“उनकी दुनिया में दाख़िल होने का हुनर मैंने साध लिया था, यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे कि मकड़ी के जाले का व्यूह भेदने वाला कोई चालाक कीड़ा करता है—ख़ुद को जाल में फंसने से बचाने के लिए अपने पंखों को समेटकर, कम से कम जगह घेरते हुए—मैं अंदर दाख़िल होती और उसी रास्ते से लौटते हुए पूरी एहतियात बरतती कि कहीं जाले के धागों में [….]