रह-रहकर उठती है हूक-सी कलेजे में भग्गो के. झपकाई नहीं है पूरी रात उसने अपनी आँखें. मुंह अंधेरे छोड़कर खाट मन लगाना चाहा रोज़ के कामों में. जंगल फिरने गई तो अंधेरे में वहाँ बैठे-बैठे रुलाई फूटी. न्यार कूड़ा करने गई तो लड़ावनी पर बैठकर दहाड़ मारकर रोने को मन हुआ. पथनहारे में गोबर सानते-सानते खिसियानपट आया अपने आप पर. रात से [….]