पिछली सदी की तमाम महत्वपूर्ण घटनाओं को हम जिन तस्वीरों की मार्फ़त जानते-समझते आए हैं, और जो हमारे अवचेतन का हिस्सा भी हैं, उनके फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर सुनील जाना का नाम मगर बहुतों की स्मृति में नहीं मिलता. [….]
साइकिल यात्री और बेहतरीन क़िस्सागो होने के लिए अलग तरह की लियाक़त की दरकार होती है और इस लिहाज़ से देखें तो बिमल दे दोनों ही तरह के हुनर से भरपूर घुमक्कड़ हैं. बांग्ला में छपी उनकी किताब ‘सुदूरेर पियासी’ का हिन्दी अनुवाद ‘साइकिल से दुनिया की सैर’ पढ़ते [….]
पिछले दिनों फ़ेसबुक पर प्रियदर्शन जी की एक पोस्ट पढ़ी. पुस्तक मेला और अपनी आने वाली किताबों के संदर्भ में उन्होंने लिखा है – लेकिन किताब आ भी जाएगी तो क्या होगा? सत्रह किताबें अब तक आ चुकी हैं. पाता हूं कि लोग फेसबुक पोस्ट से आगे पढ़ते ही नहीं. [….]
जैसे हाउस वाइफ़ का काम कोई नौकरी नहीं है, ठीक वैसे ही हाउस हसबैंड होना या बनना कोई करियर नहीं है. बावजूद इसके सुबह से लेकर शाम तक कोई न कोई काम लगा रहता है. कोई नोटिस करे या न करे लेकिन खुद और टांगों को पता रहता है वह ड्यूटी पर हैं. अपनी पी-एच.डी. पूरी करने की ख़ातिर अख़बार [….]
पैट्रिक मोदिआनो का उपन्यास ‘डोरा ब्रूडर’ दूसरे विश्वयुद्ध के दिनों में पेरिस से लापता हुई पंद्रह साल की एक यहूदी लड़की डोरा के क़दमों की तलाश है, 1941 में पेरिस के एक अख़बार में छपी एक छोटी-सी ख़बर से हवाले से डोरा की यह तलाश जर्मनों के क़ब्ज़े वाले पेरिस शहर के माहौल का ऐसा पुनर्सृजन है [….]
जोराम यालाम नाबाम का उपन्यास ‘जंगली फूल’ यों तो न्यीशी समाज में कही-सुनी जाने वाली ‘तानी कहानियों’ को आधार बनाकर कही गई ऐसी कथा है, जिसे प्रेम-कथा कहने को लेकर लेखक ख़ुद ही मुतमइन नहीं है. प्रचलित अर्थों में कही जाने वाली प्रेम-कथाओं सरीखी यह है भी नहीं. मगर पूरे उपन्यास में [….]
‘सतरंगी दस्तरख़्वान’ के बारे में बात शुरू करने के पहले मुझे अपनी ओर से भी कुछ कहना है. सोशल मीडिया में इस किताब के आने की सूचना के साथ जिस चीज़ ने मुझे झट से बाँध लिया था, वह इसके कवर की तस्वीर है – सरपत की पत्तियों, सूजे और लोटे के गिर्द हरी धोती पहने बैठीं दो हुनरमंद औरतों [….]
कुल्हड़ में पीने से कोक में चरणामृत की तासीर पैदा नहीं हो जाती, न ही पतरी पर परोसने से पिज़्ज़ा के गुणों में कोई बदलाव आता है. हाँ, पतरी-कुल्हड़ ऑर्गेनिक-पात्र जान के ये सारे जतन करने से जातक का पातक बोध कम होता हो तो कोई और बात है. [….]
सही है कि आज़ादी के बाद से अब तक गाँवों का चेहरा काफ़ी बदल गया हैं, संसाधन और सोच बदली है और लोग भी, मगर इतना भी नहीं बदले हैं कि बनकट गाँव और वहाँ के बाशिंदों को पहचानने में कोई ख़ास मुश्किल पेश आए. हाल ही में आए शिवमूर्ति के उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ को पढ़ते [….]
हैदराबाद में 1945 में हुई ऑल इंडिया तरक़्क़ीपसंद काँफ़्रेंस को केंद्र में रखकर कृश्न चंदर ने एक रिपोर्ताज लिखा था – ‘पौदे’. इसका हिंदी लिप्यातंरण ज़ाहिद ख़ान ने किया है, जो हाल ही में छपकर आया है. और इस तरह यह रिपोर्ताज ऐसे लोगों को भी पढ़ना मयस्सर हुआ है [….]
अगर कोई रचना कालजयी कहलाती है तो उसकी बहुतेरी ख़ूबियों में इंसानी नफ़्सियात और फ़ितरत पर पकड़ का शुमार ज़रूर होता है. काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद के हवाले से इंसान की सारी नफ़्सियात ज़ाहिर नहीं होतीं, सभ्य होने के क्रम में उसने जो कुछ हासिल किया है [….]
प्रशांत पंजियार ने 1984 में पेट्रिअट् अख़बार में फ़ोटोजर्नलिस्ट के तौर पर अपना कॅरिअर शुरू किया. बाद में दस साल तक इंडिया टुडे और फिर सात साल तक आउटलुक में फ़ोटोग्राफ़र-एडिटर रहे. तस्वीरों में अपनी कहन के हवाले से उन्होंने अलग पहचान बनाई. [….]
चाँद कभी मामा है तो कभी महबूब के चेहरे की उपमा, नाज़ुकी और शीतलता का पर्याय भी है, वह ऐसा उजला गोला है, माँ जिसके माप का झिंगोला बनवा नहीं सकती और बच्चों की कल्पना में जाने कब से वहाँ बैठी एक बूढ़ी नानी चरखा कात रही हैं. [….]
लाहौर मेरे प्रिय शहरों में से एक है, ऐसा प्रिय कि जिससे मिलना अब तक न हो पाया है. ज़ाहिर है कि मेरा यह ग़ाइबाना लगाव किताबों और दोस्तों की ज़बानी सुने क़िस्सों से पैदा हुआ है. ऐसे में राजिन्दर अरोरा की किताब ‘यार मेरा हज करा दे’ के बारे में कहीं पढ़ा तो इसे मंगाने के लिए दफ़्तर को कह दिया. [….]
टॉय मैन और पद्श्री के ख़िताब से नवाज़े गए अरविंद गुप्ता प्रशिक्षित इंजीनियर हैं, पर उनकी धुन बच्चों में वैज्ञानिक चेतना जगाने की है और पिछले चालीस सालों से वह यही अलख जगाने के लिए देश भर में घूमते रहे हैं. अब तक क़रीब तीन हज़ार स्कूलों में वर्कशॉप कर चुके हैं [….]
दो रोज़ पहले गोरखपुर वालों ने सोशल मीडिया वाले चिंतकों को धमाल मचाने का जो मसाला मुहैय्या कराया, किताबों से मुग़ल दरबार की बेदख़ली का मसला भी उसी में आ जुड़ा है. सोशल कहलाने वाले मीडिया में ‘हा हंत’ का शोर है. आख़िर ‘त्राहिमाम’ कहकर पुकारें तो भी किसको! [….]
लोकश्रुति में शेरगढ़ के भाँड़ों की बहुत अहमियत रही है. भाँड़ का मतलब यों तो विदूषक या मसख़रा ही होता है मगर भूरे यानी ग़ुलाम हसन को इस लफ़्ज़ से ही परहेज़ है. ज़माने ने भाँड़ लफ़्ज़ कुछ इस तरह बरता है कि अब उन्हें यह अपमानजनक लगता है, [….]
उर्दू अदब की दुनिया में ख़ालिद जावेद की पहचान ऐसे अफ़सानानिगार की है, जिन्होंने अपने लेखन से नई लीक बनाई है, जो गहरी अंतर्दृष्टि वाले और ख़ामोशी से अपने काम में जुटे रहने वाले अदीब हैं. पढ़ाई के दिनों में फ़लसफ़ा उनका विषय था, और उसके बाद ज़िंदगी के मायने की अनथक तलाश का अहम् साधन. [….]
अलीगंज क़स्बे का सूदनपुर गांव वैसा ही है, जैसे कि उत्तर भारत के दूसरे गांव – ईंट के मकान, ईंट का खड़ंजा (कहीं-कहीं आरसीसी सड़क भी) और ट्रैक्टरों की होड़ में बचे रहे थोड़े-बहुत मवेशी, गलियों में खेलते-दौड़ते बच्चे, कहीं घर के बाहर निर्विचार चेहरे वाली बुजुर्ग औरतों की महफ़िल [….]
बरेली के सूदनपुर गांव की रामलीला में उस रोज़ राम-केवट संवाद का मंचन हुआ था. रात को सवा बजे तक चली रामलीला, उसके कलाकारों और इतर प्रसंगों के बारे में आप पहले पढ़ चुके हैं. लंबे रिपोर्ताज का यह दूसरा हिस्सा है. -सं [….]