(यह संस्मरण है भी और नहीं भी. दरअसल यह मंटो पर लिखे उपेंद्रनाथ अश्क के ख़ासे लंबे संस्मरण की किताब की लंबी भूमिका का एक हिस्सा है. इसके समर्पण में अश्क ने लिखा – उन ‘बुद्धिमानों’ के नाम जिन्होंने इस संस्मरण को मंटो के ख़िलाफ़ समझा. [….]
हजारी प्रसाद द्विवेदी की लेखनी में परंपरा और आधुनिकता का जैसा मेल दिखाई देता है, वैसा कम ही देखने को मिलता है. लोक और शास्त्र का मूल्यांकन जिस इतिहास बोध से द्विवेदी जी ने किया है, वह इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि उसमें किसी तरह का महिमामण्डन या भाव विह्वल गौरव-गान नहीं मिलता, बल्कि वैज्ञानिक चेतनासंपन्न ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि मिलती है, जिसका पहला और आख़िरी लक्ष्य मनुष्य है. उनका यह निबंध इसी बात की ताईद करता है. [….]
यों राजेन्द्र कृष्ण फ़िल्मी दुनिया के ऐसे गीतकार हैं, जिन्होंने फ़िल्मों की कहानी, स्क्रिप्ट और संवाद भी लिखे. इन सभी विधाओं में उन्होंने अधिकार से लिखा और कामयाब भी रहे. मगर उनके चाहने वालों में उनकी पहचान गीतकार की ही है. चार दशकों में उन्होंने कितने ही ऐसे नायाब गीत रचे, जो अब भी पसंद किए जाते हैं. [….]