(कथाकार-आलोचक प्रेम कुमार की एक पहचान उनके साक्षात्कार भी हैं. हिंदी-उर्दू के बेशुमार यशस्वी लेखकों से उनके साक्षात्कार कृतित्व पर ही केंद्रित नहीं रह जाते, बल्कि शख़्सियत का बड़ा ख़ाका भी पेश करते हैं. साक्षात्कारों की इस सूची में उनके समकालीन [….]
4 फ़रवरी, 2010. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का न्यू गेस्ट हाउस. पर्शियन रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा मसनवी पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे सत्र के बाद का समय. डाइनिंग हॉल में भारत के सुदूर इलाक़ों से एवं ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, तज़ाकिस्तान, बांग्लादेश से बड़ी संख्या में आए प्रतिभागी. सब तरफ चर्चाएं, खिलखिलाहटें, बातें ही बातें. बड़ी मुश्किल और कोशिश के बाद जैसे-तैसे हम [….]
उर्दू के नामवर उपन्यासकार और कहानीकार पद्मश्री क़ाज़ी अब्दुल सत्तार की पैदाइश सीतापुर के मछरेहटा में हुई थी. डॉ.प्रेम कुमार से बातचीत में उन्होंने अपने बचपन के मोहर्रम की यादों का एक वाक़या तफ़्सील से बयान किया, जो दिलचस्प है और मर्मस्पर्शी भी. डॉ.प्रेम कुमार की किताब ‘बातों-मुलाक़ातों में क़ाज़ी अब्दुल सत्तार’ में दर्ज उसी बातचीत [….]
भीषण भयानक उस महामारी का जानलेवा वह लम्बा दौर. यहां-वहां से मृतकों बीमारों के रोज़-रोज़ थोक में मिलते समाचार, हिला देने वाली तस्वीरें. डर-डर और डर. तमाम तरह की आशंकाएं चिंताएं. डरों में दबा अवसन्न-सा हुआ मन और हिमशिला हो चुका पूरा जिस्म. जमी, निष्क्रिय हो चली देह—जैसे देह न होकर एक ऐसा हिमखंड हो, जहां पहुंचने से पहले [….]
फुब्बू,
तुम्हारे अलीगढ़ से जाने के बाद भी एक पत्र लिखा था. उसका क्या हुआ, मालूम नहीं. जब तुम्हारा ठौर—ठिकाना ही नहीं मालूम तो पता तो कुछ इसका भी नही है, पर फिर भी लिख रहा हूँ. देखो तो बीस वर्ष बीत चले हैं बिना तुम्हें देखे. पर तुम्हारे साथ के हिस्से में का न कुछ रीता हुआ है, न धुँधला. तुम्हारे देश की बात पर या तुम्हारे हमवतनों [….]
रह-रहकर उठती है हूक-सी कलेजे में भग्गो के. झपकाई नहीं है पूरी रात उसने अपनी आँखें. मुंह अंधेरे छोड़कर खाट मन लगाना चाहा रोज़ के कामों में. जंगल फिरने गई तो अंधेरे में वहाँ बैठे-बैठे रुलाई फूटी. न्यार कूड़ा करने गई तो लड़ावनी पर बैठकर दहाड़ मारकर रोने को मन हुआ. पथनहारे में गोबर सानते-सानते खिसियानपट आया अपने आप पर. रात से [….]
पूरे आठ साल बाद अपने गाँव की होली करेगा वह! पिछले वर्षों में होली, दीपावली, रक्षा-बंधन आते रहे, जाते रहे. वह गाँव पहुँचने को अकुलाया, पर कभी बच्चों की तबियत खराब, कभी पत्नी अस्वस्थ, कभी बच्चों के स्कूल या परीक्षा का झमेला, तो कभी छुट्टी की या पैसे की समस्या के कारण हार-झींककर मन मारे उसे गाँव से सैकड़ों मील दूर झाँसी में ही पड़े [….]
यह सच है कि दो बार की इन मुलाकातों से तब मुझे तो संतोष नहीं ही हुआ था, संतुष्ट वे भी नहीं थीं. तय हुआ था कि शिमला में कृष्ण बलदेव वैद के साथ कुछ दिनों बाद होने वाली अपनी बातचीत के बाद वे मेरे साथ फुर्सत में इत्मीनान से फिर बातचीत करेंगी! लेकिन कभी उनकी व्यस्तता या अस्वस्थता कभी मेरी काहिली और यात्रा भीरुता ने हमारा उस तरह से मिल बैठना [….]
बहुत सालों से यह सिलसिला जारी है. इन दोनों बच्चियों के जन्म से भी पहले से. अगर हम लोग शहर में हैं तो हमें शाम को साथ बैठना ही है. अरुण जी के घर पर रोज़ घंटे-दो घंटे एक दूसरे के घर परिवार की, दुख दर्द की बातें सुन लेना, सुना देना. चाय-पानी के साथ तरह- तरह की बहसों-चर्चाओं में उलझे रहना. बाद में धीरे-धीरे घर के अन्य लोग भी हमारी बैठकी में [….]
(‘एक मस्त फ़कीरः नीरज’ गोपालदास नीरज की सर्जना के तरीक़े और उनकी फ़िक़्र को बेहतर ढंग से समझने की कुंजी भी है. इस किताब में डॉ. प्रेम कुमार ने उनकी शख़्सियत के कितने ही रंग संजोये हैं, उनके कृतित्व को समझने में मददगार तमाम पहलुओं पर विस्तार से और बेबाकी से बातचीत की है. नीरज से उनका लंबा साक्षात्कार हम यहां तीन कड़ियों में छाप रहे हैं. -सं [….]
मधुकरी की-सी उस मीठी-अद्भुत गुंजार ने पेन का तो चल पाना ही दूभर कर दिया. सजग हुए कानों को लगा कि किसी की चूड़ियों ने धीमे से एक गीत गाकर चुपके-चुपके कुछ कहना चाहा है. देखने की बेताबी में नज़र घूमी तो दिखा कि अचानक एक देवदार ठीक बाज़ू में आ उगा है. या फिर गमकता-महकता-सा पूरा का पूरा एक बग़ीचा कमरे में लम्बवत आ खड़ा हुआ है [….]
ऑटो की आवाज़ तुमने सुन ली थी. इसीलिए मेरे घंटी बजाने से पहले तुम दौड़कर गेट तक आ चुकी थीं. धूप चटख़ नहीं थी, पर तुम्हारा चेहरा एकदम लाल था. ‘आइए’ कहकर तुम्हारे मुस्कराने ने जैसे वहाँ ढेर सारे फूल बखेर दिए थे. गेट खोलने के लिए उठे दाएँ हाथ ने गोलार्द्ध बनाकर क्षण भर को जैसे कोई बन्दनवार टाँगनी चाही थी. यूँ चहक और [….]
(हंस के 1986 के नवंबर अंक में छपी ‘नासपीटी कलट्टरी’ मेरी ख़ास पसंद इसलिए बन गई कि राजेंद्र यादव जी ने उसकी अनेक बार अनेक तरह से चर्चा और प्रशंसा की ही थी- अपने संपादकीय में भी तीन-चार बार उसका प्रमुखता से उल्लेख किया था. बाद में कृष्णा सोबती द्वारा उसे 1986 की श्रेष्ठ कहानी के रूप में ज्ञानपीठ से छपे भारतीय भाषाओं के एक संकलन [….]
उस दरवाज़े में से अंदर जाने के लिए हम दोनों को अच्छा-ख़ासा झुकना पड़ा था. सामने की दीवार के सहारे एक महिला कुछ करने में व्यस्त थी. सब कुछ से अप्रभावित, तन्मय, तल्लीलन-सी. उसकी ओर चलते सुरेश बता रहे हैं, “सर, यह देखिए… यह चूल्हा. छोटा-सा, बिल्कुल अलग तरह का. ये छोटी-छोटी टोकरियाँ. ये खाना बनाना-खिलाने के कुछ [….]