सुनील जाना और मार्गरेट बर्क-व्हाइट: अतीत की किसी दूसरी दुनिया में झांकना
मैं फ़ोटोग्राफ़र होने का कोई दावा नहीं करता, न ही हूँ. हाँ, इतना ज़रूर है कि ज़िंदगी ने मुझे कुछ नामी फ़ोटोग्राफ़रों के क़रीब बैठने का मौक़ा दिया, जिनकी सोहबत में मैंने तस्वीर को देखना और समझना सीखा—कभी उनकी बातों से, कभी उनकी ख़ामोशियों से. वही लोग थे जिन्होंने मुझे बार-बार समझा कर ठीक-ठाक तस्वीर लेने का हौसला दिया और यह भी सिखाया कि एक अच्छी या चालू तस्वीर में फ़र्क कैसे किया जाए.
फ़ोटोग्राफ़ी की जो थोड़ी-बहुत समझ मुझमें है, वह ज़्यादातर मेरी अपनी ही तलाश का नतीजा है—इसलिए इस लेख को किसी आलोचना की तरह न पढ़ा जाए. यह तो बस एक नौसिखिये शागिर्द की नज़र है, जो अपने उस्तादों और दोस्तों का एहसानमंद है. उन्हीं की मेहरबानी से मैंने इस फ़न के बारीक़ पहलुओं को समझने की कोशिश भर की—जब वे अपने काम में डूबे होते, दुनिया भर की सराहना और अवॉर्ड्स बटोर रहे होते, तब मैं पास बैठा उनकी दुनिया को देखता और सीखता रहा.
फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया से मेरा रिश्ता यूँ ही बना रहा—कभी प्रदर्शनियों के जरिए, कभी गैलरी और म्यूज़ियम में भटकते हुए, और कभी बड़े फ़ोटोग्राफ़रों के काम को ध्यान से देखते हुए. पेशे से मैं एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर हूँ, तो शायद आँख अपने-आप ही फ्रेम, रौशनी और बनावट को पकड़ने लगती है. मेरा यही काम मुझे तस्वीरों को पढ़ने और उनमें छिपे मायनों को समझने में मदद भी करता है.
काम के सिलसिले में कई बार प्रोडक्ट, फ़ैशन, इमारतों और इंडस्ट्रियल फ़ोटोग्राफी करने का सिलसिला बंता रहा और कहीं-कहीं इस बीच अपनी समझ से उन्हें दिशा देने का मौक़ा भी मिला. इन तजुर्बों ने इतना आत्मविश्वास ज़रूर दिया कि मैं एक क़ाबिले-क़ुबूल तस्वीर खींच सकूँ.
घुमक्कड़ी—ख़ासतौर पर हिमालय की तरफ़—और पुराने ऐतिहासिक मक़ामों से मेरी दिलचस्पी ने मेरे भीतर फ्रेम बनाने की समझ को और निखारा. रौशनी और साये का खेल मुझे हमेशा से खींचता रहा है—जैसे हर तस्वीर अपनी कहानी इन्हीं के सहारे कहती हो. मेरे लिए एक “अच्छी” तस्वीर महज़ किसी मंज़र को कैमेरे में कैद करना ही नहीं होती; वो मंज़र एक कहानी, एक क़िस्सा होती है—जिसमें एहसास और उसकी परतों में छिपी ऐसी ख़ामोश गूँज होती है जो देखने वाले के दिल तक पहुँचने का रास्ता बना ले.
जहां मैं लाला दीन दयाल जैसे बड़े फ़ोटोग्राफ़रों के काम से वाक़िफ़ था, तो वहीं कुलवन्त राय और कानू गांधी की बीसवीं सदी की तस्वीरों ने भी मुझे उतना ही प्रभावित किया—ख़ासतौर पर इसलिए कि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में लगे लोगों और लम्हों को अपने कैमरे में सँजोया. दीन दयाल उन्नीसवीं सदी के उन गिने-चुने हिन्दुस्तानी फ़ोटोग्राफ़रों में थे, जिनकी तस्वीरें बेमिसाल हैं; 1880 के दशक में वे हैदराबाद के निज़ाम के दरबारी फ़ोटोग्राफ़र भी रहे.
कानू गांधी—महात्मा गांधी के रिश्ते में भतीजे के बेटे—लंबे समय तक बापू के साथ अलग-अलग आश्रमों में रहे और उनके क़रीबी सहयोगियों में शामिल भी थे. कहा जाता है कि उद्योगपति घनश्याम बिड़ला जी ने उन्हें उनका पहला रोलीफ्लेक्स कैमरा खरीदने के लिए सौ रुपये दिए थे. 1938 से लेकर 1948 में गांधीजी की हत्या तक, कानू गांधी ने बापू की ज़िंदगी के कई अहम लम्हों को अपनी तस्वीरों में उतारा—और शायद इसी वजह से वे “गांधी के फ़ोटोग्राफ़र” के तौर पर याद किए जाते हैं.
मेरी ख़ुशक़िस्मती है कि मुझे कई नामी फ़ोटोग्राफ़रों की सोहबत से बहुत कुछ सीखने को मिल. उन्हीं की रहनुमाई में मैंने दुनिया भर के मशहूर फ़ोटोग्राफ़रों के काम को भी जाना. किसी तरतीब या दर्जे में बाँधे बिना कहूँ तो मुझे समकालीन भारतीय फ़ोटोग्राफ़रों—मरहूम मदन माहटा, मरहूम रघुवीर सिंह, मरहूम हरदेव और मनोहर सिंह, रघु राय, दयानिता सिंह, बिनय बहल, ज्योति भट्ट, प्रबुद्धा और प्रदीप दासगुप्ता, पाब्लो बार्थोलोम्यू, राम रहमान, गौरी गिल, केतकी सेठ, और मरहूम निमाई घोष जैसे शीर्ष कलाकारों—के काम ने हमेशा मोहित किया है. नई पीढ़ी में विक्की रॉय और पुलित्ज़र विजेता सन्ना इरशाद मट्टू भी मुझे बेहद पसंद हैं. इनमें से ज़्यादातर से मेरा रिश्ता कभी एक सीखने वाले का रहा, कभी दोस्त का, और कभी एक राह दिखाने वाले का.
इन्हीं दोस्तों ने मुझे हेनरी कार्टियर-ब्रेसन, अंसल ऐडम, विवियन मैएर, मैन रे, स्टीव मैकरी, होमी व्यारवाला, सुनील जाना और मार्गरेट बर्क-व्हाइट जैसे उस्तादों के काम तक पहुँचाया.
मैं अपने दोस्त कौशिक घोष का ख़ास तौर पर शुक्रगुज़ार हूँ—जो पेशे से तो हड्डियाँ जोड़ते हैं, मगर कैमरे से लम्हों को जोड़ना भी बख़ूबी जानते हैं—वे ही मुझे कोलकाता में निमाई घोष के घर ले गए. मेरे लिए वह किसी ज़ियारत से कम नहीं था—उनसे मिलना, उनके घर में, उनकी मेज़ पर बैठे-बैठे उनकी खींची पुरानी तस्वीरों को देखना… अफ़सोस बस इतना कि वह उनके जीवन के आख़िरी दिनों का वक़्त था, और मैं उनके साथ ज़्यादा देर नहीं बैठ सका.
हाल ही में सुनील जाना और मार्गरेट बर्क-व्हाइट की तस्वीरों की एक छोटी-सी नुमाइश गुड़गाँव के म्यूज़ियो कैमरा में लगी (19 मार्च—5 अप्रैल 2026). जिसमें शायद तीस तस्वीरें ही थीं, मगर उनका असर… काफ़ी गहरा था.
इतनी छोटी-सी झलक ने भी इन दोनों फ़नकारों के काम में एक अजीब-सी समानता दिखा दी—हालाँकि उनकी ज़िंदगियाँ और काम करने के मुक़ाम अलग-अलग रहे. बर्क-व्हाइट, जाना से क़रीब पंद्रह साल बड़ी थीं, और उनके पास अच्छे कैमेरे, सहूलियतों और कहीं बेहतर बाकी उपकरण थे. 1946–48 के भारत की उनकी मशहूर तस्वीरों से हर फ़ोटो-शौक़ीन वाक़िफ़ है जो अब तो इंटरनेट पर बिखरी हुई हैं. मगर उन तस्वीरों के असली आलसी फ़ोटो प्रिन्ट को एक साथ दीवार पर टंगा हुआ देखना… अलग ही तजुर्बा रहा.
जब मार्गरेट बॉर्के-व्हाइट 1945 में ब्रिटिश हुकूमत के ढलते हुए दौर को कवर करने भारत आईं तब वे दुनिया की सबसे मशहूर फ़ोटोग्राफ़रों में शुमार थीं. फ़ॉर्चून और फिर लाइफ़ मैगज़ीन में छपी उनकी तस्वीरों ने उन्हें दुनिया के हर कोनों तक पहुँचाया—अमेरिका के ग्रेट डिप्रेशन (मंदी) से लेकर सोवियत संघ के औद्योगीकरण तक, और यूरोप में दूसरे विश्व युद्ध की तबाही तक को उन्होंने बख़ूबी उतारा था.
उनके बारे में कहा जाता था कि “ये वह औरत है जो भूमध्य सागर में टॉरपीडो हमले से बची, लुफ़्टवाफ़े की गोलीबारी झेली, आर्कटिक के एक टापू पर फँसी, मॉस्को में बमबारी के बीच रही और जिसका हेलिकॉप्टर चेसापीक में गिरने के बाद भी वह ज़िंदा निकली. उन्हें लाइफ़ के दफ़्तर में ‘Maggie the Indestructible’ कहा जाता था.”
उनके मुक़ाबले में सुनील जाना ने तस्वीरें खींचना ही 1943 के आसपास शुरू किया था. मगर जाना की तस्वीरों में इतना गहरा असर था कि बर्क-व्हाइट ख़ुद उनसे मिलने और साथ काम करने के लिए उन्हें ढूंढती आईं. उनकी मुलाक़ात बंबई में कम्युनिस्ट पार्टी के पी.सी. जोशी के ज़रिये हुई—और देखते ही देखते, उम्र में चौदह साल का फ़र्क होते हुए भी, दोनों अच्छे दोस्त और फिर सहयोगी बन गए.
जाना ने जल्द ही महसूस कर लिया था कि ‘हम दोनों का काम करने का ढंग काफ़ी मिलता-जुलता है—बस फर्क इतना है कि बर्क-व्हाइट “उनका एक ज़्यादा तरक़्क़ीशुदा रूप” थीं.’ भारत में बर्क-व्हाइट को कोई ऐसा चाहिए था जो उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों तक ले जा सके—और दिलचस्प बात यह कि जाना पहले से ही उन इलाक़ों की यात्रा की योजना बना चुके थे.
जाने-माने फ़ोटोग्राफ़र राम रहमान एक क़िस्सा सुनाते हैं—दोनों आंध्र प्रदेश में अकाल की तस्वीरें खींच रहे थे. जाना कम्युनिस्ट पार्टी के लिए, और बर्क-व्हाइट लाइफ़ मैगज़ीन के लिए. काम बिल्कुल एक था मगर दोनों के तरीके अलग-अलग.
जाना के पास फ़्लैश नहीं था—तो वे बर्क-व्हाइट के फ़्लैश की रोशनी का इस्तेमाल करते. जैसे ही बर्क-व्हाइट अपने कैमरे के साथ फ़्लैश चलातीं, जाना उसी वक़्त अपने कैमरे का शटर खोलते—और उसी रोशनी में अपनी तस्वीर ले लेते. यूँ समझिए—रोशनी बर्क-व्हाइट की थी, मगर तस्वीर जाना की भी बन जाती थी.
1918 में असम में जन्मे जाना, कलकत्ता वाले एक वकील के बेटे थे. बचपन से ही उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी में दिलचस्पी थी. कोई औपचारिक तालीम तो नहीं मिली थी मगर उन्होंने पेशेवर फ़ोटोग्राफ़रों के डार्करूम में काम करते हुए हुनर सीखा था. वे वामपंथी राजनीति से जुड़े, कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने, और पी.सी. जोशी के कहने पर फ़ोटोग्राफ़ी को अपना पेशा बना लिया. 1943 में उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और जोशी तथा कलाकार चित्तप्रसाद भट्टाचार्य के साथ बंगाल का सफ़र किया—जहाँ उन्होंने अकाल की भयावहता को अपनी तस्वीरों में क़ैद किया.
‘पीपल्स वार’ अख़बार में छपी उनकी काली-सफ़ेद तस्वीरों ने भूख से जूझती भीड़ का एक ऐसा मंज़र सामने रखा, जो दिल को हिला देता था. उनके कैमेरे के नीचे से लिए गए एंगल ने भी आम लोगों की तस्वीरों को अजीब-सी गरिमा और ताक़त दी—जैसे वे लोग सिर्फ़ पीड़ित नहीं, बल्कि उस दुश्वारी के गवाह भी हों.
बाद के वर्षों में जाना ने ख़ुद माना कि ऐसी तस्वीरें बनाना उनके लिए बहुत मुश्किल था—भूख से मरते लोगों की तस्वीर लेना, जबकि उनके साथी इस बीच उनकी मदद कर रहे थे.
इन दोनों महान फ़ोटोग्राफ़रों की तस्वीरों में से कुछ म्यूज़िओ कैमरा की उसी नुमाइश का हिस्सा थीं. सच कहूँ तो उन तस्वीरों को देखकर सिर्फ़ आँखें नहीं, मन के अंदर का सन्नाटा भी भी कराहने लगता है.
बंगाल के अकाल की भीषण पीड़ा जो सुनील जाना ने अपनी आँखों से देखी, उसने उन्हें ज़िंदगी भर नहीं छोड़ा. वही दर्द, वही बेचैनी धीरे-धीरे उनके कैमरे को दूसरी तरफ़ ले गई—ऐसे नज़ारों की ओर जहाँ तकलीफ़ कम थी मगर ज़िंदगी की एक अलग सच्चाई थी. इसी बेचैनी के साथ-साथ उनके भीतर कम्युनिस्ट पार्टी से एक तरह की मोहभंग की भावना भी पनपने लगी, और आख़िरकार 1949 में, कोलकाता लौटने के बाद, उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया.
जाना की कम्युनिस्ट पार्टी से नज़दीकी ने बर्क-व्हाइट को भारत के मज़दूर आंदोलनों तक एक अनोखी पहुँच दी. अपनी 1949 की किताब ‘हाफ़-वे टू फ़्रीडम’ में उन्होंने तमिलनाडु के त्रिची टैनरी वर्कर्स यूनियन पर एक पूरा अध्याय लिखा—जहाँ मज़दूरों की हालत बेहद बदतर थी. खुले चूने के घोल में खड़े होकर खालों को साफ़ करने का काम करने से मजदूरों का शरीर गलने लगता था और उनके लिए कोई सुरक्षा भी नहीं थी. दलित मज़दूर और बच्चे, दोनों ही, इस अमानवीय काम में झोंक दिए गए थे.
उधर मार्गरेट बर्क-व्हाइट ने अगस्त 1946 में, बंगाल में भड़कती साम्प्रदायिक हिंसा के बीच, जाना को फिर से खोजा—जैसे इतिहास के उसी मोड़ पर दोनों एक बार फिर आमने-सामने खड़े हों.
राजनीतिक उथल-पुथल के साथ-साथ बर्क-व्हाइट ने देश के कई हिस्सों का सफ़र किया—आम लोगों की ज़िंदगी को समझने की कोशिश की. इस पूरे दौर में दोनों ने अपना-अपना काम अलग-अलग किया, मगर जो दोस्ती इस दौरान पनपी, वह आख़िर तक क़ायम रही. आज—गांधी, नेहरू, जिन्ना, खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान या शेख़ अब्दुल्ला की तस्वीरें जो हम इंटरनेट पर देखते हैं—या फिर बँटवारे के दिनों की—उनमें से कई इन दोनों के कैमरे से आई हैं. यहाँ तक कि बर्क-व्हाइट ने महात्मा गांधी का इंटरव्यू और तस्वीरें उनकी हत्या से महज़ एक घंटे पहले ली थीं.
- राम रहमान की किताब ‘Sunil Janah: Photographs 1940–1960’
- म्युज़ियो कैमरा की नुमाइश में आंध्र के अकाल की तस्वीर.
- ‘Sunil Janah: Photographs 1940–1960’
- मार्गरेट बर्क-व्हाइट की बनाई तस्वीर में गांधी.
- सुनील जाना, मार्गरेट बर्क-व्हाइट और पीबी रंगनेकर – 1946
- नुमाइश में लेखक राजिंदर अरोड़ा.
अपने पेशेवर काम के आख़िरी दौर में जाना सार्वजनिक जीवन से तकरीबन ग़ायब-से हो गए और उन्होंने अपना ध्यान आदिवासी समुदायों की ज़िंदगी की ओर मोड़ लिया. 1993 में उनकी किताब ‘द ट्राइबल्स ऑफ़ इंडिया’ आई—मगर उससे बहुत पहले से उनकी तस्वीरें इतिहास के दस्तावेज़ की तरह इस्तेमाल हो रही थीं. 1970 के दशक में उनकी तस्वीरों ने कला की दुनिया में भी अपनी जगह बनानी शुरू की. उन्हें 1972 में पद्मश्री और 2012 में पद्मभूषण से नवाज़ा गया.
म्यूज़िओ कैमरा की नुमाइश के शुरुआती पैनल पर लिखी एक बात इस पूरे क़िस्से का हासिल है—इन दोनों के लिए फ़ोटोग्राफ़ी महज़ दुनिया को दर्ज करना नहीं थी—बल्कि एक ज़िम्मेदारी थी, ज़मीर की आवाज़. जाना ने खुद कहा था—“मेरा विषय भारतीय लोग थे… और मेरा ज़ोर उनकी तकलीफ़ों, ग़रीबी, बदहाली और उससे बार-बार उठ खड़े होने की जद्दोजहद पर था.”
आपसी साझेदारी दोनों के लिए फ़ायदेमंद साबित हुई. एक तरफ़ जाना उनके रहनुमा बने—उन्हें उन जगहों तक ले गए जहाँ भूख, मेहनत और संघर्ष की असली तस्वीरें थीं. और बदले में बर्क-व्हाइट ने उन्हें वे सुविधाएँ दीं, जो उस दौर में लाइफ़ मैगज़ीन के फ़ोटोजर्नलिस्ट को ही मिल सकती थीं—गाड़ी, ड्राइवर, फ़्लैश, और यहाँ तक कि डिब्बाबंद खाना, जो अकाल-ग्रस्त इलाक़ों में वरदान था.
जाना ने किसी इंटरव्यू में कहा था—“पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी के ख़र्चे अमरीका की लाइफ़ मैगज़ीन उठा रही थी… और पहली बार मैं फ़र्स्ट क्लास में सफ़र कर रहा था.”
सफ़र के लंबे वकफ़े में दोनों एक-दूसरे से सीखते रहे. बर्क-व्हाइट ने अपने नोट्स में लिखा—“मुझे नहीं मालूम, ज़्यादा सवाल कौन पूछता था—भारत के तौर-तरीकों के बारे में मैं, या अमेरिकी फ़ोटोग्राफ़ी तकनीकों के बारे में सुनील. सफर में वक़्त काटने के लिए जानह अक्सर ठाकुर रबिन्द्रनाथ की ये पंक्तियाँ दोहराते—“इस दुनिया की धूल में भी शहद छुपा है… और इसी धूल से सच की तस्वीर बनती है.”
आख़िरकार, ये दो महान फ़ोटोग्राफ़र अपनी ज़िंदगी में बहुत थोड़े समय के लिए साथ रहे. तीन बार भारत आने के बाद बर्क-व्हाइट दक्षिण अफ़्रीका चली गईं जहाँ उन्होंने रंगभेद के खिलाफ़ इंसानी गरिमा की लड़ाई को दर्ज किया—फिर कोरिया के युद्ध में पहुँचीं. मगर पार्किन्सन बीमारी से ग्रस्त हो उनका सफ़र अधूरा रहा. कोरिया के शरणार्थियों की उनकी तस्वीरों में वही दर्द झलकता है, जो उन्होंने पाँच साल पहले पंजाब या बंगाल में देखा था.
जाना ने बहुत बाद में कहा—“वो (बर्क-व्हाइट) मेरा ही ज़्यादा विकसित रूप जैसी थीं.” यह बात जाना की औद्योगिक तस्वीरों में साफ़ दिखाई देती है—1930 के दशक के अमेरिका में बर्क-व्हाइट की तस्वीरें, और दो दशक बाद आज़ाद भारत में जाना के फ़्रेम—दोनों में एक ही तरह की भव्यता और सादगी का संगम.
बर्क-व्हाइट ने लिखा था—“मुझे औद्योगिक ढाँचे और मशीनें इसलिए ख़ूबसूरत लगती हैं, क्योंकि उन्हें ख़ूबसूरत बनने के लिए नहीं बनाया गया… उनकी सीधी-सादी रेखाएँ उनके उद्देश्य से जन्म लेती हैं.” और जाना ने भी नेहरू के “आधुनिक भारत के मंदिरों”—बड़े कारख़ानों और परियोजनाओं की वही गरिमा और सौंदर्य कैमरे में क़ैद की.
बाद के वर्षों में, जब ग्लूकोमा की वजह से उनकी नज़र कमज़ोर पड़ने लगी, तब भी जाना ने आदिवासी जीवन और औद्योगिक भारत की ऐसी बेमिसाल तस्वीरें बनाईं जो आज भी हैरान करती हैं. उनकी ये तस्वीरें जो कहीं न कहीं बर्क-व्हाइट के शुरुआती काम की याद दिलाती हैं, इस नुमाइश का अहम हिस्सा थीं.
जानह बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पूर्वी भारत के दूर-दराज़ के गाँवों और बस्तियों तक गए—जहाँ आदिवासी समुदाय रहते थे. उनकी तस्वीरों में ये लोग अक्सर मुस्कुराते, स्वस्थ और सहज दिखते हैं—जो आम तौर पर भारतीय ग़रीबी की तस्वीरों में कम ही दिखता है. शायद जाना के भीतर उन आदिवासियों के लिए एक ख़ास मोहब्बत थी. जाना की किताब ‘द सेकंड क्रीचर’ की प्रस्तावना में किम क्रिस्टेन लिखती हैं—“इन मुश्किल हालात में भी इन लोगों की ज़िंदगी में दुख तो रहा होगा, मगर जाना ने उन्हें ख़ुशी के लम्हों में दिखाया—जहाँ बाकी दुनिया उन्हें सिर्फ़ बदहाल देखती आई है.”
यह अफ़सोस की बात है कि इतने साफ़-दिल और सच्चे दस्तावेज़ी काम के बावजूद, जाना पर आदिवासी औरतों के तस्वीरें को लेकर अश्लीलता के आरोप भी लगे—शायद इसलिए कि उन्होंने सच्चाई को बिना परदे के दिखाया.
इस नुमाइश की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि दोनों फ़ोटोग्राफ़रों की तस्वीरें एक साथ देखकर एक ही दौर के कई समान दृश्य उभरते हैं—गांधी की अंतिम यात्रा में उमड़ती भीड़, बंगाल और आंध्र के अकाल, भूखे और कमज़ोर औरतें और बच्चे, बँटवारे के शरणार्थी, दिल्ली के कैंप, बड़े कारख़ाने, और मज़दूरों की हड़तालें.
फ़ोटोग्राफ़र राम रहमान ने उनके विशाल संग्रह पर लंबे समय तक काम किया है. वे जाना की तस्वीरों और उनकी ज़िंदगी के नज़दीकी और बड़े जानकार माने जाते हैं. स्वराज आर्ट आर्काइव के लिए राम ने जाना की तस्वीरों पर आधारित एक अहम दस्तावेज़ किताब के रूप में तैयार किया है.
नुमाइश की तस्वीरें देखते हुए मुझे राम रहमान की किताब ‘Sunil Janah: Photographs 1940–1960’ याद आई—जिसे राम ने ही संकलित और संपादित किया. इस किताब में जाना की वो दुर्लभ तस्वीरें हैं, जिनमें से कई तो उनके अपने आर्काइव में भी नहीं थीं. राम रहमान लिखते हैं—“मैं हैरान रह गया जब मुझे 300 से ज़्यादा पुरानी तस्वीरें मिलीं जिनमें कई जानी-पहचानी थीं और कई बिल्कुल नई.”
जानान अक्सर ज़्यादा प्रिंट नहीं बना पाते थे—शायद आर्थिक वजहों से. उनकी पत्नी शोभा कई तस्वीरों को बारीकी से रीटच करती थीं, क्योंकि जाना की नज़र हमेशा से कमज़ोर रही. जाना की पहचान सबसे ज़्यादा बंगाल के अकाल, आज़ादी की लड़ाई, और आज़ादी के बाद के औद्योगीकरण की तस्वीरों से है—साथ ही आदिवासी जीवन के उनके अध्ययन से भी. उनकी ग्रामीण तस्वीरों का असर इतना गहरा था कि महान फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली तक में उनकी झलक मिलती है.
उनकी तस्वीरों में मज़दूर और किसान किसी नायक की तरह दिखते हैं—और आदिवासी लोग गरिमा से भरे हुए. उनकी तस्वीरों में आधे ढके शरीर वाली महिलाएँ भी बिना किसी झिझक के सामने आती हैं—ऐसी सहजता से, जो आज शायद संभव ही न हो.
तस्वीर साज़ राम रहमान के शब्दों में ही—“जाना और बर्क-व्हाइट की तस्वीरों को साथ-साथ देखना किसी बीते समय की किसी दूसरी दुनिया को देखना है. एक तरफ़ एक विदेशी महिला को देखकर भारतीयों की हैरानी है, और दूसरी तरफ़ जाना का शांत, भीतर तक उतरता हुआ नज़रिया—ये जोड़ी अपने-आप में एक किताब की हक़दार है.”

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