बकौल रुप्पन, ‘मुझे तो लगता है दादा, सारे मुल्क में यह शिवपालगंज ही फैला हुआ है.’ कुछ दिनों में ही रंगनाथ को भी शिवपालगंज के बारे में ऐसा ही लगने लगा कि महाभारत की तरह जो कहीं नहीं है वह यहां है, और जो यहां नहीं है वह कहीं नहीं है.’ [….]
राजेंद्र यादव अपनी ख़ामियों-ख़ूबियों से ख़ूब वाक़िफ़ थे और इसे लेकर काफी सचेत भी. उनकी यह ख़ूबी आयुपर्यंत बनी रही कि जहां वे होते, वहां तो उनकी उपस्थिति उनके तेवर और उनकी बेबाक़ी से महसूस की ही जाती मगर ग़ायब रहकर भी चर्चा के केंद्र में बने रहने का हुनर उन्हें ख़ूब हासिल था. [….]
हमारे दौर में जब पत्रकारिता का मूल धर्म और उसके सरोकार सत्ता और सिक्कों की चकाचौंध में धुंधला रहे हैं, गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन और उनका लेखन फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं. उन्हें फिर से पढ़े-समझे जाने की बहुत ज़रूरत लगती है. [….]
बुंदेलखण्ड के टीकमगढ़ में मेरी ननिहाल है. मेरे नाना समशेर ख़ाँ वहाँ हर साल होने वाली ‘रामलीला’ में रावण का किरदार अदा करते थे. नानी के घर की दीवार पर आज भी रावण के गेटअप में उनकी तस्वीर के साथ एक और तस्वीर लगी हुई है [….]
लाहौर छोड़ने के बाद दिल्ली में कुछ वक़्त बिताकर साहिर लुधियानवी जब बंबई गए, तब तक उनका पहला संग्रह ‘तल्ख़ियाँ‘ छप चुका था और वह मशहूर हो चुके थे. अपनी ग़ज़लों, नज़्मों की बदौलत उन्हें ख़ूब शोहरत और अवाम का ढेर सारा प्यार मिला. [….]
लैटिन से फ़्रेंच तक आने में ऑमलेट ने लंबा सफ़र किया है मगर दुनिया की कितनी ही ज़बानों में यह इसी नाम से पुकारा जाता है. डेनिश, पोलिश, स्वीडिश, तुर्की, हिन्दी, अंग्रेज़ी में इसके उच्चारण में भेद ज़रूर है मगर लफ़्ज़ यही है. [….]
ख़ुशदिल | कपिल देव की यह तस्वीर उनके लाखों प्रशंसकों के लिए राहत का पैग़ाम है. परसों देर रात को ओखला के अस्पताल में भर्ती हुए कपिलदेव की एंजियोप्लास्टी हुई थी. [….]
उर्दू की मॉडर्न कहानी के चार स्तंभ रहे. तीन का भार मर्दाने कन्धों पर था – कृश्नचन्दर, राजिंदर सिंह बेदी और सआदत हसन मंटो. चौथा कंधा ज़नाना था. इस अकेले स्तंभ में इतनी ताक़त रही कि इन्हें ‘मदर ऑफ़ मॉडर्न स्टोरी’ कहा गया. [….]
आपको ‘उमराव जान’ की ख़ानम जान की याद है! और ‘बाज़ार’ की हजन बी! ‘सलाम बाम्बे’ के रेडलाइट एरिया के कोठे की मालकिन!! हालांकि यह उनकी शख़्सियत का एक पहलू है. शौकत कैफ़ी ने लम्बे अर्से तक पृथ्वी थिएटर और इप्टा में सक्रिय रहीं [….]
एक कैफ़ियत होती है प्यार. आगे बढ़कर मुहब्बत बनती है. ला-हद होकर इश्क़ हो जाती है. फिर जुनून. और बेहद हो जाए तो दीवानगी कहलाती है. इसी दीवानगी को शायरी का लिबास पहना कर तरन्नुम से पढ़ा जाए तो उसे मजाज़ कहा जाता है. [….]