स्मरण | उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है

  • 5:00 pm
  • 13 February 2021

उनकी शायरी की सोहबत का एक फ़ैज़ तो यही है कि ‘उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है..’. फ़ैज़ सच्चे वतनपरस्त थे और दुनिया भर के जनसंघर्षों के साथ खड़े होने के हामी भी. साम्राज्यवादी ताकतों ने जब भी दीगर मुल्कों को साम्राज्यवादी नीतियों का निशाना बनाया, फ़ैज़ ने उन मुल्कों की हिमायत में अपनी आवाज़ उठाई. तभी तो वह अवाम के महबूब शायर हैं और उनकी शायरी हरदिलअज़ीज़. उनकी नज़्मों-ग़ज़लों के कितने ही मिसरे लोगों की ज़बान पर मुहावरों और कहावतों की तरह चढ़े हुए हैं.

फ़ैज़ की मकबूलियत के बारे में सज्जाद जहीर का नज़रिया यों रहा,‘‘मैं समझता हूं कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान बल्कि इन मुल्कों के बाहर भी जहां फ़ैज़ के बारे में लोगों की जानकारी है, फ़ैज़ की असाधारण लोकप्रियता और लोगों को उनसे गहरी मुहब्बत का एक कारण उनके काव्य की ख़ूबियों के अलावा यह भी है कि लोग फ़ैज़ की ज़िंदगी और उनके अमल, उनके दावों और उनकी कथनी में टकराव नहीं देखते.’’

प्रगतिशील लेखक संघ की सोहबत से फ़ैज़ की शायरी में बड़ा बदलाव आया. उनकी शायरी की अंतर्वस्तु का कैनवस बड़ा होता चला गया. इश्क, प्यार-मोहब्बत की रूमानियत से निकलकर, वह हक़ीक़तनिगारी पर ज़ोर देने लगे. इश्क से इंकलाब, रूमान से हक़ीक़त और ग़म-ए-यार से ग़म-ए-रोजगार की तरफ़ आए. उनकी नज़्में इश्किया तौर पर शुरू होकर इंसान के दुनियावी सरोकार से जाकर मिलने लगीं.

इसके बाद ही उनकी यह मशहूर ग़ज़ल सामने आई,‘‘और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा/ राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा/ मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग.’’ कमोबेश उनकी पूरी शायरी जनवादी चेतना और तरक्कीपसंद ख़्यालों का ही आइना है. उनकी पहली किताब ‘नक्शे फरियादी’ की एक ग़ज़ल के कुछ अशआर देखिए, ‘‘आजिजी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी/ यासो-हिर्मान के दुःख-दर्द के मानी सीखे/ जेरदस्तों के मसाइब को समझना सीखा/ सर्द आहों के रूखे-ज़र्द के मानी सीखे.’’

1941 में ‘नक्शे फरियादी’ छपने के बाद फ़ैज़ ने इंकलाबी शायर के तौर पर पूरे मुल्क में शोहरत हासिल कर ली. अपने क़लाम से उन्होंने बार-बार लोगों को एक फ़ैसलाकुन जंग के लिए ललकारा. ‘शीशों का मसीहा कोई नहीं’ में वे कहते हैं,‘‘सब सागर शीशे लालो-गुहर, इस बाजी में बद जाते हैं/ उठो, सब खाली हाथो को इस रन से बुलावे आते हैं.’’ उनका एक और शे’र है,‘‘लेकिन अब ज़ुल्म की मियाद के दिन थोड़े हैं/ इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं.’’

आज़ादी और बंटवारे से पहले हुई हिंसा में ख़ूनख़राबे और जलते हुए शहरों को देखते हुए फ़ैज़ ने ‘सुबहे-आज़ादी’ नाम से एक नज़्म लिखी. इसमें बंटवारे का दर्द जिस तरह से नुमायां हुआ है, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती, ‘‘ये दाग़-दाग़ उजाला, ये शबगजीदा सहर/ वो इंतिज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं/ ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरजू लेकर/ चले थे यार कि मिल जाएगी, कहीं न कहीं.’’

खंडित आजादी से गमगीन फ़ैज़ यह भी कहते हैं,‘‘नजाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई/ चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई.’’ नाउम्मीदी भरे माहौल में भी उन्हें उम्मीद थी कि जल्द ही सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा. आगे चलकर दोनों मुल्क एक हो जाएंगे.

बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान चले गए. वहां उन्होंने अंग्रेज़ी दैनिक ‘पाकिस्तान टाईम्स’, उर्दू दैनिक ‘इमरोज़’ और हफ़्तावार अख़बार ‘लैल-ओ-निहार’ के एडिटर की जिम्मेदारी संभाली. सरकार की ग़लत नीतियों की मुख़ालिफ़त वहाँ भी करते रहे और नतीजे में कई बार जेल गए. 1951 में उन्हें रावलपिंडी साजिश केस में सलाखों के पीछे भेज दिया गया. 1955 में जैसे-तैसे रिहा हुए, तो 1958 में पाकिस्तान में फ़ौजी हुकूमत क़ायम होने पर उन्हें फिर गिरफ़्तार कर लिया गया. साल भर बाद उन्हें रिहाई मिली.

जेल के दिनों में ही उनके ग़ज़लों-नज़्मों के दो मजमुए ‘दस्ते-सबा’ और ‘ज़िंदानामा’ छपे. जेल में एक वक्त ऐसा भी आया, जब उन्हें परिवार-दोस्तों से मिलवाना तो दूर, अफ़सरों ने उनसे काग़ज़-क़लम तक छीन लिए. फ़ैज़ ने ऐसे ही शिकस्ता माहौल में लिखा, ‘‘मता-ए-लौह-ओ-कलम छिन गई, तो क्या ग़म है/ कि ख़ूने-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने/ ज़बां पे मुहर लगी है तो क्या कि रख दी है/ हरेक हलकए-जंज़ीर में ज़बां मैंने.’’

‘ज़िंदानामा’ की ज्यादातर नज़्में फ़ैज़ ने मंटगोमरी सेंट्रल जेल और लाहौर सेंट्रल जेल में लिखीं. इस दौरान लिखे उनके क़लाम ने दुनिया भर में लोगों को मुतासिर किया. तुर्की के महान कवि नाज़िम हिकमत की तरह उन्होंने भी कारावास भोगा, निर्वासन का दर्द झेला, लेकिन प्रतिरोध के गीत गाते रहे. ऐसे ही एहतिजाज की उनकी एक नज़्म है, ‘‘निसार मैं तेरी गलियों पे ए वतन कि जहां/ चली है रस्म की कोई न सर उठाके चले.’’

ज़िंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव और संघर्षों के बावजूद उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा. फ़ैज़ एफ्रो-एशियाई राइटर एसोसिएशन की मैग्ज़ीन ‘लोटस’ के चार साल तक एडिटर रहे. 1962 में उन्हें ‘लेनिन विश्व शांति सम्मान’ से नवाजा गया तो यह एजाज पाने वाले वह पहले एशियाई शायर थे.

भारत और पाकिस्तान के तरक्कीपसंद शायरों की फेहरिस्त में ही नहीं, एशिया उपमहाद्वीप और अफ्रीका के स्वतंत्रता और समाजवाद के लिए किए गए संघर्षों के संदर्भ में भी फ़ैज़ सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रासंगिक शायर हैं. उनकी शायरी इंसान को शोषण से मुक्त कराने की प्रेरणा देती है, और शोषणमुक्त समाज की स्थापना का सपना भी जगाती है.

उन्होंने अवाम के नागरिक अधिकारों के लिए और सैनिक तानाशाही के खिलाफ जमकर लिखा. ‘लाजिम है कि हम देखेंगे’, ‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे’, ‘दरबारे-वतन में जब इक दिन’, ‘आज बाज़ार में पा-बा-जौलां चलो’ उनकी ऐसी ही कुछ इंकलाबी नज़्में हैं. नौजवान इन्हें गाते हुए सड़कों से गुज़रते ‘‘अब टूट गिरेंगी जंजीरें, अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं/ जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएंगे/ कटते भी चलो बढ़ते भी चलो बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत/ चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएंगे.’’

दुनिया के किसी भी कोने में जुल्म देखकर उनकी क़लम मचलने लगती. अफ्रीका के मुक्ति संघर्ष में उन्होंने जहां ‘अफ्रीका कम बैक का’ नारा दिया, तो वहीं बेरूत में हुए नरसंहार के ख़िलाफ़ भी उन्होंने ‘एक नग़मा कर्बला-ए-बेरूत के लिए’ शीर्षक से नज्म लिखी. दुनिया में कहीं भी नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ प्रतिरोध दर्ज कराते. सन् 1982 में एक वक्तव्य में फ़ैज़ ने कहा था, ‘‘मेरे तईं अमन, आज़ादी, युद्धबंदी और एटमी होड़ की मुख़ालिफ़त ही प्रासंगिक है. इस विशाल भाईचारें में से मेरे और मेरे दिल के सबसे नज़दीक वे अवाम हैं जो अपमानित, निष्कासित और वंचित हैं, जो गरीब, भूखे और परेशान हैं. इसी वजह से मेरा लगाव फ़िलिस्तीन, दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया, चिले के अवाम और अपने मुल्क के अवाम और मुझ जैसे लोगों से है.’’

फ़ैज़ की शायरी आज भी दुनिया भर में चल रहे लोकतांत्रिक संघर्ष को नई राह दिखाती है. स्वाधीनता, जनवाद और सामाजिक समानता उनकी शायरी का मूल स्वर है. अपनी सारी जिंदगी इस क़सम को वह बड़ी मजबूती से निभाते रहे, ‘‘हम परवरिशे-लौह-ओ-कलम करते रहेंगे/ जो दिल पे गुजरती है रक़म करते रहेंगे…हां, तलख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी/ हां अह्ले सितम मश्के-सितम करते रहेंगे/ मंज़ूर ये तलख़ी ये सितम हमको गवारा/ दम है तो मदावा-ए-अलम करते रहेंगे.’’

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