सोमवार , 24  अगस्त  2026

अपना मुल्क

तटस्थता को बड़ी पूँजी मानते थे अमरकांत

  • 21 घंटा पहले   
  • 23 August 2026

(कथाकार-आलोचक प्रेम कुमार की एक पहचान उनके साक्षात्कार भी हैं. हिंदी-उर्दू के बेशुमार यशस्वी लेखकों से उनके साक्षात्कार कृतित्व पर ही केंद्रित नहीं रह जाते, बल्कि शख़्सियत का बड़ा ख़ाका भी पेश करते हैं. साक्षात्कारों की इस सूची में उनके समकालीन शामिल हैं और पिछली पीढ़ी के लोग भी. ‘अंतस के आर-पार’ में छपे अमरकांत के इस इंटरव्यू में भी उनके इसी हुनर की छटा है. यह साक्षात्कार आप श्रृंखला के तौर पर पढ़ सकेंगे. पेश है इसकी तीसरी और आख़िरी कड़ी… -सं.)

अभी सोचा है, एक और बड़े उपन्यास पर लिखें. इच्छा रहती है कि लिखूँ. उस बीमारी की अवस्था में भी तय किया था कि सबको लिखूँ मैं. सोचता हूँ, जो भी कहे, सबको लिखूँ. कोशिश करता हूँ ‘इन्हीं हथियारों से’ जब लिखा तब से बेहतर हो गए हैं हम. अब बैठकर भी लिख सकते हैं.’

व्यक्ति के रूप में आज के हालात में आप कैसा महसूस करते हैं? प्रश्न करते समय कल्पना नहीं की थी कि इस एक सवाल के उत्तर में इतने मनो-मलाल की बातों से रू-ब-रू होना पड़ेगा. अन्य अनेक प्रश्नों के जवाबों को समाहित करते हुए अमरकांत जी लगातार बोले जा रहे थे, ‘व्यक्ति के स्तर पर मेरे सोचने-महसूस करने से क्या मतलब है आपका? व्यक्ति से क्या मतलब है? राष्ट्र की बात करेंगे आप तो व्यक्ति का क्या अर्थ है? सदियों के इतिहास में मानव ने जो प्रगति की है—उसके सारे संस्कार किसी-न-किसी रूप में आप में हैं. आप कहें कि आधुनिक है, तो आधुनिक कोई हवा में लटकी चीज नहीं है. जो है, सब ज़मीन पर है. मूल्य-विचार जो भी हैं—आपकी वह ज़मीन है, आप उस पर खड़े हैं. आप उसमें परिवर्तन भी करना चाहते हैं. मेरी ही नहीं, हर व्यक्ति की क़रीब-क़रीब इसी प्रकार की एक स्थिति है.कभी ऐसा भी था कि इनसान नंगा रहता था, उसके पास भाषा नहीं थी, न कोई मूल्य ही था. यहाँ तक कि आज के सेंस में जो सामाजिकता है, वह भी नहीं थी. तो मानव-मूल्य भी एक्वायर्ड हैं, उन्हें आदमी ने अर्जित किया है. तो आप जो हैं…इतनी यात्रा करके आए हैं. इसमें बहुत सारी चीज़ें आती हैं. एक ज़माने में ये बहुत सारे धर्म यहाँ नहीं थे. अनीश्वरवाद भी फैला था. मातृसत्तात्मक समाज था, जिसमें स्त्री प्रमुख थी. तो आप देखिए न कि इस यात्रा में, यहाँ तक आने में कितने जय-पराजय भी हैं. बाद में होता यह है कि कुछ मूल्य बचे रह जाते हैं, कुछ व्यर्थ हो जाते हैं. बचे रह गए मूल्यों को लेकर आप प्रगति की यात्रा में बढ़ते हैं. इतिहास के बहुत से अंश किसे मालूम हैं? आज की इस स्थिति में हम जहाँ पहुँच रहे हैं—तो केवल हमारा सवाल नहीं है, औरों का भी, सभी का है, कि पूरे विश्व के बारे में आप क्या और कैसे सोचते हैं. आप केवल व्यक्ति नहीं हैं, केवल सीमित नहीं हैं. यदि कोई लेखक कहता है कि हम व्यक्तिवादी हैं…व्यक्ति स्वातंत्र्य…मतलब क्या है इसका? व्यक्ति की भी परिभाषाएँ परिवर्तित हुईं. पूँजीवाद आया तो व्यक्ति आया. पहले कहा गया कि व्यक्ति का धर्म था, सामंत था. पर जब पूँजीवाद आया तो कारख़ानेवाला सामंत से भी अधिक शक्तिशाली हो गया. तब व्यक्ति स्वातंत्र्य का दर्शन आया. कंसेप्ट यह था कि शासन व्यक्ति के बारे में कम से कम हस्तक्षेप करे. धीरे-धीरे इसकी भी सीमाएँ स्पष्ट होने लगीं. फिर वह परिभाषित होने लगा और साम्यवाद तक आया. यह क्या ठीक है कि विचारधारा ही लेखन का पर्याय हो जाए? ये तो सभी मानने लगे हैं कि विचारधारा लेखन का पर्याय नहीं है. स्वतंत्रता आंदोलन ने यह दिखाया कि स्वार्थ, सांप्रदायिकता आदि से विघटन होता है, जबकि मेल-मिलाप से समाज जुड़ता है. सोचनेवाले तो आप ही हैं—आप चाहें तो समाज को विघटित कर दें या आप कोशिश करें कि लोग मिल-जुलकर रहें.’

राजनीति का अर्थ हम यही जानते हैं कि सेवा, जनता की भागीदारी, स्वावलंबन, स्वदेशी, शक्तिशाली बनना है, पर शक्ति को दूसरों में बाँटना है. शक्ति की सार्थकता उसके व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किए उपयोग में नहीं है. उसका लाभ दूसरों को देने में है. देना, बाँटना, उदारता—यही शक्ति की सार्थकता है. स्वयं को लाभ पहुँचाने पर उसका मतलब हो जाता है तानाशाही. शक्ति के लिए आप सिद्धांत बदल दीजिए—जैसा बहुत लोग करते भी हैं—तब तो बात अलग है; पर आज का आदमी देश और समाज के बारे में ज़रूर सोचेगा. मैं नहीं सोचता कि कोई आदमी अपने समाज से कटा है. तो अब आप ही बताइए कि हम व्यक्ति के रूप में क्याच सोचें? व्यक्ति अकेले नहीं चल सकता. वन में तपस्या करता है, तब भी समाज के बारे में सोचता है. यदि आप समाज-विचार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते तो फिर सबसे प्यार, यश, प्रतिष्ठा क्यों चाहते हैं? लेखन में इन्हीं चीज़ों पर विचार करने के बाद ही तो लिखते हैं. इन चीज़ों से टकराहट होगी ही. उसका आपसे, आपके मित्रों से मतलब भी होगा ही. लेखक जो भी लिखता है, वह उसकी क्षमता, सामर्थ्य, उसकी दृष्टि आदि चीज़ों पर ही निर्भर करता है. यदि वह सामाजिक सच्चाइयों का सामना नहीं करता तो उसके सामने कठिनाइयाँ तो आएँगी ही. जब वह व्यक्ति के रूप में भी सोचता है, तब भी मैं नहीं सोचता, कि वह कटे रूप में सोचता है. उसके साथ हमेशा देश, समाज सब है. वह स्वीकार न भी करे तब भी उसके साथ बहुत से संस्कार, विचार, अनुभव हैं. उनसे वह गुज़रा है. उसे वे सताते भी हैं. भावनाओं, संवेदनाओं और भाषा के द्वारा जब लेखक अपने अनुभवों को पेश करता है तब वह इतना सरल काम नहीं है. व्यक्ति की तरह समाज में भी अंतर्विरोध होते हैं. व्यक्ति यदि कुछ बनना चाहता है तो उसे अंदर की बहुत-सी प्रवृत्तियों का अवरोध विरोध करना पड़ता है, तब वह बनेगा. ऐसे ही यदि वह कुछ समझना चाहता है, तब भी यही होता है. समाज में अशिक्षा, पिछड़ापन जैसे न जाने कितने अंतर्विरोध हैं. अंतर्विरोधों के बीच से कैसे रास्ता बनाया जाए, यह समस्या व्यक्ति, लेखक, राजनीतिज्ञ, समाज—सभी के सामने रहती है. अंतर्विरोधों को जाने-समझे बिना आप रचनामें वह चीज़ उभार ही नहीं सकते, जो उभरनी चाहिए. रचना सपाट हो जाएगी. ’

भ्रष्टाचार और अवमूल्यन के इस दौर में साहित्य तथा परिवर्तन को लेकर आप किस तरह सोचते हैं?

‘राजनीति में भ्रष्टाचार आदि…नागरिक के रूप में इन चीज़ों को लेकर हम भी दुखी होते हैं.बहुत-सी चीज़ों में हम ख़ुद भी दबे हैं, कुछ उन्हीं चीज़ों से गुज़रते भी हैं, पर इसका सुधार राजनीति ही कर सकती है. आज के समय में वही प्रभावी है. पर हर तरह की राजनीति थोड़े ही कर पाएगी यह सब. जब गांधी, लेनिन, माओ जैसे चिंतक, सोचने-विचारने वाले लोग होते हैं, तब परिवर्तन होते हैं. परिवर्तन आपके चाहने या भाषण देने से नहीं होगा. उसके लिए भारी संगठन करना पड़ता है, समय की सच्चाइयों को जान-समझकर देखना पड़ता है कि यह सब कैसे होगा. यह सब बिना त्याग के तो होगा नहीं. आपने देखा है कि नहीं—आजकल नेता मोटे होते जा रहे हैं. इसलिए कि सक्रियता नहीं है. मोटर है, गोश्त है, शराब है—पर उस तरह की सक्रियता नहीं है. नहीं है तो नहीं है. यह हर पार्टी के साथ है. पहले वाला वह ज़माना अब नहीं है. कोई पार्टी उस तरह अब ठीक नहीं है. लेखक के नाते…? बदलाव? हम एक बात कहते हैं कि हम परिवर्तन थोड़े ही कर सकते हैं. गाली देकर या आलोचना करके हम क्या कर लेंगे? लेखक जो लिखता है उसका तत्काल तो असर पड़ता नहीं है. वह तो संवेदनाएँ-भावनाएँ बदलने-बनाने का काम करता है. कबीर, तुलसी जैसे कुछ लोग बच जाते हैं, बाद में कुछ रचनाएं बच जाती हैं. समय लगता है. साहित्य में मनुष्य की तुच्छताएँ, ग्रेटनेस, जय-पराजय, उसके विचारों, भावनाओं, संस्कृति आदि सारी चीज़ों से मतलब रहता है. अगर आपने अपने समय के मनुष्य का चित्रण कर दिया तो वह चित्रण जीवित रहता है. जो चीज़ें दोषों, विकृतियों, गिरावटों के बीच मनुष्य को आगे बढ़ाने, मिलाने, संघर्ष करने को महत्व देती हैं, बढ़ाती हैं, वे चीज़ें हांट करती हैं, आगे चलती हैं और हर युग में प्रासंगिक भी होती हैं. महात्माजी ने क्या किया—पचपन करोड़ का पाकिस्तान का जो शेयर था, वह दिलवा दिया, आंदोलन किया—बस यही तो…और उनकी हत्या कर दी गई. इतनी बड़ी ऐतिहासिक शक्ति, मानवता का प्रतिरूप, एक महामानव. चाहा कि लोग एक रहें, लड़कर नष्ट न हो जाएँ. देश की एकता के लिए जान दी. इस तरह की कितनी घटनाएँ हैं दुनिया में? तब बताइए कि व्यक्ति के रूप में हम क्या सोचें?… हम सोचते हैं कि लिखकर बहुत तीर मार लिया, पर स्थिति यह है कि असंख्य लोग अशिक्षित हैं. प्रेमचंद की रचनाएँ उनके जमाने में—या आज भी कितने किसानों ने पढ़ी होंगी? ड्रामा करने को दिखा दें, पर पढ़ी कितनों ने हैं? परिवर्तन एक लंबी प्रक्रिया है, चलती रहती है.’

लगा कि बहुत दिनों का दबा-भरा बहुत कुछ बाहर आ गया है एक साथ. बोझिल-से हो चले उन कुछ पलों को खिसकाने-हटाने के इरादे से हो मैंने अमरकांतजी से उनके सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संबंध और बेहतरीन-सी उनकी किसी पसंद के बारे में जानना चाहा था—’ऐसा कोई एकाकी संबंध नहीं. मुझे मित्र पसंद हैं, मित्रता पसंद है—एक ज़माने में हमारे बहुत मित्र थे. नहीं, कोई विशेष क़िस्म ज़रूरी नहीं. साधारण आदमी भी हमारे मित्र हैं. पसंद करते हैं, बहुत पसंद करते हैं—क्या मतलब? माँ, पिता, भाई को कह सकते हैं—पर पसंद तो अलगाव का संबंध है. यह कहकर आप अपने को ऊँचाई दे रहे हैं. इससे कोई चीज़ व्यक्त नहीं होती. पसंद करना व्यावहारिक शब्द है, उसमें आदान-प्रदान है. बहुत हुआ तो आप ऐसा कुछ, कुछ समय के लिए जवानी में कर लेंगे. एक औरत को पसंद कर लेंगे; पर वह सब स्थायी नहीं होता. ये जीवन फ़ानी है—जो जवानी में पसंद, वो बुढ़ापे में विकृति. भाई से जुड़ाव था. राजनीति की बात करें तो बड़े उद्देश्य के लिए जनसेवा, लोगों के सुख-दुःख से जुड़ना अच्छा लगता था. हमारे पसंद करने से क्या मतलब? कोई विद्वान्‌ है, उसे हम पसंद करते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि हम उसका, उसके विचारों का विरोध नहीं कर सकते. राजेंद्र दोस्त रहे, पर उनके दोषों को हम क्यों स्वीकार करें? रिश्ता एकांगी ही हो, यह संभव नहीं. उसे प्यार भी नहीं कह सकते. जैसे गांधी का था कि ‘हर अच्छा सिद्धांत बिना व्यवहार के कीड़ा लगा मीठा फल है.’ आप में कार्य रूप में परिणत करने की कला यदि नहीं है तो स्थायित्व संभव नहीं. आप किसी को पसंद कर लें, प्यार कर लें, एक समय तक रद्द कर लें—सवाल यह है कि वह कसौटी पर कितना टिक सकता है?… जीवन का यह जो खेल है—उसमें पसंद शब्द द्वारा ही यदि आप जानना चाहें तो मुश्किल है. वैसे यह कि मुझे हरी पत्ती पसंद है… सूर्योदय…इनका रंग…सब कुछ बदल जाता है, उसकी परिभाषाएँ बदलती रहती हैं. आप यदि जागरूक हैं तो रिश्ते की वास्तविकता को समझते हैं. शुरू में हर रिश्ता अच्छा लगता है. पर इसका कुछ अर्थ नहीं. आपकी बहुत-सी ग़लत बातें कोई क्योंग पसंद करें? अब जैसे माता है—उसने इतना दिया है कि आप उसका दूसरा रूप सोच ही नहीं सकते. भले ही आज लोग माँ की हत्या भी कर देते हैं फिर भी उसका स्थान कोई ले नहीं सकता. उसको पसंद करना क्या है? हलका शब्द है. फूल पसंद है, पर उसके लिए जान तो नहीं दे सकते. रिश्तों में प्यार…पसंद? उसकी परीक्षा संकट में होती है. यहाँ यह एक व्यावहारिक पक्ष है.’

5.45 हो चले थे. हिचकती-सी एक दृष्टि से मैंने अमरकांतजी के चेहरे पर थकान के चिह्न ढूँढ़ने चाहे थे. मैं कुछ कहूँ, उससे पहले ही सुनाई दिया—’पूछिए आप, जो पूछना है. आपको परेशान करने वाली जो बात हो, पूछ लीजिए. लिबर्टी है आपको, कुछ भी पूछ लीजिए.’ एकदम से और कुछ न सूझा तो मैंने उनसे उनके बचपन, बचपन की कुछ शरारतों को याद करने का आग्रह किया. शरारत की बात पर पहले ख़ूब हँसे, फिर बोले, ‘हाँ, बचपन में मैं शरारती था.’ अचानक कुछ ध्यान आया है—रुके हैं. अंदर आवाज़ लगाकर नाती से टी.वी. पर आ रहे क्रिकेट मैच के स्कोर के बारे में जानना चाहा है. मैच की बात ख़त्म हुई तो मैंने खेलों के प्रति उनके लगाव के बारे में भी जानने की चाहत व्यक्त की है. अब क्रिकेट मैच से उन्होंने स्वयं को अलग कर लिया है—’खेल-कूद से बहुत लगाव था. इंटर में हॉकी, फ़ुटबॉल, वॉलीवॉल की तो कॉलेज टीम में भी था. ये दो ख़राब आदतें थीं बचपन में—जैसे लंगी लगा देना हाँ, छोटे भाई या नौकर को लगा देते थे… और नाक मल देना. पता नहीं क्या लगता था कि छोटे भाइयों की नाक मल देता था. शरारत बहुत-सी हैं, पर ये दो जान लें आप. हाँ, मार भी खाता था मैं. पिताजी मारते नहीं थे…माँ मारती थीं. उनका मारना मालूम नहीं होता था. खेल—ऐसा शौक़ कि यूनीवर्सिटी में या शहर में कोई भी टूर्नामेंट होता, मैं देखने ज़रूर जाता. नहीं, अब क्या जा पाऊँगा…. एकदम ख़ुश, कुछ उत्तेजित-से दिखे हैं—’ एक बार क्या हुआ कि लूकरगंज में फ़ुटबॉल का टूर्नामेंट था. मैं देखने गया. इंटरवल में देखा कि बगल में रेणुजी भी खड़े हैं. टेनिस खेला नहीं, पर देखते-देखते चीज़ें जान गया हूँ. क्रिकेट का तो पूछना ही नहीं… अब आँखें काम नहीं करतीं, सो टी.वी. पर भी नहीं देखता. पर पहले जब घर में रेडियो भी नहीं आया था तो बाहर खड़े होकर सुनता था. खेल मुझे बहुत पसंद है. अख़बार का खेल पेज आज भी डिटेल में पढ़ना चाहता हूँ…फ़िल्म? नहीं, अब नहीं देख पाता. एक ज़माने में बहुत देखता था. अच्छी फ़िल्म मिले तो शौक़ है, पर अब अच्छी फ़िल्म मिलती नहीं. अंग्रेज़ी-हिंदी बहुत फ़िल्में देखीं. जिन दिनों पत्रकार था, जितने चाहो सिनेमा के पास मिल जाते थे. आगरा में यह परंपरा थी कि सिनेमाघर वाले प्रेस शो करते थे, पत्रकारों को सम्मान के साथ बुलाते थे. आगरा कैंटवाले सिनेमाघर में अंग्रेज़ी फ़िल्में लगती थीं. साइकिल पर कभी अकेले, कभी किसी को साथ लेकर देखने पहुँच जाते थे. बहुत-सी अच्छी फ़िल्में वहाँ देखीं. ठीक है कि आजकल डांस करना ज्यादा सीख चुके हैं, पर केवल वही तो फ़िल्मअ नहीं है. फ़िल्म में तो पूरा जीवन होना चाहिए.’

वो क्षण, वो घटना जब आप बहुत रोए हों?

पलकें हाँफने जितनी तेज़ी से उठ-गिर रही हैं. उनकी उस तेज़ी ने जैसे भौंहों के सफ़ेद, घने बालों तक को हिला-कँपा दिया है. अब आँखें बंद हैं—‘या तो डेथ पर रोता हूँ, और तो रोने का जो समय आता है, रो नहीं पाता. पिताजी की डेथ पर था भी नहीं, बाद में गया. रो नहीं पाया. माताजी, भाई राधेश्याम, हमारी पत्नी और चाचाजी—इनकी डेथ पर रोया. बहुत रोना क्या होता है? रोया. रोना बहुत आसान नहीं है. रोना वह होता है, जब आप रोक न पाएँ—रोक ही न सकें. स्वाभाविक ढंग से, जैसे बच्चा रोता है, रुलाई आती है. वैसे तो हर संवेदनशील स्थिति में मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं, पर अचानक यूँ ही कि जब आप रोक न सकें. सोचते जाते हैं कि नहीं रोऊँगा, आँसू नहीं आएँगे, पर… इंदिरा गांधी बहुत साहसी थीं, पर संजय गांधी की मौत पर हमने उनका रोना देखा था. इतनी साहसी महिला भी रोक नहीं पाईं…’

अपमानित महसूस करने से जुड़ी कोई याद?

अरे, यह कहाँ? यह बहुत नाज़ुक चीज़ है. इसका क्या कहूँ? अपमानित होने का मतलब—दफ़्तर में आप काम कर रहे हैं, आपके बॉस ने डाँट दिया—तो यह कोई अपमान नहीं है. आपके काम का हिस्सा है यह. अपमान वहाँ होता है जहाँ इनसानियत, या जो तकाज़े हैं—रिश्तों का उल्लंघन कर देते हैं. जैसे दोस्त हो कोई, उससे आशा करें हम, पर वह वो न करे. तब एक अपमान-सा मालूम होता है. या फिर आपका कोई सीनियर या बॉस उस रिश्ते का उल्लंघन करके व्यवहार करे और जहाँ आप शालीनता, नेचर या अन्य वजह से जवाब भी न दे सकें—तो आप अपमानित महसूस करते हैं. तब प्रतिशोध की भावना भी आ सकती है. अपमान तो मिलते रहते हैं जीवन में. इतने लंबे जीवन में कई अवसर आए होंगे—लेकिन इस पर बहुत एक्सप्लेन नहीं करना चाहता. हाँ, मित्रों से, बॉस से भी आए हैं. कोई उपेक्षा कर दे, मुझे बुरा नहीं लगता, सबसे आशा भी नहीं करता. सबसे करनी भी नहीं चाहिए. बहुत से क़िस्से हैं—पर उन्हें मैंने अपमान के रूप में लिया ही नहीं. जीवन जीने के सबके अपने तरीक़े हैं.’

ख़ुशी या सम्मान का कोई एक क्षण?

‘अरे यार, आप भी क्या…? सम्मानित-तो क्या-समझ नहीं आता. पुरस्कार वगैरह में क्या सम्मानित होना? मुझे थोड़ा-बहुत जो सम्मान मिला है—अगर हुआ है तो मैं उसके महत्त्व को समझता हूँ. सम्मान का कोई अर्थ नहीं है. कोई काम पूरा हो जाए तो ठीक लगता है. सम्मान से मैं अभिभूत नहीं होता. लोग स्नेह में आकर सम्मान देते हैं. भले ही रचना पढ़ें, न पढ़ें, पर सम्मान हो गया. एक अनजान, जैनुइन पाठक जब आपको ऐसा लिख देता है, जो दूसरे लोग कह-देख न पाए हों तो सम्मान की भावना आती है. हाँ, एक कहानी है मेरी वो नाम भूल रहा हूँ—अरे गोलू (नाती), वो संग्रह तो ले आओ. संपूर्ण कहानियों का पहला भाग. हाँ, याद आ गई—’ गगन बिहारी’—बहुत लोग उसे एप्रीशिएट कर पाए या न कर पाए—पर एक पाठक ने जिस तरह एप्रीशिएट किया—तब एक बड़े आह्लाद और सम्मान की भावना पैदा हुई. ये सब तो होता है—क्षणिक कुछ होता है. बुरा नहीं लगता, अच्छा लगता है. पर ऐसा नहीं होता कि मनाने या सेलीब्रेट करने लगें. हमारे जीवन में ऐसे अवसर कम आए हैं.’

अपनी ऐसी कुछ ख़राबियाँ?

बहुत ख़राबियाँ है. कमज़ोरियाँ हैं, उनसे कॉशस रहता हूँ. व्यावहारिक नहीं हूँ, यह बड़ी भारी कमी है. उस मोरचे पर काफी पिटा हूँ. यह भी कि जिस तरह नियमित ढंग से मेहनत करनी चाहिए, मैं नहीं कर पाता हूँ. अपनी फ़ीलिंग दूसरे को कन्वे नहीं कर पाता. भीतर-भीतर रह जाता है वह सब. पर इसका दूसरों पर ताप या अभिशाप हो, ऐसा भी नहीं है. शारीरिक रूप से पहले से ही कई कमियाँ रही हैं. डायवर्टिड एनर्जीज़ हैं. एकोन्मुख एकाग्रता पूरी तरह बढ़ पाना संभव नहीं हुआ. जो करना चाहता था, उसमें इस चीज़ ने बाधा पहुँचाई. उसके लिए मैं रेस्पांसिबल हूँ, कोई और नहीं. चाहता था, एनर्जी एक ही चीज़ में लगे, पर नहीं लगी. काल्पनिकता-कल्पना में उड़ना-व्यवहार में कुछ नहीं किया तो आपका डायवर्जन तो हो गया.’

और आपकी शक्ति, पूँजी, ताक़त?

ताक़त यही रही कि मैंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया है और एक रास्ते पर लगाने की कोशिश की है. अनियंत्रित भावनाओं को नियंत्रित करने की मैंने जो कोशिश की है, वही मेरी ताक़त है. भावनाएँ-दुःख की, सुख की या और कैसी भी हों—उनमें जब आप अपने को नियंत्रित करेंगे, तभी कुछ कर सकेंगे सारे विरोधाभासों के बीच से तटस्थ होकर वास्तविकता को देखने की जब एक आदत पड़ जाएगी, तभी आप कुछ कर पाएँगे. दूसरों के साथ क्या होता है, मैं नहीं जानता; पर मेरे साथ ऐसा है. यह न कर पाता तो मैं उड़ ही गया होता. इसमें मेरी वे बीमारियाँ, जो बार-बार पटकती रही हैं, उनमें स्वयं को नियंत्रित कर कुछ करते रहना—इसे आप ताक़त कह सकते हैं, जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष या जीवन के प्रति आस्था कह सकते हैं. आस्था तभी बची रहती है, जब आप नियंत्रित कर पाते हैं अपनी भावनाओं को. मैं इंडल्ज नहीं कर सकता. मेरे पिताजी की शिक्षा थी कि कभी शराब न पीना—पर मैं भी यह जानता हूँ कि मैं अधिक शराब नहीं पी सकता. ऐसे ही अत्यधिक उत्साह, अत्यधिक भावनाएँ मुझे असमर्थ बना देती हैं. इसलिए मैं किसी चीज पर रिएक्ट नहीं करता. मैं भी एक मनुष्य ही हूँ—क्रोध, प्रतिशोध का भाव आता है, पर रिएक्ट नहीं करता. ग़लत की बात मैं नहीं कर रहा—वैसे ग़लत हैं भी नहीं—रिश्ते जो अच्छे हैं, क़ायम हैं. इसमें उनका भी सहयोग है; पर मैँ टूटन, बिखराव एफ़ोर्ड नहीं कर सकता. यह मेरी नेचर में भी नहीं है. आप मुझे बहुत मालामाल कर दें, बहुत प्रताड़ित कर दें—हमारी ताक़त भावनाओं में उद्वेलित हो जाने या हर चीज़ पर परेशान हो जाने में नहीं है. काम करना है तो आपको तटस्थ बनकर रहना पड़ता है. हमारे लिए यह ज़रूरी है. इसीलिए बहुत-सी चीज़ें हमसे नहीं हो पातीं. जो मिल जाता है, बहुत है. जो कर लेता हूँ, उसे उपलब्धि मानता हूँ. यह स्थिति आज नहीं, पहले से ही है. पहली कहानी आई तो ख़ुशी हुई, वास्तविक ख़ुशी हुई. तुरंत बाद में यह सोचा कि एक कहानी लिखकर कितना ख़ुश हो सकते हैं? यह तो अभी पहली कृति है, अभी तो हमें बहुत कुछ करना है. इससे अभी क्या मिला? बस, वह भावना स्वत: तिरोहित हो जाती है. यह जान-बूझकर नहीं होता, यह प्रक्रिया चलती रहती है. वह उपलब्धि इसलिए लगती है कि हमने एक चीज़ लिखी, लोग उसे स्वीकार कर रहे हैं; आपको, आपकी चीज़ को लोग समझ रहे हैं—इससे ताक़त तो मिलती है. पर असली ताक़त वही है कि आप अपनी भावनाओं को संयमित करके कितना कुछ कर सकते हैं. हार्ट अटैक हुआ तो यह भावना थी कि मैं कुछ कर न सका. उस बीमारी से बचने के लिए सदैव प्रयासरत रहा. यह हमारी ताक़त बन गई—इसलिए कुछ लिख सका. हालाँकि भावनाओं में ताक़त होती है, पर भावनाओं से दूर बने रहना मेरी ताक़त बन गया. मेल-जोल की बातें, दूसरों के सुख-दु:ख से जुड़ना, व्यक्तिगत भावनाओं से अलग रहकर दूसरों से, समाज से उन्हें जोड़कर देखना—ये ताक़त रही हैं.’

अब अगला उपन्यास?

‘उपन्यास—एकदम बहुत जल्दी शुरू करने वाले हैं. वह ‘इन्हीं हथियारों से’ जितना बड़ा तो नहीं होगा. सोचता हूँ—डिमाई आकार में, चार सौ पेज का होना होना चाहिए. सोचा है कि निजी जीवन के जो अनुभव हैं, उन पर लिखूँ. कैसा होगा? सोचता हूँ, सारी शक्ति लगा देनी चाहिए. उम्र काफ़ी हो गई है—अब शक्ति, क्षमताएं…उसकी तस्वीर पूरी साफ़ है. एक दूसरा उपन्यास पत्रकारिता जीवन पर है. कुछ शुरू भी किया था. ‘प्रभात खबर’ में ख़बर का सूरज करके उसका एक चैप्टर छपा था—उसे लूँगा. यह दूसरी प्राथमिकता है. ऐसा नहीं है कि उसमें इतिहास ही होगा, उसमें हमारी पत्नी भी रहेंगी, हम होंगे, पर कल्पना भी होगी. पर पहली प्राथमिकता तो वह है—जीवन का निचोड़ होगा उसमें—क्या देना है, क्या कहना है—मोटा ख़ाका तो बना लेते हैं, पर लिखते समय अनेक ऐसी दबी चीज़ें आती हैं, जो एक्सप्लेनेशन माँगती हैं—तभी देखें कि क्या हो.’

अँघूठा छोटे बच्चे की तरह अपने दर्द की बात सुनाने के लिए मचल-बिछल रहा था. इतना दर्द.सच में कितना थका दिया होगा मैंने इतने घंटों में अमरकांतजी को. बाहर-भीतर की रोशनी ने रात होने की सूचना दे दी थी. मैं चलने को हुआ ही था कि सुनाई दिया—‘एकाध तीर और निकाल लीजिए. कोई प्रश्न-जिज्ञासा रह न जाए. आप इतनी दूर से आए हैं…’ उस क्षण के अपनत्व ने अँगूठे के दर्द के असर को काफ़ूर कर दिया. अब तुरंत क्या पूछूँ, कुछ तय नहीं कर पाया. हड़बड़ाहट में यूँ ही पूछ बैठा—‘क्या कुछ चीज़ों –बातों का अफ़सोस या मलाल भी किया है आपने इन दिनों?’ थोड़ी देर चुप रहे. बोले तो कहा, ‘हाइपोथेटिकल है ये भी…’ ऐसा कुछ न याद आने की बात की. और फिर जैसे मेरा मन रखने को शुरू किया है—‘अपने बारे में एक यह कि मैं ऐसा आदमी था जिसकी कल्पनाएँ बहुत थीं, पर क्षमताएँ भी जानता था. एक ज़माने में बहुत बड़ा राजनीतिक वयक्ति बनना चाहता था. दूसरा—संगीतकार बनना चाहता था—सुविधाएँ नहीं मिलीं. और लेखक बनने का—वह बाद की भावना है. बाद में इच्छा हुई. जेल से छूटकर आए हमारे अनेक साथियों ने जो रूप दिखाए, उससे राजनीतिक वितृष्णा हो गई. बचा साहित्यकार होना—तो शरत की कहानियाँ पढ़कर कुछ प्रेम कहानियाँ लिखना शुरू हुआ. रोमांटिक लेखन था वह. पच्चीस साल की उम्र में, सन् ’50 के क़रीब पहली साहित्यिक कहानी ‘इंटरव्यू’ लिख पाया. कांशस रूप से साहित्य की ओर आने का प्रयास किया हो, ऐसा नहीं था. साहित्य जगत से संपर्क भी नहीं था. वह सूब आगरे जाकर हुआ. पत्रकारिता, रोज़ी-रोटी, साहित्य आदि की दृष्टि से आगरा ने बहुत दिया. वह मेरी ज़िंदगी का बहुत महत्वपूर्ण शहर है. इस दृष्टि से बलिया दूसरा और इलाहाबाद तीसरा महत्वपूर्ण शहर है. और बहुत-सी चीज़ें हैं, जिन्हे नहीं कर पाए—पत्नी की बहुत सी इच्छाएँ पूरी नहीं कर पाए. दुःख तो नहीं कहूँगा इन्हें—पर ये बातें हैं जो मन में रहती हैं. वो इच्छाएँ क्या थीं पत्नी की? ये बताना नहीं चाहता, पर हाँ, मन में रहती हैं.’

पत्नी की मृत्यु—उनके न रहने को इन दिनों आप कैसे और कितना याद करते हैं?

दोनों हथेलियाँ सटकर जुड़ गई हैं. समान नामवाली अँगुलियाँ एक-दूसरे से लिपट-चिपट गई हैं. बंद आँखें बहुत धीमे-धीमे खुली हैं. सिर ऐसे हिला जैसे इनकार किया हो. फिर ‘नहीं, नहीं’ सुनाई दी. होंठ कई बार भिंचे-फड़कते-से दिखे हैं. लिपटी-सोई-सी अँगुलियों से अबोले कुछ इंगित किया है. और अब मुश्किल से सुनी जा सकने वाली आवाज़ में कहना शुरू हुआ है—’जीवन चल ही रहा था. पत्नी भी बीमार रही थीं. उस फ्रंट पर भी जीवन गड़बड़ था. बीमारी को उन्होंने हँसते-हँसते, बहुत बहादुरी से काटा…अब? अब तो उनकी डेथ हो गई…’ ऐसी ख़ामोशी, ऐसा सन्नाहटा कि सुई के गिरने की आवाज़ भी सुनी जा सके. सहसा माथे से चलकर एक प्रकाश-किरण उनके होंठों पर आकर रुकी—‘बहुत से कथानक, बहुत-सी बातें मुझे उन्हीं से प्राप्त हुईं. आपको बताऊँ? जब ‘इन्हीं हथियारों से’ लिखा तो मुझे ‘शहीदों की टोली…’ वाला वह गीत ठीक से याद नहीं आ रहा था. यह गीत उन दिनों जुलूसों में गाया जाता था. गोलियाँ भी चलती थीं उन जुलूसों पर, लाठियाँ भी चलती थीं—ये ज़िक्र है उसमें. पत्नी डेथ बेड पर थीं. मैंने पूछा—क्या है वह गीत? ‘शहीदों की टोली निकली, सर पर बाँधे कफनियाँ हो…’ ये पहली लाहन है उसकी. उस समय इतना ही बता पाईं—’अंग्रेज़ों का छक्का छूटा शेखी मिल गई धूल भाई. शेखी मिल गई धूल… कलेजे बिच गोली निकली…सर पर बाँधे कफनियाँ हो…’ देर तक व्याख्या की गई है. अँगुलियाँ, आँखें सब जैसे आज़ादी के उस दौर की वीरता, शौर्य और बलिदान को प्रतिबिंबित कर रही हैं, उस दौर पर गर्व कर रही हैं. और अब अपने रोने को रोकती-छिपाती-सी आँखें, होंठों पर झिलमिल थिरकती-सी एक हँसी भी और कृतज्ञता के शब्द भी—’उस एक ही साल में दो लोगों की मृत्यु. एक तो मेरे भाई राधेश्याम की मृत्यु—अगस्त में, एकदम अप्रत्याशित—और उसी साल नवंबर में इनकी—मेरी पत्नी की मृत्यु. ये ऐसे लोग थे—जिन्हें पसंद-वसंद तो क्या कहें—प्रिय थे. इनसे लेखन में, व्यक्तिगत जीवन में लिया-ही-लिया था. भाई से ही हमने यह ग्रहण किया था कि सिंपिलीसिटी में कितनी शक्ति है. उसके बिना वास्तविकता की अभिव्यक्ति बहुत कठिन है. पत्नी का क्या कहूँ? पत्नी तो पत्नी है. मेरी पत्नी में जीवन के प्रति बेहद उत्साह था. उनकी स्मरण-शक्ति बड़ी तीव्र थी. वह हार मानने वाली नहीं थीं. कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी हँसती रहने वाली…और सबसे साहस के साथ ज़िंदगी जीने के लिए कहनेवाली… नहीं, इन चीज़ों का हम शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते. इन्हें आप अवर्णित ही रहने दें. भाई भी पूरा एक किस्सा हैं—कभी संस्मरण लिखूँगा. बहुत-सी चीज़ें लिखी नहीं जा सकतीं. बड़ा मुश्किल, कठिन है. विस्तार दें तो चीज़ें बिखर जाती हैं.’ अमरकांतजी जैसे क़द के साहित्यकार का यह कथन उनकी भावनाओं को बड़ी सहज ख़ूबसूरती के साथ व्यक्त कर गया था. भावनाओं के आवेग को थामते-नियंत्रित-से करते अमरकांतजी कह रहे थे, ‘अब और क्या कहूँ? इतना रचा-बसा है जीवन में वह सब कि कुछ नहीं एक्सप्लेन किया जा सकता. ये तो जीवन के हिस्से हैं. हर एक की ज़िंदगी में आते हैं. जैसे हम समझते हैं, दूसरे उस तरह समझ भी नहीं सकते. अब जैसे भीष्मजी और उनकी पत्नी शीलाजी का संबंध था, दूसरे क्या समझेंगे वह सब? उनकी एक रचना से हमें यह लगा कि पत्नी की मृत्यु के बाद कैसा शॉक लगा होगा भीष्मजी को.’

उनके पुत्र और पुत्रवधू गेट तक विदा करने आए थे. ऐसे जैसे कोई अपने परिवार के अत्यंत निकट, आत्मीय व्यक्ति को विदा कर रहा हो. अध-खुले गेट के पास खड़े-खड़े देर तक बातें होती रही थीं. लेखक बेटे से बातों-बातों में पता चला कि यह परिवार आज भी किराए के मकान में रह रहा है और इन दिनों इसे फ्रीहोल्ड कराने की दिक़्क़तों भरी कोशिश में है. पुत्रवधू का मन टटोलना चाहा तो सुनने को मिला, ‘शादी से पहले तो उतना नहीं, पर बाद में पढ़ा है. हाँ, गर्व होता है. अब तो लगता है कि यहाँ इस घर में होना बड़ी बात है. मन-ही-मन मैंने भी दोहराया, ‘हाँ, इस घर में होना बड़ी बात है’

वापसी की उस यात्रा में अमरकांतजी की विदा के क्षणवाली वह मुद्रा मुझ पर देर तक हावी रही. लगा कि मैं एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से मिलकर आ रहा हूँ. उस ख़याल के साथ ही उनके मकान के वे हिस्से मेरे दिमाग़ में चक्कर काटने लगे, जो मैंने देखे थे—ड्राइंगरूम, छोटा-सा बाथरूम, टॉयलेट, कमरे—उतने छोटे और ख़स्ताहाल. अनेक लेखकों-कलाकारों के आवास-गृहों की भव्यता-विराटता भी पता नहीं यकायक कैसे याद आने लगी. और फिर सोचते जाने के उस तकलीफ़देह-से एक क्षण में ख़ुद ने ख़ुद को समझाना चाहा—इतने आँधी-तूफ़ानों के बावजूद इतने लंबे समय तक यदि कोई अपने मूल्यों, विचारों से डिगना, समझौता न करना चाहे तो उसका घर ऐसा नहीं तो कैसा होना चाहिए—वह भी आज के इस ज़माने में?











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