समय कुछ ठहरा-ठहरा सा प्रतीत होता है. मानो पिछले तीन सालों में कुछ न बदला हो. न पैरा खिलाड़ियों का हौसला, न उनकी योग्यता और न उनका जज़्बा. वे पेरिस में उसी तरह पदक जीत रहे हैं, जैसे टोक्यो में जीते थे. उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ये पूरब है या पश्चिम. ये टोक्यो है या पेरिस. वे सिर्फ लक्ष्य साधते हैं. वे चिड़िया की आंख देखते हैं [….]