सत्रह दिसंबर की रात सूफ़ी परंपरा में मातम की नहीं, विसाल की रात है. मौलाना जलालुद्दीन रूमी के लिए मौत कोई अंत नहीं, बल्कि माशूक़ से मुलाक़ात थी. मेरे लिए रूमी को याद करना, उनके लिखे को पढ़ना, उसे सुनाना हर बार नए शब्दों में लिखना—अपने दिल पे पड़े बोझ को हल्का करने जैसा होता है. रूमी की ज़िंदगी, इश्क़ का उनका फ़लसफ़ा, [….]