ज़िंदगी उम्मीद और निराशा, जीत और हार, सुख और दुख की धूप और छाया का खेल है और खेल की ज़िंदगी भी इससे अलग कहां है. जिनसे अधिक की उम्मीद होती है, वे निराश कर देते हैं और जिनसे कोई उम्मीद रहती नहीं, वे ऐन उस वक्त उम्मीद की एक किरण से निराशा के घटाटोप में रोशनी बिखेर देते हैं [….]