वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे/ जो इश्क़ को काम समझते थे/ या काम से आशिकी करते थे/ हम जीते जी मसरूफ रहे/ कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया/ काम इश्क़ के आड़े आता रहा या/ इश्क़ से काम उलझता रहा/ आखिर में तंग आकर हमने/ दोनों को अधूरा छोड़ दिया.. [….]
उनकी शायरी की सोहबत का एक फ़ैज़ तो यही है कि ‘उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है..’. फ़ैज़ सच्चे वतनपरस्त थे और दुनिया भर के जनसंघर्षों के साथ खड़े होने के हामी भी. साम्राज्यवादी ताकतों ने जब भी दीगर मुल्कों को साम्राज्यवादी नीतियों का निशाना बनाया, फ़ैज़ ने उन मुल्कों की हिमायत में अपनी आवाज़ उठाई. [….]