सर्कस का ज़िक्र होते ही प्रशिक्षित जानवरों के तमाशे, नट, विदूषक या कलाबाज़ों के करतब की याद आ जाती है मगर इन सबका इतिहास तो पुराना है. [….]
फ़ैज़ की जिस नज़्म को लेकर हंगामा बरपा है, अब तक तमाम लोग उसकी व्याख्या कर चुके हैं. इकबाल बानो की आवाज़ में ‘लाज़िम है कि हम भी देखेंगे…’ की रिकॉर्डिंग का यूट्यूब लिंक और 1985 में ज़िया सरकार की पाबंदी के बावजूद लाहौर स्टेडियम में उनके गाने का क़िस्सा मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक ख़ूब बताया-सुनाया जा चुका है. [….]
हाँसदा सौभेन्द्र शेखर पेशे से डॉक्टर और तबियत से लेखक हैं. अब तक चार किताबें लिख चुके हैं. उनके पहले उपन्यास ‘द मिस्टीरियस एलमेंट ऑफ़ रूपी बास्के’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2015 से सम्मानित किया गया. कहानी संग्रह ‘द आदिवासीज़ विल नॉट डांस’ के हिन्दी अनुवाद ‘आदिवासी नहीं नाचेंगे’ को हिन्दी पाठकों के बीच भी ख़ूब सराहना मिली है. [….]