‘पहल’ का नीति-वाक्य रहा – इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक. पत्रिका ने इसके निर्वहन की भरपूर कोशिश भी की. बक़ौल संपादक, नये ज़माने के शत्रुओं की पहचान भी ज़रूरी थी. [….]
पितरस बुख़ारी यानी कि पेशावर वाले पीर सैयद अहमद शाह बुख़ारी तंज़-ओ-मिज़ाह की दुनिया का ऐसा नाम हैं, जिन पर उर्दू वाले नाज़ करते हैं. ऑल इंडिया रेडियो के तमाम ओहदों पर काम किया, लाहौर में गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल रहे, यूएन में पाकिस्तान की नुमांइदगी भी की मगर ज़माना उन्हें उनके मज़ामीन के लिए याद करता है. [….]
आर.के.नारायन के लिखे का इतना कायल हूँ कि मैसूर के सफ़र में उनकी किताबों के किरदार और ठिकाने भी तलाश करता हूँ. वहाँ किसी ठिकाने पर कॉफ़ी पीते हुए कितनी बार उनका लिखा हुआ ब्योरा याद करता रहा हूँ. अजमेर से गुज़रते हुए वहाँ ‘मालगुड़ी डेज़’ नाम का एक रेस्तरां पाकर इतना लहालोट हो गया था कि थोड़ी देर के लिए ठहरा भी. [….]
(जोश मलीहाबादी की आत्मकथा ‘यादों की बरात’ में दर्ज यह यात्रा-संस्मरण रेलगाड़ी के पहले और 13 मील के छोटे-से सफ़र की याद भर नहीं है, यह उस दौर के लखनऊ का ऐसा मंज़र-नामा भी है, जो लखनवी तहज़ीब, शहर के भूगोल, वहाँ के लोगों और खान-पान के सलीक़े की बानगी पेश करता है. ऐसा ब्योरा जो शायद थोड़े से लोगों की स्मृति में अब भी बचा हुआ हो. -सं ) [….]