कर ख़त्म करने वालों को मात दी जा सके और बीजों का बचा रहना पक्का हो जाए. यह एक ऐसा पौधा है, जो एक बार फूल खिलने के बाद खुद-ब-खुद मर जाता है. पर अपनी छोटी-सी ज़िंदगी में यह पक्का कर जाता है कि अगली पीढ़ी के लिए काफ़ी बीज पैदा हों. हिंदुस्तान के पश्चिमी घाटों में (महाराष्ट्र और गोवा से ले कर 1600 किलोमीटर आगे कर्नाटक से केरल तक) फूल खिलने के बाद इसके बीज अपने आप बिखर जाते हैं और नए पौधे उगते हैं, जिससे 12 साल का सिलसिला फिर से शुरू हो जाता है. इन कुछ हफ़्तों के लिए पश्चिमी घाट की पहाड़ियों पर शानदार नीले फूल खिल जाते हैं, जिससे एक मनमोहक नज़ारा बनता है. हमारी ज़िंदगियों में भी बहुत कुछ ऐसा हो गया है कि छोटी-सी खुशी के लिए हमें लंबा इंतज़ार करना पड़ता है.
अमन और शांति के रूप में नीला रंग कभी किसी इंसानी आस्था और विचार से टकराव नहीं करता. इसे तकरार से नफ़रत है. ये सुर्ख़ियों में रहना नहीं चाहता, इसलिए ख़ामोशी से अपना काम करता है. संयमी रंगों में गिना जाने वाला नीला रंग बिन कहे ही सब कह देता है. भले ही उसकी शख़्सियत शोख़ न हो, लेकिन उसकी रूह बेहद अनोखी है.
शांत, संयत और संतुलित—डॉ. कौशिक घोष को मैंने हमेशा ऐसा ही पाया है—बिल्कुल नीलांबर सा. और यही उनकी नई तस्वीरों की पहचान भी है—“Presence and Perception of Blues – ब्लूज़ की उपस्थिति और धारणा”.
यहाँ ‘ब्लूज़’ उदासी या दिल का दर्द नहीं हैं, बल्कि कला के नाम लिखे गए सिजदे हैं.

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