देखो, मैं भी क़रीबी था
मैं अब यह मानने लगा हूँ कि मौत अकेली नहीं आती. वो आती है चुपचाप, दबे पाँव, बर्फ़-सी शांत, लेकिन आज उसके बाद जो आता है वो मौत से कहीं ज़्यादा बेरहम होता है. वो शोर, वो भीड़, वो तमाशा जो मरने वाले के साथ नहीं ज़िंदा लोगों के लिए होता है. मौत तो अपना काम कर चुपचाप चली जाती है पर उसके साथ जो सन्नाटा आना चाहिए [….]
संस्कृति