नई दिल्ली | विश्व पुस्तक मेले के छठे दिन साहित्य प्रेमियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिली. गुरुवार को राजकमल के स्टॉल पर आयोजित कार्यक्रम में उज़्मा कलाम के कहानी-संग्रह ‘काली बिल्लियों के साए में चटोरी चुड़ैल’ [….]
नई दिल्ली | विश्व पुस्तक मेले के चौथे दिन राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर हुए कार्यक्रमों में तीन नई किताबों― महेश कटारे के उपन्यास ‘आल्हकथा’, नंद भारद्वाज की किताब ‘कृष्णा सोबती की कथा यात्रा’, रुचिरा गुप्ता के अनूदित उपन्यास ‘मैं लड़ी और उड़ी’ का लोकार्पण हुआ, ‘लेखक से मिलिए’ शृंखला में ‘उम्मीदों के गीतकार : शैलेन्द्र’ किताब के [….]
नई दिल्ली | विश्व पुस्तक मेला–2026 के तीसरे दिन राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर पाठकों, लेखकों और साहित्य-प्रेमियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी रही. हिन्दी साहित्य के साथ-साथ समकालीन विमर्श, इतिहास, समाज और स्त्री-अध्ययन से जुड़ी पुस्तकों में पाठकों की ख़ास दिलचस्पी दिखाई दी. राजकमल के स्टॉल पर आनंद द्वारा संपादित किताब ‘वे आज़ाद थे’ [….]
जैसा हाल देस का, वैसा घर का हाल. आजकल घर में एस.आई.आर. चल रहा है. जी हाँ, स्पेशल इन्सेंटिव रिवीज़न—कोने-कोने में झांक कर तफ़्तीश हो रही है. आप कहेंगे, ये क्या मज़ाक है, घर में कुल चार जन हैं, वहाँ कौन देसी, कौन बिदेसी. घर में कहाँ घुस आएंगे कोई. अरे, एक तो आप समझते नहीं हैं. ये कोई अपने वाले, दूसरे वाले, बंगाली [….]
नई दिल्ली | भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में गुरुवार को शाम को एक सभा हुई. राजकमल प्रकाशन और रज़ा फ़ाउंडेशन की ओर से यह संयुक्त सभा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुई. वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी के वक्तव्य से सभा की शुरुआत [….]
आपने कभी नीला कुंजारी (नीलकुरंजी) के फूल देखे हैं, जो 12 साल में सिर्फ़ एक बार खिलते हैं? नहीं? तो आप नीले रंग के सम्मोहक जादू से नावाक़िफ़ हैं, आप नहीँ जानते कि नीले रंग के उस शेड को देखने, निहारने और अपनी आँखों में बसाने के लिए इंसान क्या कुछ कर सकता है. नीलकुरंजी का नीला क़ुदरत के रंग सँजोने की कला के नाम इक सिजदा है. [….]
मुझे यह भी नहीं मालूम
कि मैं कितनों को नहीं जानता.
शुक्ल जी से मैं कभी मिला नहीं, मुलाक़ात का कोई ज़रिया नहीं बना, कभी आमना-सामना भी नहीं हुआ. हाँ, दूर से उन्हें कई बार देखने-सुनने का मौक़ा मिला, उनका लिखा पढ़ता रहा, उनके बारे में ख़बरें देखता रहा. उन्हीं की कविता से ली गई पंक्ति से कहा जाए तो मैं सचमुच उनको नहीं जानता था. [….]
इतिहासकार इरफ़ान हबीब 94 साल के हो गए हैं. अपनी ज्यादातर सक्रियता उन्होंने घर के दायरे में सीमित कर ली है, पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग तक अब भी चले जाते हैं. विभाग के चेयरमैन प्रो.हसन इमाम की मेज़ के सामने एक बड़ी-सी मेज़ उनके आने के इंतज़ार में ख़ाली दिखाई देती है. यों घर की अपनी स्टडी में [….]
रात हो चुकी थी, वैसे भी मैं वहाँ देर से पहुँच था. ख़ुदा का घर बंद हो चुका था और ताला ‘अंदर’ से लगा था. उसके साथ सटे हुए बंगले में मौज-मस्ती का आलम था. मैं बस बाहर से ही नमस्ते कर आगे बढ़ने ही लगा था कि उस घर के रास्ते ने मुझे सोचने पर और यह तस्वीर लेने पर मजबूर कर दिया. उस तक पहुँचने के लिए इस सँकरे रास्ते नें मुझे [….]
“उनकी दुनिया में दाख़िल होने का हुनर मैंने साध लिया था, यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे कि मकड़ी के जाले का व्यूह भेदने वाला कोई चालाक कीड़ा करता है—ख़ुद को जाल में फंसने से बचाने के लिए अपने पंखों को समेटकर, कम से कम जगह घेरते हुए—मैं अंदर दाख़िल होती और उसी रास्ते से लौटते हुए पूरी एहतियात बरतती कि कहीं जाले के धागों में [….]