रुद्रप्रयाग | केदारनाथ की ब्रह्मवाटिका में ब्रह्मकमल का पहला फूल खिल गया है. इस हफ़्ते कई और पौधों पर फूल खिल जाएंगे. सन् 2017 में केदारपुरी में ब्रह्मकमल उगाने की पहल पुलिस ने की थी. [….]
रामपुर | गुज़रे ज़माने की रियासत के आख़िरी नवाब रज़ा अली ख़ां के पोते नवाब काज़िम अली ख़ां उर्फ़ नवेद मियां ने कहा कि उनकी मंशा है कि रियासत की ज़ायदाद के बंटवारे के बाद सभी पक्षकारों की रज़ामंदी से ख़ासबाग़ पैलेस को नया रूप देकर पर्यटन केंद्र और होटल के रूप में विकसित किया जाए. [….]
चंबा | महामारी के दिनों में ऑनलाइन पढ़ाई से भी अछूते बच्चों के लिए फ़िक्रमंद शिक्षक हफ़्ते में एक बार पढ़ने-लिखने की सामग्री लेकर उनके पास पहुंचते हैं. उन तक पहुंचने वाले रास्ते इतने दुर्गम-दुरूह कि सात-आठ किलोमीटर चलने में छह-सात घंटे लग जाते हैं. [….]
जोशीमठ | फूलों की घाटी कल से सैलानियों के लिए खुल जाएगी. नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क प्रशासन ने सारी तैयारियां कर ली हैं. घाटी जाने वालों को कोविड निगेटिव की रिपोर्ट ज़रूर साथ ले जानी होगी. [….]
कानपुर | 67 साल की उम्र, लेकिन आराम नहीं. बस, बेटे की चिंता और उसकी तलाश…इसीलिए आजमगढ़ से हर महीने कानपुर आती हैं उदयराजी. बल्कि यूं कहें कि साल में 15-20 चक्कर लगा जाती हैं और यह क्रम पिछले छह साल से बना हुआ है. [….]
दरअसल जब वे अपने लक्ष्य पर निशाना साध रही होती हैं तो कुछ अंक भर हासिल नहीं कर रही होती हैं. वह अपने सपनों को उनकी मंज़िल तक पहुंचा रही होती हैं. जब वह लक्ष्य भेद रही होती हैं तो दरअसल पितृ सत्ता के बंधनों, अभावों, परेशानियों और कठिनाइयों से उपजी चुनौतियों को भी भेद रही होती हैं. [….]
गोपेश्वर| आईटीबीपी के अफ़सरों ने आज चॉको को फूल-मालाओं के साथ विदा किया. फ़र्स्ट बटालियन में 11 साल की सर्विस के बाद चॉको आज रिटायर हो गई. [….]
गोपेश्वर | अपने खेतों में आख़िरी बार धान की रोपाई करने वाली महिलाएं इन मौक़े को यादगार बनाने के लिए जागर गा रही थीं, और गाते-गाते वे रो पड़ीं. [….]
कानपुर | राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 25 जून को घर आ रहे हैं. उनकी अगवानी के लिए झींझक के रेलवे स्टेशन पर भी ख़ास तैयारियां की जा रही हैं. ख़ास रेलगाड़ी से आ रहे राष्ट्रपति झींझक स्टेशन पर रुककर 38 लोगों से मुलाक़ात करेंगे. झींझक कस्बे के ओम नगर मोहल्ले में रहने वाले उनके परिवार के लोग रहते हैं. [….]
बांदा | नरैनी में हुए ब्याह में दोना-कुल्हड़ या मउर-मंगलाचार कोई नवाचार नहीं, ऐसी परंपरा है, जिसे बिसार दिया गया है. और कुछ चेतना सम्पन्न लोग ऐसी परम्पराओं की ख़ूबियाँ याद दिलाकर उन्हें वापस अमल में लाने की कोशिश में लगे हैं. [….]