प्रो.वसीम बरेलवी की अपने शहर की ये यादें कहीं दर्ज नहीं. प्रभात के साथ बात करते हुए उन्होंने शहर के पुराने लोगों, पुराने ठिकानों और पुराने दिनों की तहज़ीब के बारे में कितने ही क़िस्से सुनाए हैं. उस बातचीत की यह पहली कड़ी है, [….]
पारसी थिएटर के उस दौर में जब आग़ा हश्र कश्मीरी के नाटकों की धूम हुआ करती थी, उनकी ज़िंदगी और शान-ओ-शौक़त के क़िस्सों में भी लोगों की दिलचस्पी कम न थी. बक़ौल फ़िदा हुसैन नरसी ‘सीता वनवास’ लिखाने के लिए उनको पचास हज़ार रुपये फ़ीस मिली – तीस हज़ार नक़द और बीस हज़ार का शराब-ख़र्च. हक़ीक़त और फ़सानों के बीच जिये आग़ा हश्र पर ‘उर्दू के बेहतरीन संस्मरण’ में संकलित सआदत हसन मंटो के लिखे का एक हिस्सा, [….]
आज़ादी आंदोलन में जब हिंदी के महत्वपूर्ण लेखक क़लम चलाने के साथ ही पत्रिकाओं का संपादन भी कर रहे थे, उनका उद्देश्य पराधीनता से मुक्ति ही था. ‘प्रताप’, ‘इंदु’, ‘सरस्वती’, ‘ब्राह्मण’, ‘चाँद’ और ‘माधुरी’ सरीखी पत्रिकाएं साहित्य के उन्नयन साथ-साथ औपनिवेशिक दासता से ख़िलाफ़ जनजागरण की भावना से प्रेरित रहीं. [….]
पितरस बुख़ारी यानी कि पेशावर वाले पीर सैयद अहमद शाह बुख़ारी तंज़-ओ-मिज़ाह की दुनिया का ऐसा नाम हैं, जिन पर उर्दू वाले नाज़ करते हैं. ऑल इंडिया रेडियो के तमाम ओहदों पर काम किया, लाहौर में गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल रहे, यूएन में पाकिस्तान की नुमांइदगी भी की मगर ज़माना उन्हें उनके मज़ामीन के लिए याद करता है. [….]