‘अमी जतो दूर जाई, आमार संगे जाए एकटा नदीर नाम’, किसी कवि की यह कल्पना तब जैसे साकार होती हुई लगी, जब प्रयागराज के पिछले कुंभ में संस्कार भारती के गंगा मनुहार कार्यक्रम की संकल्पना के बारे में जाना. हमारे लोक जीवन में भी कहा गया है, ‘कोस-कोस पर बदले पानी, पाँच कोस पर बदले बानी’. [….]