ख़ालिद जावेद का नया उपन्यास ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ उर्दू फ़िक्शन में एक ऐसे तजुर्बे की हैसियत रखता है, जिसे सिर्फ़ एक कहानी या पारंपरिक उपन्यास के पैमानों से समझना मुमकिन नहीं. यह उपन्यास अपने बयानिया, भाषा, माहौल, मनोवैज्ञानिक गहराई, [….]
‘सहर’ — यानी भोर, उजाले की पहली आहट. ज़रा इस मंज़र की कल्पना कीजिए. आप एक किताब के लोकार्पण समारोह में बैठे हैं. किताब, हिंदुस्तान के बीसवीं सदी के बड़े शायर की उर्दू जीवनी का अंग्रेज़ी अनुवाद है. हॉल में उनकी लिखी फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लें धीमे-धीमे तैर रही हैं. बड़े से मंच के दोनों ओर लगी बड़ी एलईडी स्क्रीन पर एक संजीदा चेहरा बार-बार उभरता है. एक ऐसा [….]
संवाद बुकशेल्फ़ | ऐसे में जब शहरी लैंडस्केप से किताबों की दुकानें ग़ायब होती जा रही हैं और ऑनलाइन ठिकाने या प्रकाशक ही किताबें ख़रीदने का अकेला ज़रिया बनते जा रहे हैं, यह स्तंभ हिंदी और अंग्रेज़ी की नई-पुरानी किताबों से आपका परिचय कराने और उनके बारे में मुख़्तसर जानकारी देने की कोशिश है. इनमें संपादक की पसंद की किताबें भी शामिल होंगी. पढ़ने वालों की सहूलियत के लिए [….]
‘मंटो साब दोस्तों की नज़र में’ ऐसी किताब है, जो मंटो को सिर्फ़ एक लेखक नहीं, बल्कि एक जीवित, जटिल और बेहद मानवीय इंसान के रूप में सामने लाती है. यह पुस्तक किसी एक लेखक की दृष्टि नहीं, बल्कि कई लेखकों और साथियों की नज़र से मंटो को समझने की कोशिश है—यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है. इसमें कृश्न चंदर, मुहम्मद तुफ़ैल, शाहिद अहमद देहलवी, इस्मत चुग़ताई, बलवंत [….]