कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें काग़ज़ पर उतारना आसान नहीं होता. शब्द ठिठक कर रुक जाते हैं और दिल बार-बार अतीत की ओर लौट जाता है. हिंदुस्तान के महानतम फ़ोटोग्राफ़रों में से एक और अपने पुराने ख़ैरख़्वाह साथी रघु राय 26 अप्रैल 2026 को दिल्ली में [….]
मुझे यह भी नहीं मालूम
कि मैं कितनों को नहीं जानता.
शुक्ल जी से मैं कभी मिला नहीं, मुलाक़ात का कोई ज़रिया नहीं बना, कभी आमना-सामना भी नहीं हुआ. हाँ, दूर से उन्हें कई बार देखने-सुनने का मौक़ा मिला, उनका लिखा पढ़ता रहा, उनके बारे में ख़बरें देखता रहा. उन्हीं की कविता से ली गई पंक्ति से कहा जाए तो मैं सचमुच उनको नहीं जानता था. [….]
खूबसूरत छपाई वाली ये पतली-सी किताब मैंने 1978 या 79 की सर्दियों में नैनीताल क्लब के बाहर मॉल रोड पर घूमते हुए एक रेहड़ी वाले से खरीदी थी. चार रंगीन स्लाइडों के सेट के साथ इस गाइडनुमा किताब की क़ीमत कुल आठ रुपये थी. 1914, यानि 111 साल पहले, कानपुर में छपी, नैनीताल स्थित सेंट जॉन-इन-द-विल्डरनेस चर्च के बारे में यह 28 [….]
बात 70 के दशक के बदायूं की है. शहर में सन् 73 से 79 तक रहना हुआ और दर्जा तीन से आठवीं तक की पढ़ाई भी वहीं की. पहले सिविल लाइंस स्थित बाल निकेतन और फिर बड़े बाज़ार से घंटाघर के दरमियान उस वक़्त की सदर तहसील के सामने का मिशन हायर सेकेंड्री स्कूल. उस दौर के मशहूर घराने डॉ.रायजादा की कोठी से सटी रामनाथ कॉलोनी से [….]
सुबह की पहली चाय हम तीनों—माँ, रजनी और मैं— डाइनिंग टेबल पर इकट्ठे ही पीते हैं. दूसरी चाय के लिए माँ टेबल छोड़ अपने बिस्तर की ओर चल देती हैं. उस पहले दौर में हम दोनों अपना-अपना अख़बार भी साथ में चुसक रहे होते हैं. रजनी का ‘हिन्दू’ और मेरा ‘एक्सप्रेस’. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि माँ एक अख़बार अपनी तरफ़ खींच लेती [….]
कोई पांच दशक पुरानी बात होगी, इलाहाबाद में हमेशा की तरह कुंभ पड़ा था. मैं कीडगंज में अपनी ननिहाल आया हुआ था. ननिहाल में रहना मुझे बहुत भाता था. हर उसे मौक़े पर जब छुट्टी हो, मैं वहीं चला जाता. ख़ासतौर से कुंभ मेला हो, हर साल पड़ने वाला माघ मेला हो या दधिकांदो का जुलूस… मेले का कोई मौक़ा हो, मैं वहीं होता था तो उस कुंभ [….]