तमाशा मेरे आगे | किताब मेला इस बरस-2026

जब किसी चीज़ या जगह को ज़ोर-ज़बरदस्ती, रगड़-रगड़ कर चमका दिया जाता है तो उस पर कुछ वक़्त के लिए चमक तो आ जाती है पर उसकी असल ख़ूबसूरती बिगड़ जाती है. प्रगति मैदान में हर बरस होने वाले किताब मेले का इस बार कुछ ऐसा ही हाल है भारत मडंपम के पाँच हॉल में लगा यह मेला बिल्कुल अस्पताल के सैनिटाइज़्ड वार्ड जैसा लगता है, जहां हर मज़मून, हर स्टॉल, हर चीज़, हर दूसरा नज़रिया या नापसंदीदा किताब व सब्जेक्ट को मशीनी तरीक़े और तीसरी आँख से न सिर्फ़ एक्स-रे किया गया है बल्कि कोशिश करके बर्ख़ास्त कर दिया गया है.

मेले में क़दम रखते ही अगर आपको किताबों की वो ख़ास गंध न आए तो सब कुछ अधूरा लगता है. हवा में घुली वो पुराने कागज़ की महक, किरोसीन में मिली स्याही की वो भभक, अरारूट और मैदे वाली लेई की अचार जैसी बास, मोटी जिल्द के गीले गत्ते पर चिपके गीले कपड़े की बू और जाने क्या-क्या ऐसा होता है जो आपकी नाक, आँख, कान, गले, और बाक़ी सभी इंद्रियों को बेचैन कर देता है. साथ-साथ होती है हर किताब ख़रीदने की उंगलियों की लपलपाहट, चाहे कंधे बोझा ढोकर झुक ही क्यों न गए हों. किताबों के स्टॉलों के गलियारे पार करते-करते जब पैर थक जाते थे तो जूट के क़ालीन पर कहीं भी बैठ कर चाय वाले भैया की इंतज़ार करना प्रेमिका के इंतज़ार से भी ज्यादा दुखदाई होता था पर वो आ जाते थे अपनी मीठी, काली चाय लिए बिल्कुल नारद जी से, कहीं से प्रकट हो जाते थे. पर ये सब कभी हुआ करता था, वो ज़माने और थे, वक़्त ठहर हुआ था, किताबों में दूसरों से नफ़रत करना नहीं सिखाया जाता था, इतिहास मनमानी से नहीं लिखा जाता था और किताब के मेले में किताब ही मिलती थी माला या मूर्तियाँ नहीं.

आज मेले में एक तरफ़ से हाल में दाख़िल होते ही आपका सामना होता है-काला चश्मा लगाये, वर्दी पहने, बंदूक़धारी फ़ौजी से जिसके दायें हाथ पर तिरंगा लिए एक फ़ौजी टुकड़ी किसी इलाक़े में विजय नाद करती आगे बढ़ रही है. आपकी सुरक्षा या देखरेख के लिए ये दिल्ली पुलिस नहीं फ़ौज है. एकबारगी तो शुबहा होता है कि आप किताब मेले में हैं या सुरक्षा मेले में. थोड़ी दूर चलें तो एक पूरी दीवार पर कुछ महीनों पहले हुए ऑपरेशन सिंदूर का पूरा ब्योरा मिल जाता है, थोड़ी दूर और चलें तो सेना के तीनों कमान के साधन, सवारी और शस्त्र भी दिख जाते हैं. बख़्तरबंद गाड़ी, अर्जुन मेन बैटल टैंक, युद्ध पोत और लड़ाकू जहाज़ – सब एक बड़े से चौबारे में रखे गयें हैं जिसकी दीवारों में शहीदों की तस्वीरें इज़्ज़त और मान से एक क़तार में लगाई गई हैं . यहाँ पहाड़ी फ़तेह करते और झण्डा गाड़ते जवानों की टुकड़ी की प्रतिमा भी है, जिसमें एक सिख जवान भी है. इस प्रतिमा के सामने खड़े हैं बीएसएफ़ और गुरखा सेना के असली जवान.

अब इन सब से नज़र हटे तो आदमी किताब भी देखे. लकड़ी की दीवारों के पीछे से किसी कॅफ़े कॉफी डे टाइप की अमेरिकानों या केपूचीनो कॉफ़ी की महक आपको बुला रही है और आप बेमन से उस तरफ़ चल देते हैं क्यूंकि मेले में चाय तो मिल नही रही, अब निकालिए दो सौ रुपये जो बाशोम के हाइकु की किताब ख़रीदने के लिए बचा रखे थे. मन ही मन गिनती हो रही है, कितने पैसे जेब में बचे हैं. एक प्रिय दोस्त ने कल ही बताया की कैसे वो साल-दर-साल दस बीस हज़ार रुपये इकट्ठा कर किताबें ख़रीद ले जाते थे. मैं आसमाँ को देखने के लिए सिर उठाता हूँ तो हाल के ऊपर लगी गंदी काली छत देख मुझे यक़ीन हो जाता है कि अगर भगवान है भी तो वो इस छत के परे तो मेरी नहीं सुनेगा और मेरे पास कभी किताबें ख़रीदने के लिए एक मुश्त बीस हज़ार रुपए नहीं होंगे. हालाँकि अब मैं अपनी पसंद की बहुत सारी किताबें ख़रीद पाता हूँ पर मुझे वो दिन कभी नहीं भूलते जब किताब मेला पंद्रह दिन का होता था और हम पूरे पंद्रह रोज़ अलग-अलग स्टॉल के सामने बैठ कर किताबों को भारी दिल से निहारते और कुछ रेट लिस्ट बटोर शाम को घर लौट जाते थे.

मेला और आसपास अब पहले से साफ़ है, दिखता भी वैसा ही है. टॉयलेट साफ़. घास का मैदान साफ़. बहुत कुछ साफ़ हो चुका है. पाठक साफ़, बच्चे साफ़, युवाओं की जेब से पैसे साफ़, प्रकाशकों का दिया जाने वाला 50 पर्सेन्ट डिस्काउंट साफ़, स्कूली बच्चों की कतारें साफ़, सस्ते खाने और चाय की दुकानें साफ़, नामचीन अन्तराष्ट्रीय प्रकाशक साफ़. छोड़िए भी, अब इस से ज़्यादा सफ़ाई क्या हो सकती है.

क्या हुआ जो वो किताब ख़रीद नहीं पा रहे, देखिए न कितने बच्चे किताबों के सामने रील बना रहे हैं, कितने सारे सेल्फ़ी पॉइंट बनाए हैं मेला आयोजकों ने. देखिए न कितने तिरंगे लहरा रहे हैं, जोश है, वंदे मातरम है और हैं महामहिम की बड़ी-बड़ी तस्वीरें और बैनर जो हमें शिक्षा और देशप्रेम का संदेश दे रहे हैं. देखिए न कितने लेखक अपना इंटरव्यू लिए जाने का इंतज़ार कर रहे हैं और इसका कि कोई पाठक आ कर उनसे किताब पर साइन करा ले, सेल्फ़ी खींच ले.

देख कर बहुत अच्छा लगता है कि पिछले कुछ सालों से हिन्दी भाषा का दबदबा बढ़ा है. काश उतनी विशिष्ट और बड़ी जगह में कभी उर्दू और पंजाबी भी देखने को मिले. इन ज़बानों के प्रकाशकों को भी ज्यादा तादाद में मेले में भाग लेना चाहिए. मेरा मानना है कि पढ़ना उतना ही ज़रूरी है जितनी अच्छी ख़ुराक़ और अच्छी सेहत. हर बार की तरह इस बार भी मेले में खूब घूम-घूम कर थक गया पर पूरी तरह थकने से पहले अपने ख़ास स्टॉल को ढूंढ ही लिया.

मेले में एक पड़ाव ऐसा होता है जहां बस ठहर जाने को मन करता है. और, जहां बेहतरीन किताबों के साथ-साथ ऐसी सुंदर किताबों को बनाने वालों से भी मिलना हो जाता है. किताबों के मामले में मेरा ‘मन तो बच्चा है जी’. बचपन में बेहतरीन, रोचक और सुंदर छपाई वाली रूसी किताबों से प्यार था, बड़े होते-होते रूसी किताबें खो गईं और उनकी जगह ले ली ‘इकतारा’ की किताबों ने ले ली. इकतारा की किताबें और वो स्टॉल सब थकान हर लेता है. मेरे लिए वहाँ किताबें इतनी मज़ेदार हैं कि मैं उन्हें खा सकता हूँ. आलथी-पालथी मार कर बैठ जाता हूँ, मेरी ख़स्ता हालत देख कर कोई न कोई दोस्त चाय ला ही देता है. एक-एक कर सब नई किताबें उठाकर वहीं पढ़ लेता हूँ और ख़रीदने के लिए थैला भर लेता हूँ. इस बार भी वही किया. इस बार एक किताब हाथ लगी तो 200 रुपए वाली कॉफ़ी पीने का मलाल नहीं हुआ.

बाशोम के हाइकु वाली किताब नहीं मिली पर हिन्दी के हाइकु की किताब “अरे!” मिल गई. मेरे पास ही अपने चहेते पाठकों के बीच बैठे थे हिमांशु व्यास, “अरे!” के हसीन लेखक. क्या मुस्कान थी उनके चेहरे पर, क्या प्यार था उनकी आँखों में और कितनी मिठास थी हिमांशु जी के लहज़े में. मैंने भी मौक़े का फ़ायदा उठा कर उनसे उनकी किताब पर कुछ लिखने को कह दिया. हाय हाय, एक तीर सा हाइकु मिल गया मुझे, सिर्फ़ मेरा हाइकु, जो दुनिया के किसी पाठक के पास नहीं है, हो ही नहीं सकता और फिर उसमें हम दोनों का नाम जुड़ा है. सलाम हिमांशु जी और शुक्रिया. एक ग़लती हो गई – हिमांशु जी के साथ तस्वीर नहीं ली, ऐसा ही होता है हर अच्छे लेखक की ऑरा ही ऐसा होता है कि सब कुछ भूल जाता है (ऑरा यानि प्रभामण्डल- वो रोशनी जो सिर के पीछे गोल-गोल घूमती दिखाई पड़ती है).

‘इकतारा’ की किताबों और मैगज़ीन ‘साईकल’ और ‘प्लूटो’ को लोग बच्चों की किताबें बताते हैं, मेरी बात मानिए ये सरासर ग़लत है, ये बड़ों के साथ नाइंसाफ़ी है, हमारे ऊपर किया जा रहा ज़ुल्म है. अगर आपको अपने भीतर का, अपने मन और दिल का बचपन बचा के रखना हैं, अपने अंदर बसे उस बच्चे को फिर से जगाना है तो इकतारा की हर किताब को ख़रीदिए और पढिए, न सिर्फ़ ख़ुद पढिए बल्कि अपनी बिरादरी, दोस्ती-यारी और आस-पड़ोस में भी सब को ले कर दीजिए, छोटे बच्चों को पढ़ कर सुनाइए. बात ज्ञान की नहीं है दोस्त, बात अपने भीतर सोये इंसान को जगाने की है, अच्छाई को देखने की है, प्रेम और भाईचारे की है जो इकतारा की किताबों में भरा है.

इस बार के किताब मेले (2026) में एक प्यारा कोना ऐसा भी है, जहां से आप अपने चहेतों को चिट्ठी भेज सकते हैं. अभी इसकी ज़िम्मेदारी ख़्वाब तन्हा कलेक्टिव के शिराज हुसैन ने संभाली हुई है हालांकि ये काम डाक विभाग का होना चाहिए था. शिराज ने न सिर्फ़ अपने हाथ से बनाया लेटर बॉक्स लगा रखा है वो आपको एक ख़ूबसूरत रंगीन पोस्टकार्ड और उस पर लगी टिकट भी मुफ़्त देंगे, जी हाँ ठीक पढ़ा आपने “मुफ़्त” यानि फ़्री. मेले के हॉल नंबर 2 में राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर आपको मुस्कुराते हुए शिराज मिल जाएंगे, जो न सिर्फ़ ऐसे कई पुण्य के काम करते हैं बल्कि पहुंचे हुए आर्टिस्ट और कॅलिग्रफ़र भी हैं. इनके बनाए कैलंडर, पोस्टर, पोस्टकार्ड, बुकमार्क, और बहुत कुछ वहाँ देखने और ख़रीदने को मिल जाएगा. दुनिया में अब ऐसे इंसान कम रह गए हैं. जल्दी करिए इन्हें मिल लीजिए और अपने घर वालों, दोस्तों, या आशिक़-माशूक़ को याद कर एक चिट्ठी लिख ही डालिए. स्टॉल P-01 हॉल 2-3, मंडपम, मेले में. आख़िरी डाक 18 तारीख़ तक. तस्वीर में लेटर बाक्स के साथ शिराज और मैं हूँ.

किताब मेले जैसा भी है, अच्छा है, किसी मॉल में घूमने से तो लाख दर्जे बेहतर. सिर्फ़ 18 जनवरी तक है, तो आज चले ही जाएं. साल के ये वो दस दिन हैं, जब मैं सब कुछ त्याग कर किताब मेले में चौबीस घंटे बैठ और घूम सकता हूँ. अभी यह कि दोस्तों ने दूसरे शहरों से आना है, मैं तो आता ही रहूँगा.

सम्बंधित

तमाशा मेरे आगे | घुटनों का दर्द और तरखान की याद

तमाशा मेरे आगे | क़िस्सा बेनाम किताब का

तमाशा मेरे आगे | अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब


अपनी राय हमें  इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.