दुनिया में
आठ सुर थे
तुम चुप्पियाँ
सुनना भूल गए!
—सुजाता नारायण
‘दर्रा दर्रा हिमालय’ पढ़कर ख़त्म करने के तुरंत बाद ‘रुके हुए पानी की धुन’ शीर्षक [….]
‘सहर’ — यानी भोर, उजाले की पहली आहट. ज़रा इस मंज़र की कल्पना कीजिए. आप एक किताब के लोकार्पण समारोह में बैठे हैं. किताब, हिंदुस्तान के बीसवीं सदी के बड़े शायर की उर्दू जीवनी का अंग्रेज़ी अनुवाद है. हॉल में उनकी लिखी फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लें धीमे-धीमे तैर रही हैं. बड़े से मंच के दोनों ओर लगी बड़ी एलईडी स्क्रीन पर एक संजीदा चेहरा बार-बार उभरता है. एक ऐसा [….]
संवाद बुकशेल्फ़ | ऐसे में जब शहरी लैंडस्केप से किताबों की दुकानें ग़ायब होती जा रही हैं और ऑनलाइन ठिकाने या प्रकाशक ही किताबें ख़रीदने का अकेला ज़रिया बनते जा रहे हैं, यह स्तंभ हिंदी और अंग्रेज़ी की नई-पुरानी किताबों से आपका परिचय कराने और उनके बारे में मुख़्तसर जानकारी देने की कोशिश है. इनमें संपादक की पसंद की किताबें भी शामिल होंगी. पढ़ने वालों की सहूलियत के लिए [….]
ऋत्विक घटक पर केन्द्रित किताब ‘ऋत्विक घटकः नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ भारतीय सिनेमा और सिने-विमर्श के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है. यह किताब केवल एक महान फ़िल्मकार के जीवन और कृतित्व का विवरण भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे सिने-चिन्तक, सांस्कृतिक हस्ताक्षर और वैचारिक कलाकार [….]
“उनकी दुनिया में दाख़िल होने का हुनर मैंने साध लिया था, यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे कि मकड़ी के जाले का व्यूह भेदने वाला कोई चालाक कीड़ा करता है—ख़ुद को जाल में फंसने से बचाने के लिए अपने पंखों को समेटकर, कम से कम जगह घेरते हुए—मैं अंदर दाख़िल होती और उसी रास्ते से लौटते हुए पूरी एहतियात बरतती कि कहीं जाले के धागों में [….]