क़िस्से लिखना और गढ़ना इसलिए आसान लगता हैं क्योंकि उन्हें लिखते वक़्त लेखक ख़ुदा बन जाते हैं. लेखक के बस में है कि वो जब चाहे क़िस्सों को, किरदारों को जहाँ चाहें मोड़ दें, जिसे चाहें मार दें, जिसे चाहें बचा लें, जिस दर्द को चाहें ख़ामोश कर दें. पर असल ज़िंदगी… वो किसी की नहीं सुनती, लेखक की भी नहीं. वो अपने वक़्त पर दरवाज़े बंद करती है, अपने हिसाब से लोग छीनती है, [….]
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