नई दिल्ली | निर्मल वर्मा की 96वीं जयंती पर बुधवार को इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित ‘कृती निर्मल’ कार्यक्रम में उनकी असंकलित कहानियों के संग्रह ‘थिगलियाँ’ का लोकार्पण हुआ. प्रख्यात इतिहासकार सुधीर चन्द्र, सुपरिचित कवि और निर्मल वर्मा [….]
साइकिल यात्री और बेहतरीन क़िस्सागो होने के लिए अलग तरह की लियाक़त की दरकार होती है और इस लिहाज़ से देखें तो बिमल दे दोनों ही तरह के हुनर से भरपूर घुमक्कड़ हैं. बांग्ला में छपी उनकी किताब ‘सुदूरेर पियासी’ का हिन्दी अनुवाद ‘साइकिल से दुनिया की सैर’ पढ़ते [….]
नई दिल्ली | विश्व पुस्तक मेला में राजकमल प्रकाशन के स्टॉल ‘जलसाघर’ में वरिष्ठ कथाकार मैत्रेयी पुष्पा के साथ संवाद से सोमवार के कार्यक्रम शुरू हुए. सॉनेट मंडल के कविता संग्रह ‘लौटती दोपहरें’; नासिरा शर्मा के कहानी संग्रह ‘सुनहरी उंगलियाँ’; अदनान कफ़ील दरवेश के कविता [….]
नई दिल्ली | विश्व पुस्तक मेला में इतवार को राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल जलसाघर में ‘भविष्य के पाठक’ विषय पर परिचर्चा के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई. प्रज्ञा के उपन्यास ‘काँधों पर घर’ और अंकिता आनंद के कविता संग्रह ‘अब मेरी बारी’ का लोकार्पण हुआ. [….]
नई दिल्ली | प्रगति मैदान में आज से शुरू हुए विश्व पुस्तक मेला के पहले दिन ख़ूब भीड़ जुटी. राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल जलसाघर में दिनभर पाठकों का जमघट लगा रहा. पसंदीदा किताबें खरीदने के साथ ही लेखकों से मिलने को लेकर भी उनमें काफी [….]
जैसे हाउस वाइफ़ का काम कोई नौकरी नहीं है, ठीक वैसे ही हाउस हसबैंड होना या बनना कोई करियर नहीं है. बावजूद इसके सुबह से लेकर शाम तक कोई न कोई काम लगा रहता है. कोई नोटिस करे या न करे लेकिन खुद और टांगों को पता रहता है वह ड्यूटी पर हैं. अपनी पी-एच.डी. पूरी करने की ख़ातिर अख़बार [….]
पैट्रिक मोदिआनो का उपन्यास ‘डोरा ब्रूडर’ दूसरे विश्वयुद्ध के दिनों में पेरिस से लापता हुई पंद्रह साल की एक यहूदी लड़की डोरा के क़दमों की तलाश है, 1941 में पेरिस के एक अख़बार में छपी एक छोटी-सी ख़बर से हवाले से डोरा की यह तलाश जर्मनों के क़ब्ज़े वाले पेरिस शहर के माहौल का ऐसा पुनर्सृजन है [….]
जोराम यालाम नाबाम का उपन्यास ‘जंगली फूल’ यों तो न्यीशी समाज में कही-सुनी जाने वाली ‘तानी कहानियों’ को आधार बनाकर कही गई ऐसी कथा है, जिसे प्रेम-कथा कहने को लेकर लेखक ख़ुद ही मुतमइन नहीं है. प्रचलित अर्थों में कही जाने वाली प्रेम-कथाओं सरीखी यह है भी नहीं. मगर पूरे उपन्यास में [….]
‘सतरंगी दस्तरख़्वान’ के बारे में बात शुरू करने के पहले मुझे अपनी ओर से भी कुछ कहना है. सोशल मीडिया में इस किताब के आने की सूचना के साथ जिस चीज़ ने मुझे झट से बाँध लिया था, वह इसके कवर की तस्वीर है – सरपत की पत्तियों, सूजे और लोटे के गिर्द हरी धोती पहने बैठीं दो हुनरमंद औरतों [….]
सही है कि आज़ादी के बाद से अब तक गाँवों का चेहरा काफ़ी बदल गया हैं, संसाधन और सोच बदली है और लोग भी, मगर इतना भी नहीं बदले हैं कि बनकट गाँव और वहाँ के बाशिंदों को पहचानने में कोई ख़ास मुश्किल पेश आए. हाल ही में आए शिवमूर्ति के उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ को पढ़ते [….]