सामने के कमरे से टीवी की आवाज़ आनी बंद हो गई थी. रसोई में रात भर जलने वाली हलकी नीली बत्ती किसी ने जला दी थी. घर शांत था. किताब से आँखें उठा कर मैंने घड़ी देखी तो समय था 10.35. [….]
रात दिवाली की है.गुडगाँव के जिस हिस्से में हम रहते हैं, वहां के बाशिंदो पे पटाख़े चलाने की कोई पाबन्दी लागू नहीं होती चाहे वो सरकार की हो, सुप्रीम कोर्ट की हो या गलाघोंटू प्रदूषण की हो. धमाके, शोर, आवाज़ें, धुआँ और अमावस के काले आसमान को भी चौंकाने वाली हवाइयों से फूटते रंगीन सितारे यक़ीनन लंका से लौटते राम को भी परेशान कर रहे होंगे. देवी [….]
अभी-अभी माँ के साथ सुबह की पहली चाय पी कर आया हूँ. अख़बार सामने रख वो बिना चश्मा पहने बहुत देर तक उसमे कुछ ढूंढती रहीं थी. उनकी नज़र न ख़बरों पे थी, न तस्वीरों पे, न ही अख़बार पे ही थी वो शायद कुछ और ही ढूंढ रही थी. टेबल के दूसरी तरफ़ वो मुझे बार-बार देख रही थीं कि मैं क्या देख रहा हूँ. झेँप कर मैं अपनी नज़र अपने सामने रखे अख़बार [….]
(माँ का होना इस क़ायनात की हर शै के लिए नेमत है. बढ़ती उम्र और समझ के साथ रिश्ता जताने वाला यह एक लफ़्ज़ और मानीख़ेज़ होता चला जाता है, ममत्व की छटाओं के रंग पहले से ज़्यादा साफ़ और चटख़ होते चले जाते हैं, ज़िंदगी की ख़ुशियों और ग़म में भी माँ का साथ होना किस क़िस्म का संबल, कैसी तसल्ली होती है, कौन नहीं जानता. राजिंदर जी का यह [….]
(माँ को केंद्र में रखकर राजिंदर अरोड़ा ने पिछले दिनों जो कुछ लिखा है, वह माज़ी का आईना है, वह हमारे समय और अतीत के बीच ऐसा सेतु भी रचता है, जिससे गुज़रते हुए हम ज़िंदगी की तमाम ख़ुशहाली, हालात से पैदा तल्ख़ियों को ज़्यादा क़रीब से देख-समझ पाते हैं और जो इनके बीच संतुलन बनाकर जीते जाने की कहानी भी है. पिछले कुछ [….]
बरेली में ख़्यालगोई की पुरानी रवायत कोविड आने के पहले तक जैसे-तैसे चलती ही रही थी, मगर ज़िंदगी की बहुतेरी ख़ूबसूरत चीज़ों की तरह यह रवायत भी महामारी की भेंट चढ़ गई. नवरात्रि के मौक़े पर कालीबाड़ी में जुटने वाले मेले का एक आकर्षण ख़्यालगोई का दंगल भी हुआ करता था, जिसमें दूसरे शहरों के नामचीन ख़्यालगो भी शिरकत करते थे और सुनने वालों की भीड़ [….]
(हंस के 1986 के नवंबर अंक में छपी ‘नासपीटी कलट्टरी’ मेरी ख़ास पसंद इसलिए बन गई कि राजेंद्र यादव जी ने उसकी अनेक बार अनेक तरह से चर्चा और प्रशंसा की ही थी- अपने संपादकीय में भी तीन-चार बार उसका प्रमुखता से उल्लेख किया था. बाद में कृष्णा सोबती द्वारा उसे 1986 की श्रेष्ठ कहानी के रूप में ज्ञानपीठ से छपे भारतीय भाषाओं के एक संकलन [….]
मौसम आने से पहले उसकी भनक उतर आती है उसका मिजाज़ और तार्रुफ़ उसके आगे-आगे चला आता है. ये तार्रुफ़ दरवाज़ों और खिड़कियों से न आकर घर की दीवारों, सब्ज़ियों, फलों, बग़ीचे के फूलों, और मिट्टी की नमी से आता है. कभी-कभी मौसम चाँद से उतर के भी आ जाता है. मौसम उँगलियों के पोरों पे महसूस किया जाता है, सर्दियों में खाया और ओढ़ा जाता है [….]