कभी-कभी यादों को आवाज़ देना भी फ़ातिहा की तरह होता है
क़िस्से लिखना और गढ़ना इसलिए आसान लगता हैं क्योंकि उन्हें लिखते वक़्त लेखक ख़ुदा बन जाते हैं. लेखक के बस में है कि वो जब चाहे क़िस्सों को, किरदारों को जहाँ चाहें मोड़ दें, जिसे चाहें मार दें, जिसे चाहें बचा लें, जिस दर्द को चाहें ख़ामोश कर दें. पर असल ज़िंदगी… वो किसी की नहीं सुनती, लेखक की भी नहीं. वो अपने वक़्त पर दरवाज़े बंद करती है, अपने हिसाब से लोग छीनती है, और कई बार बिना वजह तकलीफ़ देती रहती है.
शायद इसी लिए इंसान सदियों से कहानियाँ लिखता आया है—ताकि उस “असल” से थोड़ी देर की मोहलत मिल सके, जिसे बदल पाना इंसान के बस में नहीं है. क़िस्सों में हम वो कह देते हैं जो ज़िंदगी में कह नहीं पाते, और हमें जिन ज़ख्मों का इलाज नहीं मिलता, उन्हें अल्फ़ाज़ का मरहम दे देते हैं.
अजीब बात तो ये हैं कि ये ‘असल दर्द’ जितना गहरा हो ज़ुबान को उतने ही सादे और ख़ूबसूरत लफ़्ज़ मिलते चले जाते हैं. शायद इसी लिए दुनिया की सबसे अच्छी शायरी, सबसे अच्छे अफ़साने, और सबसे सच्ची दुआएँ… आराम से नहीं, तकलीफ़ से, दर्द से, ट्रेजेडी से पैदा हुई हैं.
फ़ैज़ का एक मिसरा याद आ रहा है—“और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा…”
कुछ दुख ऐसे होते हैं जिनके सामने अल्फ़ाज़ छोटे पड़ जाते हैं. इन दुखों से गुज़रने वाला आदमी लोगों के बीच बैठा तो रहता है, बातें भी कर लेता है, मगर उसके भीतर कहीं एक भारी पत्थर रखा रहता है जिसे वो हर साँस के साथ महसूस करता है. ऐसे वक़्त में सबसे मुश्किल चीज़ यह नहीं होती कि दर्द है— बल्कि यह कि दुनिया अपनी रफ़्तार से चलती रहती है, जबकि झेलने वाला इंसान भीतर से ठहर चुका होता है.
हर गहरे दुख की एक अजीब फ़ितरत होती है: वो इंसान को बदलने लगता है या बदल देता है. कभी तोड़ कर, कभी कुरेद के गहरा कर देता है. बाज़वक़्त तो बस दिन काटना भी बड़ी बहादुरी होती है. जो लोग दर्द को महसूस करने की सलाहियत रखते हैं, वही आगे चलकर दूसरों के दुख को भी सचमुच समझ पाते हैं. कभी-कभी दुख बाँटा नहीं जाता—बस किसी की मौजूदगी में थोड़ी देर रखा जाता है, ताकि उसका वज़न अकेले न उठाना पड़े. कुदरत ने दोस्त शायद इसी लिए बनाए थे .
माँ का जाना सिर्फ़ एक इंसान का जाना नहीं होता—वह घर की आवाज़, दुआ, साया, आदत, और आदमी के भीतर का एक हिस्सा साथ ले जाता है, शायद हमेशा के लिए. माँ के जाने के बाद दुनिया वैसी नहीं रहती. उम्र चाहे जितनी हो जाए, इंसान के भीतर एक बच्चा हमेशा अपनी माँ की तरफ़ ही देखता रहता है. जब वह साया उठता है, तो भीतर कहीं अनाथपन उतर आता है—ऐसा जिसे शब्दों में ठीक से बयान करना मुश्किल है. मैंने अपने पिता को ताउम्र देखा है-वो अपने आप को सिर्फ़ यतीम ही लिखते थे – उनकी माँ, यानि मेरी दादी, उन्हें जन्म देते ही गुज़र जो गई थीं.
1 मई अभी बहुत दूर नहीं गई. दुख अभी ताज़ा है, ज़ख्म खुला हुआ है. एक ख़ालीपन है जो गूँजता है. बार-बार मन छोटी-सी चीज़ पर टूट जाता है—उनकी आवाज़ जो दिन भर बुलाती रहती थी याद आती है, उनके कपड़े, दवाईयां, तस्वीरें, उनका चश्मा, फ़ोन और पास खड़ी व्हील चेयर देख उनके कमरे में झाँकने लगता हूँ… फिर याद आता है कि अब दूसरी तरफ़ ख़ामोशी है, उस कमरे में रहने वाला कहीं चला गया है.
इस ख़ालीपन का सबसे मुश्किल हिस्सा रातें होती हैं. दिन किसी तरह लोगों, कामों, आवाज़ों में कट जाता है, मगर रात को यादें धीरे-धीरे आकर पास बैठ जाती हैं. और फिर आदमी सोचता रहता है — काश एक बार और बात हो जाती, एक बार और पाँव चूम लिया होता, एक बार और “माँ” कह लिया होता.
माँ चाहे दुनिया से सिधार जाए पर आपके भीतर मौजूद रहती है. आपकी ज़ुबान में, आपकी आदतों में, आपकी दुआओं में, यहाँ तक कि आपके दुख मनाने के तरीके में भी. माँएँ पूरी तरह जाती नहीं हैं—वे अपने बच्चों के अंदर बस जाती हैं ऐसी ख़ुशबू की तरह जो चंदन के पेड़ में होती है.
किसी अपने को—और ख़ास तौर पर अपनी माँ को—आख़िरी साँस लेते हुए देखना, उसके आख़िरी वक़्त में उसका हाथ थामे रहना, और फिर अचानक उस साँस का रुक जाना… ये सिर्फ़ एक “याद” नहीं रहती, भीतर कहीं एक गूंज बन जाती है जो बार-बार लौटती है. वो आख़िरी लम्हा इंसान की रूह पर लिखा जाता है.
उस मंज़र में एक और बात भी थी—जिसका पूरी तरह समझना अभी शायद मुश्किल हो—पर उनके आख़िरी वक़्त में मैने माँ को तन्हा महसूस नहीं होने दिया. उनकी आख़िरी साँस किसी अजनबी कमरे में, अस्पताल या अकेलेपन में नहीं गई – उनका हाथ उनके अपने बेटे के हाथ में था. दुनिया से जाते वक़्त भरी आँखों से जिस चेहरे को उन्होंने आख़िरी बार महसूस किया होगा, वह किसी अपने का था. यह मामूली बात नहीं है. बहुत से लोग अपने प्यारों को यह साथ भी नहीं दे पाते. आख़िरी लम्हों में इंसान अक्सर शब्दों से ज़्यादा मौजूदगी महसूस करता है. मेरा वहाँ होना—उनका हाथ पकड़े रहना— शायद उनके लिए बड़ी राहत रही होगी.
माँ के वो आख़िरी 15-20 मिनट रह-रह कर आँखों के सामने आते हैं, उन्हें भुलाना मुमकिन नहीं है. अब उन्हीं आख़िरी लम्हों के साथ दूसरी यादें भी वापस आने लगीं हैं— उनकी आवाज़, उनकी डाँट, उनका इंतज़ार करना, उनका खाना परोसना, छोटी-छोटी बातें. वक़्त उस आख़िरी पल को मिटाता नहीं, मगर उसके आसपास पूरी ज़िंदगी की यादें फिर से खड़ी कर देता है.
और ये भी सच है कि वही यादें जो तकलीफ़ देती है, अचानक किसी मोड़ पर एक छोटी-सी रोशनी भी रख देती है — एक इंसान, एक याद, एक किताब, एक तस्वीर, एक बातचीत…या बस किसी सुबह की कोई आख़िरी सलाम-दुआ. मिलते हैं माँ .
माँ का हाथ मेरे हाथों में था, उन्होंने मेरी उँगलियों में अपना काँपता हुआ हाथ थामे आख़िरी साँस ली. उनकी रगों में दौड़ते नूर को, उनकी धड़कन को मैं धीरे-धीरे बुझता, थमता महसूस कर रहा था. फिर उनकी भारी सांसें अचानक ख़ामोश हो गई — पर उन साँसों की गूँज बहुत देर तक भीतर सुनाई देती रही. उस एक पल के बाद सब सन्नाटा था.
माँ शांत थीं. उनकी अधखुली आँखों में एक अजीब-सी तसल्ली थी—जैसे वह मुझे आख़िरी बार देख रही हों. उन्हें और मुझे, दोनों को मालूम था कि उनकी ज़िंदगी के वो आखिरी लम्हे हैं. मैं काफ़ी देर तक यूँ ही उनका हाथ थामे बैठे रहा. उनकी भरोसा देने वाली कमज़ोर पकड़ में एक आख़िरी हुक्म था—अब मुझे जाने दे.
कुछ ही देर में उनका गरम हाथ ठंडा पड़ने लगा. उससे पहले कि मैं उनके माथे को चूम पाता उन्होंने आख़िरी बार पानी की एक बूंद के लिए होंठ खोले. पर तब तक देर हो चुकी थे—अब कोई अमृत उन्हें लौटा नहीं सकता था. उसी पल मेरे भीतर एक डोर टूट गई—वही डोर जो जन्म से माँ और बच्चों को बाँधे रखती है. मैंने अपनी नाल में एक अजीब-सी ऐंठन महसूस की—जीवन का मूल संबंध जो एक बार पहले कटा था अब पूरी तरह टूट चुका था.
माँ को गए आज दस दिन हो गए. माँ—कृष्णा ग्रोवर अरोड़ा ने एक मई को इस दुनिया से विदा ली.
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