‘राहों के पेचो ख़म में गुम हो गई हैं सिम्तें/ ये मरहला है नाज़ुक ताबाँ संभल-संभल के.’ ताबाँ के मायने नूरानी यानी दीप्त के हैं और पेचदार भी. ‘ताबाँ’ के क़लाम में इसके दोनों मायने नुमाया होते हैं. उनकी शायरी में सादा बयानी तो है ही, एक अना भी है. [….]
उनकी शायरी की सोहबत का एक फ़ैज़ तो यही है कि ‘उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है..’. फ़ैज़ सच्चे वतनपरस्त थे और दुनिया भर के जनसंघर्षों के साथ खड़े होने के हामी भी. साम्राज्यवादी ताकतों ने जब भी दीगर मुल्कों को साम्राज्यवादी नीतियों का निशाना बनाया, फ़ैज़ ने उन मुल्कों की हिमायत में अपनी आवाज़ उठाई. [….]