हमारे बचपन से बड़े होने तक खिचड़ी ही ऐसा त्योहार रहा, जिसकी तारीख़ पक्की होती – 14 जनवरी. सूर्य के उत्तरायण आने के बारे में तो बहुत बाद मालूम हुआ वरना तिल-गुड़ और खिचड़ी के भोग और दान का ही पता होता. स्वाद इंद्रियों की कसरत का मौक़ा भी होता. [….]
उनकी शायरी की सोहबत का एक फ़ैज़ तो यही है कि ‘उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है..’. फ़ैज़ सच्चे वतनपरस्त थे और दुनिया भर के जनसंघर्षों के साथ खड़े होने के हामी भी. साम्राज्यवादी ताकतों ने जब भी दीगर मुल्कों को साम्राज्यवादी नीतियों का निशाना बनाया, फ़ैज़ ने उन मुल्कों की हिमायत में अपनी आवाज़ उठाई. [….]