यह विज्ञापन ‘प्रकाशन समाचार’ के जनवरी 1957 के अंक में छपा. उन दिनों ‘मैला आंचल’ के ख़िलाफ़ छपे लेखों और उपन्यास के आलोचकों को जवाब देने की यह युक्ति फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की ही थी. तमाम आलोचनाओं के कारण जुटाते हुए यह विज्ञापन ख़ुद रेणु ने लिखा था.
‘मैला आँचल’? वही उपन्यास जिसमें हिन्दी का एक भी शुद्ध वाक्य नहीं है? [….]
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