कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें काग़ज़ पर उतारना आसान नहीं होता. शब्द ठिठक कर रुक जाते हैं और दिल बार-बार अतीत की ओर लौट जाता है. हिंदुस्तान के महानतम फ़ोटोग्राफ़रों में से एक और अपने पुराने ख़ैरख़्वाह साथी रघु राय 26 अप्रैल 2026 को दिल्ली में [….]
‘सहर’ — यानी भोर, उजाले की पहली आहट. ज़रा इस मंज़र की कल्पना कीजिए. आप एक किताब के लोकार्पण समारोह में बैठे हैं. किताब, हिंदुस्तान के बीसवीं सदी के बड़े शायर की उर्दू जीवनी का अंग्रेज़ी अनुवाद है. हॉल में उनकी लिखी फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लें धीमे-धीमे तैर रही हैं. बड़े से मंच के दोनों ओर लगी बड़ी एलईडी स्क्रीन पर एक संजीदा चेहरा बार-बार उभरता है. एक ऐसा [….]
क़िस्से लिखना और गढ़ना इसलिए आसान लगता हैं क्योंकि उन्हें लिखते वक़्त लेखक ख़ुदा बन जाते हैं. लेखक के बस में है कि वो जब चाहे क़िस्सों को, किरदारों को जहाँ चाहें मोड़ दें, जिसे चाहें मार दें, जिसे चाहें बचा लें, जिस दर्द को चाहें ख़ामोश कर दें. पर असल ज़िंदगी… वो किसी की नहीं सुनती, लेखक की भी नहीं. वो अपने वक़्त पर दरवाज़े बंद करती है, अपने हिसाब से लोग छीनती है, [….]
ज़रा सोचिए… अगर मैं आपसे कहूँ कि विलियम शेक्सपियर का जन्म हिंदुस्तान में हुआ था – तो? और अगर यह भी जोड़ दूँ कि उनका जन्म बंबई में, ब्रिटिश माता-पिता के घर हुआ था – तो? फिर यह भी बताऊँ कि वह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में कैप्टन थे, बाद में ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट बने, और हिंदुस्तान से लेकर पश्चिम एशिया तक घूमते-फिरते रहे!!! [….]
मैं फ़ोटोग्राफ़र होने का कोई दावा नहीं करता, न ही हूँ. हाँ, इतना ज़रूर है कि ज़िंदगी ने मुझे कुछ नामी फ़ोटोग्राफ़रों के क़रीब बैठने का मौक़ा दिया, जिनकी सोहबत में मैंने तस्वीर को देखना और समझना सीखा—कभी उनकी बातों से, कभी उनकी ख़ामोशियों से. वही लोग थे जिन्होंने मुझे बार-बार समझा कर ठीक-ठाक तस्वीर लेने का हौसला दिया और [….]
(आजकल दिल्ली के क़िला राय पिथोरा परिसर में एक अभूतपूर्व प्रदर्शनी ‘द लाइट एंड द लोटस’ चल रही है. यह लेख उन 127 साल पुराने पिपरहवा में मिले बुद्ध के अवशेषों और रत्नों की घर-वापसी की कहानी है, जिन्हें नीलामी की दहलीज़ से बचाकर भारत वापस लाया गया. लेखक इस प्रदर्शनी के माध्यम से बुद्ध की कलात्मक विरासत और आज के अशांत [….]
कुछ दिन पहले एक नेकदिल मौसी ने, अपनी पुरानी मुस्कुराहट के साथ, रजनी को एक अजीब-ओ-ग़रीब तोहफ़ा भेजा—वो थे शंख, शंकु या कोन या यूं कहिए तीन समुद्री सीपियाँ. ये कोई छोटी सीपियाँ नहीं थीं ख़ासे बड़े शंख थे. उनमें से एक ने तो आते ही दिल चुरा लिया—जैसे भीड़ भरे बाज़ार में कोई अजनबी चेहरा अचानक अपना-सा लगने लगे. [….]
बचपन का भी वो बहुत पहला और कच्चा-सा हिस्सा था, जब न ‘सराय’ का मतलब पता था, और न ही यह मालूम था कि ‘रोहिल्ला’ होता क्या है. उस वक़्त की यादें भी कैसे बची हैं, ये सोच कर भी मैं हैरान हूँ. दिल्ली के सराय रोहिल्ला स्टेशन से हमारा घर कुल चार सौ मीटर पर था. घर के पास से बहुत-सी रेल लाइन गुज़रती थीं जिन पर से रेलगाड़ी [….]
वैलेंटाइन डे से ठीक तीन दिन पहले, दिल्ली-एनसीआर की एक बीस-बाईस बरस की लड़की ने “हाउ टू किस” की क्लास का ऐलान किया—फ़ीस दो हज़ार रुपये प्रति व्यक्ति. आधे घंटे की “लाइव क्लास”. लड़के-लड़कियाँ, आमने-सामने. जो सीखना चाहें — “चूमने का हुनर”.
पता चला है कि हज़ार से ज़्यादा नौजवानों ने नाम लिखवा दिया. मगर “उस्तानी” [….]
देखो, मैं भी क़रीबी था
मैं अब यह मानने लगा हूँ कि मौत अकेली नहीं आती. वो आती है चुपचाप, दबे पाँव, बर्फ़-सी शांत, लेकिन आज उसके बाद जो आता है वो मौत से कहीं ज़्यादा बेरहम होता है. वो शोर, वो भीड़, वो तमाशा जो मरने वाले के साथ नहीं ज़िंदा लोगों के लिए होता है. मौत तो अपना काम कर चुपचाप चली जाती है पर उसके साथ जो सन्नाटा आना चाहिए [….]
कुछ तारीख़ें कैलेंडर पर सिर्फ़ अंक नहीं होतीं—वे अपने भीतर एक पूरी सभ्यता का शोक समेटे होती हैं. 18 जनवरी ऐसी ही एक तारीख़ है. 18 जनवरी की उदासी को अगर पूरी तरह समझना हो, तो 1947 के उस ज़ख़्म को भी याद करना पड़ेगा, जिसे हम बँटवारा कहते हैं.
हिंदुस्तान का बँटवारा, वंड, विभाजन या पार्टीशन सिर्फ़ ज़मीन का नहीं था—यह यादों [….]
जब किसी चीज़ या जगह को ज़ोर-ज़बरदस्ती, रगड़-रगड़ कर चमका दिया जाता है तो उस पर कुछ वक़्त के लिए चमक तो आ जाती है पर उसकी असल ख़ूबसूरती बिगड़ जाती है. प्रगति मैदान में हर बरस होने वाले किताब मेले का इस बार कुछ ऐसा ही हाल है भारत मडंपम के पाँच हॉल में लगा यह मेला बिल्कुल अस्पताल के सैनिटाइज़्ड वार्ड जैसा लगता [….]
जैसा हाल देस का, वैसा घर का हाल. आजकल घर में एस.आई.आर. चल रहा है. जी हाँ, स्पेशल इन्सेंटिव रिवीज़न—कोने-कोने में झांक कर तफ़्तीश हो रही है. आप कहेंगे, ये क्या मज़ाक है, घर में कुल चार जन हैं, वहाँ कौन देसी, कौन बिदेसी. घर में कहाँ घुस आएंगे कोई. अरे, एक तो आप समझते नहीं हैं. ये कोई अपने वाले, दूसरे वाले, बंगाली [….]
आपने कभी नीला कुंजारी (नीलकुरंजी) के फूल देखे हैं, जो 12 साल में सिर्फ़ एक बार खिलते हैं? नहीं? तो आप नीले रंग के सम्मोहक जादू से नावाक़िफ़ हैं, आप नहीँ जानते कि नीले रंग के उस शेड को देखने, निहारने और अपनी आँखों में बसाने के लिए इंसान क्या कुछ कर सकता है. नीलकुरंजी का नीला क़ुदरत के रंग सँजोने की कला के नाम इक सिजदा है. [….]
मुझे यह भी नहीं मालूम
कि मैं कितनों को नहीं जानता.
शुक्ल जी से मैं कभी मिला नहीं, मुलाक़ात का कोई ज़रिया नहीं बना, कभी आमना-सामना भी नहीं हुआ. हाँ, दूर से उन्हें कई बार देखने-सुनने का मौक़ा मिला, उनका लिखा पढ़ता रहा, उनके बारे में ख़बरें देखता रहा. उन्हीं की कविता से ली गई पंक्ति से कहा जाए तो मैं सचमुच उनको नहीं जानता था. [….]
रात हो चुकी थी, वैसे भी मैं वहाँ देर से पहुँच था. ख़ुदा का घर बंद हो चुका था और ताला ‘अंदर’ से लगा था. उसके साथ सटे हुए बंगले में मौज-मस्ती का आलम था. मैं बस बाहर से ही नमस्ते कर आगे बढ़ने ही लगा था कि उस घर के रास्ते ने मुझे सोचने पर और यह तस्वीर लेने पर मजबूर कर दिया. उस तक पहुँचने के लिए इस सँकरे रास्ते नें मुझे [….]
सत्रह दिसंबर की रात सूफ़ी परंपरा में मातम की नहीं, विसाल की रात है. मौलाना जलालुद्दीन रूमी के लिए मौत कोई अंत नहीं, बल्कि माशूक़ से मुलाक़ात थी. मेरे लिए रूमी को याद करना, उनके लिखे को पढ़ना, उसे सुनाना हर बार नए शब्दों में लिखना—अपने दिल पे पड़े बोझ को हल्का करने जैसा होता है. रूमी की ज़िंदगी, इश्क़ का उनका फ़लसफ़ा, [….]