घर की एक बालकनी मुख्य सड़क की ओर है. यों तो यह सड़क शहर की दो मुख्य सड़कों को जोड़ती है, लेकिन अब इसने ख़ुद भी मुख्य सड़क की शक़्ल अख़्तियार कर ली है. ख़ूब आवाजाही रहती है इस सड़क पर. सड़क के उस पार बालकनी के ठीक सामने एक खेत है. [….]
थिएटर की दुनिया के उस्ताद बंसी कौल से मुलाक़ात के कितने ही प्रसंग पिछले दिनों याद आते रहे. उनके हुनर का सम्मोहन दुनिया जानती है, क़रीब से जानने वाले उनकी शख़्सियत की तमाम ख़ूबियों से भी वाक़िफ़ होंगे. दिल्ली में हमारी मुलाक़ात और उनका यह जुमला कभी नहीं भूलता – रंग विदूषक की भाषा में कहें तो सत्ते पे सत्ता की दुनिया में कभी तीर-तुक्का भी लग जाता है. [….]
उर्दू की प्रगतिशील धारा के कवियों में जनाब वामिक़ जौनपुरी एक रौशन मीनार की तरह दीप्तिमान हैं. एक प्रगतिशील कवि होने के नाते वामिक़ साहब विचारधारात्मक प्रोपगंडे को साहित्य के लिए ज़रूरी मानते हैं पर उनकी शायरी में नारा अपनी कलात्मकता के साथ इस तरह दिखलाई पड़ता है कि वह काव्य सौन्दर्य का एक अंग बन जाता है. [….]