आम बोलचाल के शब्दों के मूल की तलाश बहुत बार ख़ासी दिलचस्प होती है. उन्हें मूल रूप में या अपनी ज़बान के मुताबिक ढालकर हम बोलते हैं, और वे सुनने वालों पर अपने मायने के साथ ज़ाहिर हो जाते हैं. भाषा की ईजाद भी तो इसी मक़सद से हुई थी. [….]
रियासत के दिनों में हरम में रहने वालों की ज़िंदगी बाहर से जितनी चकाचौंध भर लगती थी, क़रीब से देखने पर उनकी आत्मा उतनी ही उदास, ख़ामोश, बेबस और तारीकी में डूबी हुई मिलती. ‘द बेग़म एण्ड द दास्तान’ ताक़त और वैभव के ख़ौफ़ के बीच ख़ुद की ख़ुशियों-आकांक्षाओं को पीछे धकेलकर ज़िंदगी गुज़ार देने वालों की ख़ामोशी को ज़बान देती है. [….]
रामपुर में रज़ा लाइब्रेरी की अज़ीमुश्शान इमारत और किताबों के ख़ज़ाने के बीच किसी तारीक कोने में एक कतबा रहता है. क़यामगाह-ए-ग़ालिब की निशानी इस कतबे को झाड़-पोंछकर रोशनी में लाने पर जो पढ़ा जा सकता है, वह है – रामपुर में ग़ालिब का क़याम 1860 में रहा. 22 फ़रवरी 1944 को इसकी तारीख़ी अहमियत को महफ़ूज़ करने के लिए यह कतबा लगाया. [….]