नॉक नॉक, हू इज़ देयर!
ये खेल आजकल न चाहते हुए भी खेला जा रहा है.
हैरानी की बात ये है कि इस खेल में बस एक खिलाडी है. पहली बार वो बंद दरवाज़े के बाहर खड़ा उसे खटखटाता है और दूसरी बार कमरे के अंदर दरवाज़े के पीछे से ख़ुद ही पूछता है, ‘कौन है?’ [….]
सुबह की अधूरी नींद के आख़िरी लम्हे तकिये से कूद उनकी पलकों पे आ बैठते हैं. उनींदापन जीत जाता है और ढलकती पलकें धीरे-धीरे बंद होने लगती हैं. हाई ब्लड प्रेशर से आई सोज़िश की वज़ह से उनकी आँखों में कुछ महीनों से एक नई कशिश आ गई. आँखों के नीचे बन गई थैलियों में ज़िन्दगी के सारे तज़ुर्बे संभाल के रख दिए गए हैं. धूप की चमक में [….]
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के बांग्ला उपन्यास ‘देबदास’ (1917) में पारो के किरदार का असली नाम पार्वती है. ये वो पार्वती है, जिसका प्यार परवान न चढ़ सका, उन चंद लम्हों के लिए भी नहीं, जब देवदास उसके घर के बाहर आख़िरी साँसें गिन रहा था. प्रेम और विरह के दर्द की अद्भुत कहानी तीन किरदारों की है – देवदास, उसके बचपन की दोस्त पारो [….]