वह 16 सितम्बर, 2007 की एक ख़ुशनुमा सुबह थी. मुझे दोबारा इंतिज़ार हुसेन साहब के साथ डिबाई जाना था. लगभग तीन साल पहले 11 अक्टूबर, 2004 को भी मैं उनके साथ डिबाई गया था. घनघोर बारिश में भीगते-भागते की गई उस यात्रा में असग़र वजाहत भी साथ थे. [….]
राजस्थान के ख़ूबसूरत शहरों में से एक है – उदयपुर. अक्सर लेक पैलेस, सिटी पैलेस और महाराजा अरविंद सिंह मेवाड़ की ग्लॉसी तस्वीरों से ही पहचाना जाने वाला यह शहर अपनी प्राकृतिक विविधता, लोगों की ज़िन्दादिली और लोक जीवन की शैली के चलते अनूठा और बेजोड़ है. जिन दिनों कुम्भ पर अपनी तस्वीरों की प्रदर्शनी लेकर वहां गया, शहर में ख़ूब हलचल के दिन थे. [….]
दिल्ली से हेलसिंकी जाते समय आरंभ में विचार काबुल और मास्को के रास्ते विमान से ही जाने का था. अवसरवश दिल्ली में पाकिस्तान के राजदूतावास के एक सज्जन से भेंट हुई. उन्होंने उलाहना दिया – ‘भारतीय लेखक हेलसिंकी – मास्को की ही बात सोचते हैं….ख़ासकर पंजाबी लेखकों को तो लाहौर-पेशावर नहीं भुला देना चाहिए.’ [….]
पिठोरा बनाने वाले वह अकेले चित्रकार नहीं थे, और न ही झाबुआ के अपने भाभरा गांव में वह अकेले ‘लिखंदरा’ थे, फिर भी पिठोरा का ज़िक्र आते ही पेमा फत्या का नाम ख़ुद ब ख़ुद ज़ेहन में आता है. दुनिया के कितने ही संग्रहालयों-कला वीथिकाओं में उन्हीं पेमा के हाथ के बने पिठोरा संजोये हुए हैं, जिन्होंने पचास सालों से ज़्यादा वक़्त तक भाभरा के कितने ही घरों की भीत पर पिठोरा के चित्र उकेरे थे. पेमा फत्या का जाना एक कल्पनाशील चित्रकार का जाना है, [….]