शम्स-उल हुदा बिहारी के नाम से अगर उन्हें न पहचान सकें तो एस.एच. बिहारी को याद कर सकते हैं. रेडियो की लोकप्रियता की बुलंदी के दिनों में जिन गीतकारों के नाम बार-बार सुनने को मिलते, उनमें इस नाम का शुमार भी है. [….]
उस रोज़ महराजगंज से आई एक फ़ोटो में किसी को हाथी की पूंछ पर लाल-पीले रंग के रिफ़्लेक्टर बांधते देखा. पहले तो लगा कि कोई चुहल कर रहा होगा मगर उस तस्वीर में कौतुक का तत्व भी था. सो कैप्शन खोजकर पढ़ा तो मालूम हुआ कि ट्रैफ़िक इंस्पेक्टर हैं. और उनकी मंशा यह कि पूंछ देखकर लोग ट्रैफ़िक सुरक्षा के प्रति जागरूक होंगे. [….]
उनकी शायरी की सोहबत का एक फ़ैज़ तो यही है कि ‘उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है..’. फ़ैज़ सच्चे वतनपरस्त थे और दुनिया भर के जनसंघर्षों के साथ खड़े होने के हामी भी. साम्राज्यवादी ताकतों ने जब भी दीगर मुल्कों को साम्राज्यवादी नीतियों का निशाना बनाया, फ़ैज़ ने उन मुल्कों की हिमायत में अपनी आवाज़ उठाई. [….]