देवरिया | सुपर डीलक्स सुइट में गुज़री रात की याद

  • 7:11 pm
  • 26 August 2020

यह अगस्त 2013 की बात है. गोरखपुर में काम करते हुए तब पहली बार देवरिया में रुकने की ज़रूरत पेश आई थी. दफ़्तर के काम से कुछ तहसीलों तक सुबह-सुबह जाने का इरादा था और देवरिया में ही लोगों से मिलते-जुलते शाम हो गई थी सो वहीं ठहरना मुनासिब लगा. आमतौर पर ऐसी जगहों पर सरकारी गेस्ट हाउस में रुकने का मेरा तजुर्बा अच्छा है, होटल के मुक़ाबले सहूलियत थोड़ी कम ज़रूर होती है मगर फिर जेब पर उतना भारी भी नहीं होता. मगर मेरे साथी अरुण सहाय का मानना था कि गेस्ट हाउस में बिजली का कोई ठिकाना नहीं होता, जेनरेटर चालू हालत में हो, यह भी ज़रूरी नहीं सो होटल ही बढ़िया रहेगा. देवरिया के साथियों से मशविरा करके शहर के सबसे बढ़िया होटल रेणुका में रुकना तय हुआ. तजुर्बा करने के ख़्याल से मैंने भी हां कर दी.

तो साहबान, यह क़िस्सा मुख़्तसर रेणुका होटल के डीलक्स सुइट में बिताई हुई एक रात का है. बिताई हुई, मैं तकल्लुफ़न कह गया, वरना उस वक़्त तो ‘बीती ना बिताई रैना…’ ही दिमाग़ में गूंजता रहा था. मुख्य सड़क से अंदर होटल तक पहुंचने में पहले तो ड्राइवर को कौशल का इम्तहान देना पड़ा. फिर दो माले की सीढ़ियों का सफ़र भी बहुत ख़ुशगवार नहीं था. आज तक मैं यह रहस्य भी नहीं जान पाया हूं कि इन होटलों में ग्राउण्ड फ़्लोर पर ठहरने की शर्त क्या होती होगी? ख़ैर, जब ठहरने गए ही थे तो फिर यह भी सही.

आदतन बिस्तर का मुआयना किया तो मालूम हुआ कि गद्दा गुदगुदा वाला है. यह भी बड़ा मनोवैज्ञानिक क़िस्म का फ़ैसला होता है मगर अपनी फ़ितरत कुछ ऐसी है कि ऐसे गद्दों की मौजूदगी से भी उलझन होने लगती है. तो मदद के लिए हाउस कींपिंग को फ़ोन लगाया. फ़ोन नहीं उठा तो रिसेप्शन पर लगाया. रिसेप्शन वाले सज्जन से दरख़्वास्त की कि किसी को भेजकर मेरे बिस्तर का गद्दा पलटवा दें. उधर से सवाल आया – ‘ऊ काहे, का खराबी है उस गद्दे में.’ इस बेहूदे सवाल का जवाब देने का ताब उस वक़्त मुझमें नहीं थी. दिन भर काम और फिर उनके यहां की सीढ़ियां चढ़कर पस्त था. मैंने बताया कि मुझे सख़्त मैट्रेस की दरकार है, पलट देने से काम चल जाएगा. इस बार फ़ोन के दूसरी तरफ़ वाली आवाज़ कुछ चकराई-सी लगी – ‘गजब बात करते हैं…इहां सब लोग ऐसा ही गद्दा मांगता है. अउर गद्दा पलटने से कुछ न होगा, वह ऐसई रहेगा.’ अब मैंने थोड़ा सख़्ती से कहा कि वह दूसरा गद्दा भिजवा दें. बताया गया कि उनके यहां सख़्त गद्दे का रिवाज़ नहीं है सो इसी पर सोना पड़ेगा. झुंझलाकर मैंने फ़ोन पटक दिया.

कमरा बंद करके नीचे चला गया. थोड़ी देर में साथी आ गए. मैंने साफ़ कह दिया कि खाना होटल में नहीं खाना है. होटल के मेन्यू में तो वैसे भी तैंतीस क़िस्म का पनीर या फिर मिक्स वेज टाइप ही कुछ होगा. कहीं बाहर चलकर देखते हैं. दिन में मैंने बाज़ार से गुज़रते हुए बाटी-चोखा के कई ठिकाने देखे थे. पहले तो साथियों ने हाईजीन का हवाला देकर टालना चाहा फिर बड़े संकोच से तैयार हुए. मगर वह दिन ही शायद ऐसा था. हमें देर गई थी, वे ठिकाने तब तक सिमट चुके थे. झख मारकर किसी रेस्तरां में गए, ख़ूब गुलाबी रंग वाला मंचूरियन और ‘यह लघु सरिता का बहता जल..’ टाइप शोरबे में पड़े छोले ही हिस्से में आए.

बाहर से पानी की बोतलें ख़रीदकर लौटा तो हस्बे मामूल सोने की तैयारी के दौरान ख़बरें सुनने के लिए टीवी खोल लिया. एसी चलाने के साथ ही पंखा चलाने को बटन दबाया तो पंखे में कई हरकत नहीं हुई. उस सुपर डीलक्स सुइट को अब थोड़ा ग़ौर से देखा. सिरहाने की तरफ़ लगी मच्छर भगाने वाली मशीन में शीशी ख़ाली मिली. रिसेप्शन को फ़ोन किया. जवाब आया – ठीक है, अभी भेजते हैं. पंद्रह मिनट में ख़बरें निपट गईं और तभी घंटी बजी. हाथ में मशीन के लिए रीफ़िल और टेस्टर लिए एक नौजवान दरवाज़े पर खड़ा था. अंदर आकर उसने ख़ाली शीशी बदल दी और टेस्टर लेकर सारे सॉकेट की जांच कर डाली, पंखे का स्वीच कई बार ऑन-ऑफ़ किया. पंखा टस से मस नहीं हुआ. उसने बताया कि इलेक्ट्रीशियन तो अब चला गया है, पंखा तो अब सुबह ही ठीक हो पाएगा.

उसे विदा किया और कपड़े बदलकर बिस्तर पर लेटा तो इलाहाबाद के बदरा सोनौटी वाले कैम्प की याद हो आई, जहां कुम्भ में जुटे हिप्पियों ने ज़मीन में गड्ढ़ा खोदकर अपनी रिहाइश बना रखी थी. थकान के बावजूद नींद नहीं आ नहीं थी. टीवी का रिमोट उठाकर सारे चैनल बदल डाले मगर अंग्रेज़ी का कोई चैनल नहीं दिखाई दिया, न न्यूज़ का और न ही कोई एंटरटेनमेंट चैनल. रिसेप्शन को फ़ोन लगाया. जवाब मिला – ‘नहीं, इंग्लिश का चैनल तो नहीं होगा. यहां इंग्लिश चैनल कौन देखता है?’

लेटे-लेटे बिस्तर के पड़ोस में रखे रेडिएटर पर ध्यान गया. सोचता रहा कि इस भीषण गर्मी के दिन में जब रेडिएटर के बारे में सोचकर ही पसीना आ जाए, यहां ठहरने वाले या होटल के लोग इसका भला क्या इस्तेमाल करते होंगे? फिर देखा कि रेडिएटर के क़रीब ही एक पीकदान भी क़रीने से रखा हुआ था. पूरब के शौक़ीनों की लत के लिहाज़ से पीकदान की ज़रूरत का ख़्याल करने वाले पर फख़्र हुआ. तसव्वुर में साइड टेबिल पर एक पानदान और दूसरी ओर एक हुक़्क़ा भी आया.

अवधी तहज़ीब वाले दो लोगों के उस सराय में ठहरने और उनके बीच बातचीत भी ज़ेहन में आई, शतरंज के खिलाड़ी याद आए – ‘कुछ भी कहिए मियां, इंतज़ाम तो यहां का बढ़िया है.’ और हुक़्क़े की निगाली दूसरे की तरफ़ बढ़ा देता. इसके पहले देवरिया के नाम पर सिर्फ़ पड़रौना जानता था. वहां के लोगों के बारे में तरह-तरह के क़िस्से मशहूर थे. यों इन क़िस्सों के उलट पड़रौना के एक शख़्स को जानता हूं, जिन्हें संगीत की गजब समझ थी और जो बेहतरीन वायलिन बजाते. मुझे गिटार बजाने का मामूली शऊर उन्हीं की बदौलत आया. हालांकि पड़रौना तो अब देवरिया का हिस्सा ही नहीं रहा. देवरिया तो कहते हैं कि कभी ‘देवारण्य’ हुआ करता था. और यह सब सोचते हुए नींद आ ही गई.

मगर कुछ कसर अब भी बाक़ी रह गई थी. सबेरे भर ब्रश करते वक़्त वॉश बेसिन की टोंटी का पानी कुछ गर्म लगा तो सोचा कि गर्मी इस क़दर है कि टैंक का पानी सवेरे-सवेरे ही गर्म आने लगा है. मगर मुंह साफ़ करने के लिए टोंटी के नीचे अंजुरी बढ़ाई तो तेज़ झटका लगा, पानी लगभग खौल रहा था, उंगलियां जल गईं. मालूम हुआ कि होटल रेणुका में ग़ीजर का पानी दाईं तरफ़ की टोंटी में आता है और पिछली रात को कमरे और बाथरूम के तमाम स्वीच ऑन करने वाला गीज़र का स्वीच भी ऑन कर गया था. किसी तरह तैयार होकर नीचे उतर रहा था तो बीच वाले फ़्लोर पर ताश के पत्तों की छवि-जैसा कुछ चमका. वहां महाराजा और महारानी नाम के दो ख़ास सुइट्स और थे. सोचता रहा कि जब सुपर डीलक्स के नाम पर इतनी दुर्गति हुई है तो महाराजा का क्या हस्र होता होगा वहां?

सम्बंधित

यादों में शहर | मरुउद्यान की मेहमानी

यादों में शहर | ललितपुर

यादों में शहर | सड़क विवेकानंद की, गली मानिक सरकार की और मकान देवदास का

यादों में शहर | सुकुमार-सा देहरादून किसी अधेड़ की शक्ल में मिला


अपनी राय हमें  इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.